बात शुरू होती है अरस्तु ने बोला लोकतंत्र से ही तानाशाही की शुरुआत होती है और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।
बात होती है रामलला की पर इस राज्य में शतरंज की चालों पर सबको खुलेआम मात दी जाती है और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।
कानून थोप आम को तुम संगरोध करते रहे हो पर साथ ही मुखनग्न हो प्रचार खुद का भी करते रहे हो और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।
देश को आंदोलित देख तो गोरे भी भाग खड़े हुए थे पर उन्हें वह सिर्फ़ आन्दोलनजीवी नज़र आते हैं और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।
सैंकड़ो सिपाही खो यहां के मंत्री अब भी सत्ता में रहते हैं, देख पूरे हिन्द के आंसू भर आते हैं और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।
धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ फिर मरकज़-कुम्भ में दाढ़ी-दाढ़ी का अंतर देख सुन्न हूं मैं और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।
इस बेलगाम घोड़े की चाबुक किनके हाथों में है जानता हूं मैं और अब जाने क्यों मुझे इस शहर में सब मुर्दे जान पड़ते हैं।
हिमांशु
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