*श्रद्धालुओं को पीठ पर ढोने वाले कंडी मजदूरों के लिए शौचालय तक नहीं*
उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में हर साल हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. इनमें बुजुर्ग, बीमार और चलने में असमर्थ लोगों को कंडी में बैठाकर मंदिर तक पहुंचाने वाले मजदूर यात्रा व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं. लेकिन जिन लोगों के कंधों पर यह यात्रा टिकी है, उनके लिए बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं.
*पीठ पर श्रद्धालु और खुद टेंट में जिंदगी*
नेपाल के मुगु जिले के रहने वाले करन सिंह बद्रीनाथ में कंडी चलाते हैं. वह बताते हैं कि बुखार होने के बावजूद उन्हें काम करना पड़ रहा है, क्योंकि सीजन की कमाई से ही परिवार चलता है. करन यहां पन्नी का टेंट बनाकर रहते हैं, जिसका एक हजार रुपए किराया देना पड़ता है.
*कंडी मजदूरों के लिए शौचालय तक नहीं*
करन बताते हैं कि शौचालय के लिए उन्हें सुलभ शौचालय का इस्तेमाल करना पड़ता है, जहां हर बार दस रुपए देने पड़ते हैं. बद्रीनाथ में करीब चार सौ कंडी मजदूर काम करते हैं. इनमें 27 वर्षीय जंग सिंह भी शामिल हैं. जंग बताते हैं कि उन्होंने बारहवीं तक पढ़ाई की है, लेकिन रोजगार नहीं मिलने के कारण भारत आना पड़ा.
कंडी चलाने के लिए दो हजार रुपए का पंजीकरण कराना पड़ता है. पूरे सीजन में उनकी कमाई करीब बीस से तीस हजार रुपए तक होती है, जबकि रोजाना लगभग तीन सौ रुपए खाने में खर्च हो जाते हैं.
चारधाम यात्रा की व्यवस्था में अदृश्य श्रमिक
जंग सिंह का कहना है कि यात्रा सीजन खत्म होने के बाद कंडी वालों को निचले इलाकों में मजदूरी करने जाना पड़ता है. कई मजदूर अस्थायी टेंट में रहकर पूरा सीजन बिताते हैं. स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और रहने की व्यवस्था भी बेहद साधारण है. उन्होंने बताया कि ऑनलाइन पेमेंट आने के बाद से उन्हें अब घर रुपए भेजने में आसानी हुई है, नेपाल लौटते वक्त नकद धनराशि रखने का डर दूर हुआ है.
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