Thursday, May 14, 2026

जलवायु परिवर्तन और धार्मिक पर्यटन से जूझता त्रियुगी नारायण

*जलवायु परिवर्तन और धार्मिक पर्यटन से जूझता त्रियुगी नारायण*


उत्तराखंड में राजधानी देहरादून से लगभग 255 किलोमीटर दूर स्थित त्रियुगी नारायण गांव, त्रियुग नारायण मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. श्री केदारनाथ जी आने वाले यात्री सोनप्रयाग से होकर लगभग तेरह किलोमीटर दूर त्रियुगी नारायण पहुंचते हैं. रुद्रप्रयाग जिले की ऊखीमठ तहसील में समुद्र तल से करीब 1,980 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह गांव पौराणिक मान्यताओं, धार्मिक आस्था और हिमालयी संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है.

मान्यता है कि इसी स्थान पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था और मंदिर परिसर में जल रही अखंड धूनी को उसी विवाह की अग्नि माना जाता है. हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं, लेकिन बढ़ता धार्मिक पर्यटन और बदलता मौसम अब गांव के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर रहा है.

*पांच फीट बर्फ से आधे फीट तक सिमटा पहाड़ का मौसम*


मंदिर के तीर्थ पुरोहित कैलाश चंद्र गैरोला के अनुसार लगभग तीन हजार की आबादी वाले त्रियुग नारायण गांव का मौसम पिछले चार पांच वर्षों में काफी बदल गया है. कभी दिसंबर, जनवरी और फरवरी में यहां पांच छह फीट तक बर्फ गिरती थी और उसकी वजह से लोग अपने घरों से बाहर तक नहीं निकल पाते थे. अब हालात यह हैं कि इस साल फरवरी में मुश्किल से एक से डेढ़ फीट बर्फ ही गिरी.

उनका मानना है कि मौसम का चक्र तेजी से बदल रहा है. जून जैसी गर्मी अब मई में ही महसूस होने लगी है.

गांव से करीब पांच किलोमीटर दूर तोषी क्षेत्र में कभी कभी भूस्खलन होता रहता है. वहां सड़क के पास एक जगह पानी के स्त्रोत से जमा हो रहा पानी लगातार बढ़ रहा है. स्थानीय लोगों के अनुसार सड़क निर्माण के दौरान उस जगह पर मिट्टी डाल दी गई है, लेकिन गांव वाले इसे भविष्य के खतरे के रूप में देख रहे हैं.


*खेती सिकुड़ी, राजमा और आलू तक सिमटा गांव*


कैलाश चंद्र गैरोला के अनुसार गांव की खेती भी पहले जैसी नहीं रही. कभी यहां कई तरह की फसलें होती थीं, लेकिन अब गांव मुख्य रूप से आलू और राजमा तक सिमट गया है. हालांकि गांव के आसपास जंगलों में आग की घटनाएं अपेक्षाकृत कम हैं और पानी के स्रोत अभी भी ठीक ठाक स्थिति में माने जाते हैं.

त्रियुग नारायण में पलायन भी बहुत कम देखने को मिलता है. गांव के अधिकांश परिवार मंदिर और उससे जुड़े धार्मिक कार्यों पर निर्भर हैं. तीर्थ यात्रियों की आवाजाही यहां की स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार बन चुकी है.


*सोशल मीडिया से बढ़ा धार्मिक पर्यटन, गांव पर बढ़ा दबाव*


गांव के लोगों को लगता है कि सोशल मीडिया ने त्रियुग नारायण को नई पहचान दी है. पिछले कुछ सालों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंच रहे हैं, लेकिन इसके साथ समस्याएं भी बढ़ी हैं. गांव के आसपास गंदगी और बदबू की शिकायत अब आम होती जा रही है.

कैलाश चंद्र गैरोला के मुताबिक साफ सफाई की व्यवस्था सीमित है. जिला पंचायत की ओर से पंद्रह बीस दिन में सफाई के लिए कर्मचारी आते हैं, लेकिन लगातार बढ़ती भीड़ के सामने यह व्यवस्था काफी नहीं पड़ती.


*परंपराएं अब भी कायम, वन्यजीवों का बढ़ता खतरा*


त्रियुग नारायण में महिलाओं से जुड़ी कई पारंपरिक मान्यताएं अब भी निभाई जाती हैं. पीरियड्स के दौरान महिलाएं तीन दिन तक रसोई से अलग रहती हैं. पहले प्रसव के समय महिलाओं को इक्कीस दिन तक घर से अलग रखने की परंपरा है, जबकि दूसरे प्रसव में अठारह दिन तक अलग रखा जाता है.

मंदिर के तीर्थ पुरोहित राजेश भट्ट के अनुसार गांव में वन्यजीवों का खतरा लगातार बढ़ रहा है. भालू और शेर अक्सर पशुओं पर हमला कर रहे हैं. इस साल एक ही गौशाला में सात मवेशियों को मार दिया गया, जबकि पूरे गांव में पंद्रह बीस मवेशी वन्यजीवों का शिकार हो चुके हैं.



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