Wednesday, May 13, 2026

170 साल पुराना हिमालय जर्मनी से खोजकर लाए शेखर पाठक

*170 साल पुराना "हिमालय" जर्मनी से खोजकर लाए शेखर पाठक*

दिल्ली, देहरादून के बाद अब नैनीताल की प्रदर्शनी में दिख रही हैं "विकास" वाले हिमालय से पुरानी तस्वीर

*19वीं सदी के हिमालय की दुर्लभ झलक*

नैनीताल में इन दिनों Himalaya Encounters नाम से एक प्रदर्शनी लगी है, दर्शकों को यह प्रदर्शनी 19वीं सदी के हिमालय में ले जाती है. प्रदर्शनी में जर्मन खोजकर्ता और वैज्ञानिक भाइयों एडॉल्फ, हरमन और रॉबर्ट श्लागिंटवाइट की दुर्लभ पेंटिंग्स, स्केच और वैज्ञानिक दस्तावेज प्रदर्शित किए गए हैं. इस प्रदर्शनी को खास बनाने में इतिहासकार Shekhar Pathak की बड़ी भूमिका रही है, वह इन दुर्लभ कलाकृतियों को जर्मनी से खोजकर नैनीताल तक लाए हैं.
श्लागिंटवाइट बंधुओं का हिमालयी अभियान 1855 से 1857 के बीच नैनीताल से शुरू हुआ था. भूगोल और भूविज्ञान में प्रशिक्षित इन खोजकर्ताओं ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सहयोग से असम की खासी पहाड़ियों से लेकर लद्दाख और बाल्टिस्तान तक लंबी यात्राएं कीं. उस दौर में कैमरे आसानी से उपलब्ध नहीं थे, इसलिए यात्राओं के दौरान हिमालय को दर्ज करने के लिए स्केच, वॉटरकलर और ऑयल पेंटिंग्स का सहारा लिया गया. कठिन परिस्थितियों में पहले फील्ड स्केच और नोट्स तैयार किए जाते थे, जिन्हें बाद में विस्तार देकर कलाकृतियों में बदला जाता था.

प्रदर्शनी में कुल 77 दुर्लभ चित्र और ड्रॉइंग्स रखी गई हैं, जिनमें से 67 मूल पेंटिंग्स श्लागिंटवाइट बंधुओं द्वारा बनाई गई हैं. कुछ चित्र ऐसे भी हैं, जिनमें शुरुआती फोटोग्राफी और पेंटिंग का अनोखा मिश्रण दिखाई देता है. ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरों पर हाथ से रंग और बारीक विवरण जोड़कर उन्हें अधिक जीवंत बनाया गया था. नैनीताल से पहले यह प्रदर्शनी दिल्ली और देहरादून में भी लगी थी और वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार ने इस पर एक पोस्ट भी साझा की.

https://www.facebook.com/share/p/1Kre5MLfjr/

*तस्वीरों में नैन सिंह रावत की ऐतिहासिक भूमिका*

इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यूरोपीय खोजकर्ताओं के साथ इसमें भारतीय सहयोगियों, खासकर पंडित नैन सिंह रावत की भूमिका भी अहम रही. शुरुआत में वह इस यात्रा में सहायक और कुली के रूप में जुड़े थे, लेकिन आगे चलकर हिमालय और मध्य एशिया के सबसे बड़े खोजकर्ताओं में गिने गए.  नैन सिंह ने प्रतिबंधित शहर ल्हासा तक की यात्राएं कीं और ट्रांस हिमालयी व्यापार मार्गों का दस्तावेजीकरण किया, जिसने बाद में मध्य एशिया के नक्शों और गजेटियर तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
शेखर पाठक ने अपने संबोधन में विस्तार से बताया कि नैन सिंह रावत का इस अभियान में कितना बड़ा योगदान था. उन्होंने यह भी बताया कि एक समय हिमालय की एक पूरी पर्वत श्रृंखला का नाम नैन सिंह रावत के नाम पर रखा गया था, जिसे बाद में प्रशासनिक बदलावों के कारण बदल दिया गया. वर्षों बाद नैनीताल में लगी यह प्रदर्शनी नैन सिंह रावत के योगदान को फिर से याद करने का एक महत्वपूर्ण अवसर बन गई है.

*बदलते हिमालय का दस्तावेज है प्रदर्शनी*

इन पेंटिंग्स की सबसे खास बात यह है कि इनमें दिखने वाला हिमालय आज "विकास" वाले हिमालय से बिल्कुल अलग नजर आता है.
प्रोफेसर क्रेट्ज़मान के अनुसार भूगर्भीय समय में 170 साल भले “पलक झपकने जितना समय” हो, लेकिन इन चित्रों और आज के हिमालय के बीच का अंतर बताता है कि पर्यावरण और बुनियादी ढांचे में कितने तेज बदलाव आए हैं.

छात्रों, शोधकर्ताओं और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यहां एक विस्तृत कैटलॉग भी उपलब्ध कराया गया है. 

No comments:

Post a Comment

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...