Saturday, March 6, 2021

अपनी लिपि तलाशती उत्तराखंड की दूधबोली।


कुछ वर्ष पहले दिल्ली मेट्रो में सफ़र करते दो लोग आपस में बातचीत करते सुनें, यह कुछ नया नही है हमारे चारों ओर बहुत से लोग आपस में बतियाते हैं पर मेरा ध्यान उनकी तरफ़ सिर्फ इसलिए गया क्योंकि वह मेरी दूधबोली में आपस में बात कर रहे थे। उन्हें कुमाउनी में बात करते सुन कुछ अपना सा लगा, जी कर रहा था कि उनसे बात कर लूं पर मेट्रो के संभ्रांत वर्ग वाले माहौल में मेरी हिम्मत नही हुई।

दूधबोली के प्रभाव का उदाहरण हम गिर्दा की कविताओं से ले सकते हैं । उनकी कविता 'जैंता इक दिन त आलो ऊ दिन यो दुनि में' '
जो अन्याय के खिलाफ़ संघर्ष करते रहने की प्रेरणा देती हैं की पंक्तियां
'ततुक नी लगा उदेख, घुनन मुनई नि टेक
जैंता इक दिन त आलो ऊ दिन यो दुनि में'
कुमाउनी लोगों के मष्तिष्क में ऐसा असर करती थी कि वह उन्हें सुन गिर्दा के साथ उत्तराखंड आंदोलन, प्रवासियों के दर्द को लेकर सड़कों पर उतर आते थे। 

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत भी अपनी दूधबोली के महत्त्व को समझते हैं। उनके द्वारा समय समय पर जनता से अपनी बोली के विकास को लेकर मत लिए गए हैं।

पर प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में नई पीढ़ी उन लोगों को समझती और जानती है जिन्होंने कुमाउनी या गढ़वाली भाषा के विकास में अपना योगदान दिया है।

पण्डित लोकरत्न पन्त 'गुमानी' का जन्म वर्ष 1791 में कूर्मांचल में चंद राजाओं के राजवैद्य पण्डित पुरुषोत्तम पन्त के पौत्र रूप में हुआ। लोकरत्न पन्त 'गुमानी' के पिता पण्डित देवनिधि पन्त काशीपुर में रहते थे।
 उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर में ही हुई। विवाह उपरांत वह देशाटन पर निकले और इसी काल में वह एक कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उनका संस्कृत, हिंदी, बृज , फ़ारसी, कुर्मांचली और नेपाली भाषाओं पर असाधारण अधिकार था।
'गुमानी' को खड़ी बोली हिंदी का प्रथम कवि स्थापित करने के प्रयास वर्ष 1950 के बाद हुए। उन्हें डॉ भगत सिंह ने खड़ी बोली का प्रथम कवि ही नही अपितु प्रथम राष्ट्रीय कवि घोषित किया है।

कवि गुमानी के उपलब्ध साहित्य का संग्रह टनकपुर निवासी कैलाश चन्द्र लोहनी ने किया है। कैलाश चन्द्र लोहनी का जन्म 20 अप्रैल 1942 को सतराली गांव अल्मोड़ा में हुआ । उनके पिता का नाम प्रेम वल्लभ लोहनी और माता का नाम नंदी था। पांच वर्ष की उम्र में माता का देहांत होने पर कैलाश अपने पिता के साथ उनके कार्यक्षेत्र नैनीताल रहने लगे। अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा उन्होंने नैनीताल से ही प्राप्त की और इसी दौरान उन्होंने वहां होने वाले विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू कर दिया था। कैलाश की रुचि साहित्य सृजन, शोध और पांडुलिपियों के संग्रहण में होने लगी थी। वर्ष 1964 में उन्हें बतौर शिक्षक जीआईसी श्रीनगर में नियुक्ति मिल गई थी। वहां रहते हुए ही वह नजीबाबाद रेडियो स्टेशन से भी जुड़ गए और वहां अपनी कविताओं की प्रस्तुति देने लगे थे। वर्ष 1967 में उनका विवाह अल्मोड़ा निवासी कमला से हुआ। अब नौकरी में आ रही अड़चनों की वज़ह से कैलाश चन्द्र लोहनी की लेखनी प्रभावित हो रही थी, पर उनसे बाहर निकलते ही उन्होंने महाकवि कालिदास की संस्कृत साहित्य में विश्व प्रसिद्ध अनुपम उपलब्धि ' अभिज्ञान शाकुन्तलम् ' का मूल कृति की आत्मा सुरक्षित रखते हुए कुमाउनी अनुवाद ' शकुन्तलाकि पछाण ' के रुप में किया।
इसके अलावा उन्होंने नाटककार भास के ' कर्णभारम ' का कुर्मांचली में अनुवाद किया। 

'उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान' हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत प्रमुख संस्था है। यह वही संस्था है जो पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए गणेशशंकर विद्यार्थी पुरस्कार देती है। वर्ष 1994 में कैलाश चन्द्र लोहनी को उनकी कृति ' शकुन्तलाकि पछाण ' के लिए इसी संस्था द्वारा ' सुमित्रानंदन पंत नामित ' पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया।

उत्तराखंड भाषा संस्थान देहरादून द्वारा वर्ष 2010-11 में भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट रचनात्मक अवदान के लिए उन्हें 'मौलाराम सम्मान' दिया गया।
कुमाउनी भाषा के संरक्षण और विकास के सवाल पर कैलाश चन्द्र लोहनी कहते हैं कि इस भाषा के मानकीकरण से पहले कुमाउनी लिपि का मानकीकरण हो।

मूल रूप से कुमाऊँ और वर्तमान में देहरादून निवासी चंद्रशेखर तिवारी ने अपनी पुस्तक ' लोक में पर्व और परंपरा ' के अंदर हमारी कुमाउनी पहचान को लिपिबद्ध किया है।

कुमाउनी भाषा का इतिहास इतना समृद्ध रहा है कि चन्द्रलाल वर्मा ने कुमाउनी भाषा की कहावतों पर पूरी पुस्तक ही प्रकाशित की है।

कुमाउनी के प्रभाव को स्वीकारते हुए 'साहित्य अकादमी' ने कुमाउनी के दो लेखकों मथुरादत्त मठपाल और चारु चन्द्र पाण्डे को ' भाषा सम्मान ' दिया था। यह दोनों उत्तर प्रदेश के हिंदी संस्थान के साथ अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों से भी पुरस्कृत हो चुके हैं।

2 अगस्त 2015 में टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार यूनेस्को द्वारा गढ़वाली को विलुप्त होने की कगार पर बताया गया है।

दुधबोलियों को तभी बचाया जा सकता है अगर इन्हें भी बच्चों के पाठ्यक्रम में शुरू से ही सम्मिलित किया जाए। भारतीय स्कूली शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने के लिए गठित कोठारी आयोग (1964-66) ने भी स्थानीय भाषा में शिक्षण को प्रोत्साहन दिए जाने का सुझाव दिया था। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 में शिक्षा मातृभाषा में भी हो सकती है।

 ऑनलाइन माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने के जमाने में 'गूगल इंडिक कीबोर्ड एप' ने हमारे स्मार्टफोन में यह सुविधा दी है कि अब हम गढ़वाली और कुमाउनी में भी टाइप कर सकते हैं।
जून 2018 से गुजरात में पहली से आठवीं कक्षा तक गुजराती अनिवार्य है।
पंजाब में भी दसवीं कक्षा तक पंजाबी भाषा को अनिवार्य विषय पढ़ाए जाने सम्बंधी आदेश पारित हुआ है।
उत्तराखंड सरकार ने कक्षा एक से पांच तक गढ़वाली और कुमाउनी भाषा में पाठ्यक्रम तैयार किया है। समस्या यह है कि पंजाबी तो गुरुमुखी लिपि में पढ़ाई जाएगी, गुजराती को गुजराती लिपि में पढ़ाया जाएगा पर हमारी दुधबोलियों को देवनागरी लिपि में ही सिखाए जाने की तैयारी है।

नैनीताल समाचार में देवेंद्र नैनवाल के लिखे एक आलेख के अनुसार कुमाउनी भाषा की अपनी स्वतंत्र लिपि का न होना उसके लिए अभिशाप सिद्ध हुआ है। देवनागरी के मूल अक्षर कुमाउनी भाषा हेतु पूर्णतया सक्षम नही हैं। कुमाउनी में अपने ऐसे कुछ विशिष्ट स्वर एवं ऐसी ध्वनियां हैं जिनके लिए देवनागरी लिपि में कोई स्वर या मात्राएं नही हैं और इसके बाद देवनागरी लिपि में लिखे जाने पर यह हिंदी से प्रभावित होती जाती है और अपना मूल खोते जाती है।

कुल्लू , हिमाचल प्रदेश के रहने वाले यतिन पण्डित पुरानी लिपियों के संरक्षण में लगे हुए हैं। वर्तमान में वह टांकरी लिपि के लिए नई वर्णमाला बना रहे हैं। स्वरों की बहुतायत होने के कारण टांकरी उनकी स्थानीय बोली की ध्वनियों को आराम से पूरा कर देती है। वह कहते हैं कि प्राचीन काल में टांकरी लिपि हिमाचल के साथ गढ़वाल, जौनसार और कुमाऊँ में भी प्रचलित थी। 

कुमाउनी के संरक्षण के लिए वह लिच्छवि लिपि के उपयोग को सबसे उपयुक्त बताते हैं क्योंकि लिच्छवि लिपि शारदा लिपि और सिद्धमातृका लिपि के तत्वों को समेटे हुए है जो कुमाउनी के लिए उपयुक्त है।


लिपि, भाषा किसी भी संस्कृति की पहचान होती हैं और पहचान ही किसी व्यक्ति या समाज को परिभाषित करती है। कोई भी भाषा बिना लिपिबद्ध हुए ज्यादा समय तक प्रचलन में नही रह सकती।

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