किताब में न्यू मीडिया से जुड़े सामाजिक मुद्दों पर भी विस्तार से लिखा गया है और यही इसकी एक बड़ी खासियत बनकर सामने आती है. ‘न्यू मीडिया और महिलाएं’ शीर्षक लेख में बताया गया है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन या सूचना का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक बदलाव में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है. लेख में यह बात सामने आती है कि घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों पर बनाए गए वीडियो और अभियानों का लोगों पर असर पड़ता है. कई लोग ऐसे वीडियो देखकर प्रभावित होते हैं और बाद में इस तरह की घटनाओं को रोकने या उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश भी करते हैं.
हालांकि कई लेखों में मुख्य विषय पर आने से पहले लंबी भूमिका दी गई है, जो कुछ जगहों पर पढ़ने में थोड़ी बोझिल महसूस हो सकती है. कई बार पाठक को शीर्षक से जुड़े मूल मुद्दे तक पहुंचने में अपेक्षा से अधिक समय लगता है. फिर भी अकादमिक किताबों में संदर्भ और पृष्ठभूमि को विस्तार से रखना एक जरूरी हिस्सा माना जाता है, इसलिए इसे पूरी तरह कमजोरी भी नहीं कहा जा सकता.
*न्यूज अवॉइडेंस और बदलती मीडिया संस्कृति*
‘न्यू मीडिया की चुनौती : न्यूज अवॉइडेंस’ शीर्षक लेख पाठकों को सीधे संबोधित करता है और यही बात इसे दिलचस्प बनाती है. यह लेख किताब को पूरी तरह अकादमिक और बोझिल होने से बचाता है. लेख की शुरुआत ही इस पंक्ति से होती है, “आप यह किताब पढ़ रहे हैं, तब भी संभव है कि आपने आज का अखबार नहीं पढ़ा होगा.” यह शैली पाठक को सीधे चर्चा का हिस्सा बना देती है.
लेखों की प्रामाणिकता बनाए रखने के लिए कई जगह आंकड़ों और रिपोर्टों का भी सहारा लिया गया है. उदाहरण के तौर पर रॉयटर्स की डिजिटल न्यूज रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि 2017 के सर्वे में 29 प्रतिशत लोग अक्सर या कभी-कभार चुनिंदा खबरों से परहेज करते थे, जबकि 2022 तक यह आंकड़ा बढ़कर 38 प्रतिशत हो गया. इस तरह के संदर्भ लेखों को केवल विचार आधारित नहीं रहने देते, बल्कि उन्हें तथ्यात्मक आधार भी प्रदान करते हैं.
साथ ही लेख में मीडिया की बदलती दुनिया और नए ट्रेंड को भी सामने रखा गया है. “पत्रकारों का यूट्यूबर बनना आम हो गया है. शिक्षक भी ऑनलाइन है, डॉक्टर भी ऑनलाइन...” जैसी पंक्तियां दिखाती हैं कि डिजिटल दौर ने केवल मीडिया ही नहीं, बल्कि पेशों और संवाद के तरीकों को भी बदल दिया है. यही वजह है कि यह लेख सिर्फ सूचना नहीं देता, बल्कि बदलती मीडिया संस्कृति पर सोचने के लिए भी मजबूर करता है.
*प्रिंट मीडिया के भविष्य पर सवाल*
किताब में ‘प्रिंट इज डेड!’ जैसा गंभीर विषय भी शामिल किया गया है. इस लेख में प्रिंट मीडिया के बदलते भविष्य और उसके सामने खड़ी चुनौतियों पर चर्चा की गई है. लेख में लिखा गया है, “प्रिंट के भविष्य पर बात करते समय दुनिया भर में हो रहे घटनाक्रमों पर भी नजर रखनी होगी. पिछले अस्सी वर्षों से प्रिंट मीडिया में एक दिग्गज की पहचान रखने वाले प्रमुख अमेरिकी समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट की बिक्री से स्पष्ट है कि अब अखबारों के परंपरागत शैली में काम करने का जमाना तेजी से खत्म हो रहा है.”
यह लेख केवल प्रिंट मीडिया के संकट की बात नहीं करता, बल्कि यह भी दिखाता है कि डिजिटल दौर ने समाचारों के उपभोग और प्रस्तुति के तरीके को किस तेजी से बदल दिया है. यही वजह है कि किताब मीडिया के वर्तमान के साथ-साथ उसके भविष्य को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है.
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