Saturday, September 3, 2022

दिल तो बच्चा है जी

रामचरण जी अपनी खाट पर लेटे हुए थे। कमरे की दीवारों पर उनके चार जोड़ी कपड़े टँगे हुए थे, उन कपड़ों में कमरे में लगा सफेद चूना लग जाता था। जिन्हें पहनते वक्त रामचरण जी कपड़े को झाड़ लिया करते। 

कोई बाहरी व्यक्ति 78 साल के हो चले रामचरण जी से मिलने आता ,तो उसकी नाक में कमरे से अटैच टॉयलेट से होकर आती तेज दुर्गंध प्रवेश कर जाती थी।
 लेकिन थोड़ी देर में वह उस दुर्गंध और कमरे की सीलन वाली दुर्गंध का आदी हो जाता था।

 खाट, गैस चूल्हे और कपड़ों के साथ रामचरण जी के कमरे में एक और चीज़ हर आगुन्तक का ध्यान अपनी और खींचती थी।  वह होती थी ,रामचरण जी के लैपटॉप में चलती बच्चों की फिल्में और वीडीयो गेम। 
कोई मेहमान रामचरण जी से पूछता कि " रामचरण जी अब इस बुढ़ापे में भी लैपटॉप में गेम खेलते, फिल्में देखते अपनी आंख क्यों फोड़ते हो?
 तो रामचरण जी कहते, "बस इससे बचपन याद आ जाता, उम्र हो गई पर क्या करें दिल तो बच्चा है न जी"

रामचरण जी इंफोसिस से रिटायर थे और उनके दोनों बच्चे नवीन, सुकेश आईआईटी खड़कपुर से पढ़ने के बाद अब अमरीका ही बस गए थे। 

पत्नी स्वाति के कैंसर का इलाज कराते-कराते रामचरण जी का घर- बार सब बिक गया था पर वो स्वाति को बचा न पाए । बचे हुए पैसों से अब वो यही जिंदगी बसर कर रहे थे, उन्हें बच्चों के वापस पलटकर न देखने का दुख तो था पर वो दिन भर खुद को इतना व्यस्त रखते कि उन्हें आंसू बहाने का समय नही मिलता। मोबाइल से दूर ही रहने वाले रामचरण जी के कुछ पुराने मित्र उनसे मिलने चले आते थे तो वह उनसे दुनिया की खबर ले लेते। 

लैपटॉप में बच्चा बने बने रामचरण जी को एक दिन याद आया कि कैसे वो बचपन में मारियो गेम की हर स्टेज पार कर लेते थे। 

रामचरण जी ने अपने दिल के बच्चे को याद करते फैसला ले लिया था कि वह अब बच्चों के लिए कोई नया गेम बनाएंगे। रामचरण जी कम्प्यूटर की दुनिया से अनजान बिल्कुल नही थे। 

बूढ़ा शेर हथियार छोड़ा था, शिकार करना उसे अब भी याद था। अपनी नाक तक चश्मा ला लैपटॉप के सामने बैठे रामचरण जी लगातार एक हफ्ते कोडिंग कर नया गेम बनाने में जुटे रहे।


नवीन भाई जल्दी जल्दी 'आज तक' लगाओ। सुकेश ने अपने ही शहर न्यूयॉर्क में रहने वाले भाई नवीन को फोन लगाते हुए कहा।

पत्रकार- तो रामचरण जी आज आपका बनाया गेम 'दिल तो बच्चा है जी' पूरी दुनिया में छाया हुआ है। कैसे आपको इसे बनाने का विचार आया।

रामचरण जी- मैं अकेला हो गया था, बिल्कुल अकेला। एकल परिवारों में बुजुर्गों के लिए कोई जगह नही है। फिर हमारे देश में बूढ़ों की कोई इतनी पेंशन भी तो नही है कि को बेहतर जिंदगी जी सके।
इसलिए मैंने फैसला लिया मैं लोगों को सीख दूंगा कि अपने अंदर के बच्चे को कभी मत मरने दो। वही है जो आपको हौंसला देता है कुछ कर गुजरने का।

पत्रकार- अपने गेम के बारे में कुछ बताइए
रामचरण जी- अरे हाँ, मैं भी भावुक हो गया। मेरे दिल इस गेम का हीरो है। एक बच्चा जो आठ स्टेज पार करता है। हर स्टेज में जीवन के दस साल हैं, उसके संघर्ष है। उम्मीद है इन्हें समझ कोई बेटा अब अपने माता पिता को अकेला नही छोड़ेगा।

पत्रकार- इस गेम बनाने के बाद आपको जो 1000 करोड़ रुपए मिले हैं उनका आप क्या करेंगे?
रामचरण जी- कुछ नही बस और गेम बनाऊंगा।

नवीन और सुकेश की आंखों में आंसू थे।


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