*कम होती बर्फबारी और बढ़ते प्रदूषण की मार झेलता बद्रीनाथ*
*बद्रीनाथ में बढ़ते धार्मिक पर्यटन और प्लास्टिक कचरे के कारण पारंपरिक जीवनशैली बदल रही है और अलकनंदा समेत आसपास के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है.*
उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में बदलता मौसम, घटती बर्फबारी और बढ़ता धार्मिक पर्यटन अब स्थानीय लोगों के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है. बद्रीनाथ मंदिर के पीछे स्थित झंडा मोहल्ला गांव के निवासी अंबिका प्रसाद कोटियाल के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में यहां के मौसम, पर्यावरण और जीवनशैली में तेजी से बदलाव आया है.
अंबिका प्रसाद कोटियाल (छह भाई) के पिता की बद्रीनाथ में कपड़ों की दुकान और रेस्टोरेंट था, जिसे अब वह संभाल रहे हैं. उनके अनुसार पहले यहां बादलों की गर्जना सुनाई नहीं देती थी, लेकिन पिछले दस-पंद्रह वर्षों में मौसम का स्वरूप बदल गया है. अब यहां अक्सर बादलों की तेज आवाज सुनाई देती है और बेमौसम बारिश भी होने लगी है.
*बर्फबारी घटी, नदियों में पानी कम हुआ*
अंबिका प्रसाद कोटियाल के अनुसार लगभग चालीस साल पहले मंदिर के पीछे की पहाड़ियों में अप्रैल और मई में एक से डेढ़ फुट बर्फ गिरती थी. अब बर्फबारी केवल अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर और जनवरी तक सीमित रह गई है और अप्रैल मई में बर्फबारी होती भी है तो वह चार-पांच इंच तक ही होती है. उनका मानना है कि बर्फ कम पड़ने का असर नदियों के जलस्तर पर भी दिखाई दे रहा है और पानी की मात्रा पहले की तुलना में काफी घट गई है.
धार्मिक पर्यटन बढ़ने के साथ यहां के बाजार का स्वरूप भी बदला है. उनके अनुसार पहले श्रद्धालु मुख्य रूप से मंदिर और पूजा-पाठ से जुड़े सामान खरीदते थे, लेकिन अब गर्म कपड़ों का कारोबार तेजी से बढ़ा है.
*खेती बदली, खेतों में बने किराये के ढांचे*
खेती में आए बदलाव को लेकर अंबिका प्रसाद कोटियाल के अनुसार आसपास के गांवों में पहले आलू, फाफर जैसे मोटे अनाज और मूली की खेती बड़े पैमाने पर होती थी. हालांकि पिछले करीब दस वर्षों में खेती का दायरा लगातार घटा है. अब कई लोगों ने अपने खेतों में अस्थायी झुग्गियां और कमरे बनाकर उन्हें किराये पर देना शुरू कर दिया है.
उनके अनुसार पर्यटन आधारित गतिविधियां अब स्थानीय अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बनती जा रही हैं और पारंपरिक खेती धीरे-धीरे पीछे छूट रही है.
*प्लास्टिक, कूड़ा और बदलते पर्यावरण के साथ दूषित होती अलकनंदा*
अलकनंदा नदी, कूड़े और बढ़ते निर्माण को लेकर भी स्थानीय लोग चिंता जता रहे हैं. अंबिका प्रसाद कोटियाल के अनुसार लगभग तीस साल पहले यहां बहुत कम कूड़ा निकलता था और उसमें अधिकतर मालू के पत्तों से बनी प्लेटें जैसी प्राकृतिक चीजें होती थीं, जो पर्यावरण के लिए नुकसानदेह नहीं थीं. स्थानीय लोग उसे जमीन में दबा देते थे. अब स्थिति यह है कि बद्रीनाथ से ट्रकों में भरकर प्लास्टिक का कूड़ा बाहर ले जाना पड़ रहा है.
उन्होंने तप्त कुंड को लेकर भी चिंता व्यक्त की. उनके अनुसार तप्त कुंड का गर्म पानी प्राकृतिक रूप से औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है, जिसमें श्रद्धालु दर्शन से पहले स्नान करते हैं. लेकिन अब कई लोग वहां साबुन और शैंपू का इस्तेमाल करने लगे हैं. यह पानी सीधे अलकनंदा नदी में जाकर मिल रहा है, जिससे नदी के प्रदूषण को लेकर स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ती जा रही है.
*तुलसी की महक हुई है कम और बद्रीनाथ में दिखने लगी मक्खियां*
भास्कर डिमरी, बद्रीनाथ-केदारनाथ समिति के पूर्व सदस्य भी रह चुके हैं, उनके अनुसार पिछले पंद्रह वर्षों में यहां की तुलसी में भी बदलाव देखने को मिला है. उनका कहना है कि पहले यहां उगने वाली तुलसी की महक दूर तक महसूस होती थी, लेकिन अब उसकी खुशबू और आकार दोनों कम हो गए हैं.
भास्कर डिमरी के अनुसार पिछले दो वर्षों से यहां मक्खियां और उनसे मिलते-जुलते अन्य कीट-पतंगे भी दिखाई देने लगे हैं. उनका मानना है कि बढ़ते कूड़े और बदलते पर्यावरणीय हालात इसके पीछे की एक वजह हो सकते हैं.
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