*राहुल गांधी ने उठाए कुछ अहम सवाल, लेकिन क्या पहाड़ के बड़े मुद्दों पर हुई पूरी बात?*
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी 4 और 5 जून को प्रस्तावित दो दिवसीय उत्तराखंड दौरे पर पहुंचे, लेकिन खराब मौसम के कारण उनका अल्मोड़ा और पौड़ी का कार्यक्रम प्रभावित हो गया. हेलीकॉप्टर उड़ान संभव नहीं होने के कारण वह निर्धारित सभाओं में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं हो सके और उन्होंने फोन के माध्यम से लोगों को संबोधित किया. अपने संबोधन में राहुल गांधी ने अग्निवीर योजना और अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया. ये दोनों ऐसे विषय हैं जो पिछले कुछ वर्षों से उत्तराखंड की राजनीति और सामाजिक विमर्श के केंद्र में रहे हैं.
हालांकि उत्तराखंड के सामने मौजूद चुनौतियां केवल इन्हीं मुद्दों तक सीमित नहीं हैं. रोजगार, पलायन, पहाड़ की स्वास्थ्य सेवाएं, धार्मिक पर्यटन का बढ़ता दबाव, पर्यावरणीय संकट और दलबदल की राजनीति जैसे कई सवाल आज भी लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहे हैं. ऐसे में राहुल गांधी के संबोधन के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या राज्य के इन व्यापक मुद्दों पर भी उतनी ही स्पष्टता और विस्तार से बात हुई, जितनी अग्निवीर और अंकिता भंडारी मामले पर दिखाई दी.
*वीरभूमि के युवाओं का सवाल, अग्निवीर के साथ रोजगार पर क्या है रोडमैप?*
उत्तराखंड को लंबे समय से सैनिकों का प्रदेश माना जाता है. राज्य के हजारों युवा सेना में भर्ती होने का सपना देखते हैं. ऐसे में अग्निवीर योजना को लेकर यहां लगातार बहस होती रही है. राहुल गांधी ने अपने संबोधन में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और योजना की आलोचना भी की.
लेकिन युवाओं के सामने सवाल केवल अग्निवीर तक सीमित नहीं है. राज्य में बेरोजगारी और रोजगार के अवसरों की कमी भी बड़ी चिंता है. हरिद्वार, पंतनगर और सेलाकुई के औद्योगिक क्षेत्रों से स्थानीय युवाओं को बड़ी उम्मीदें थीं. हालांकि विभिन्न युवा संगठनों और स्थानीय लोगों के बीच यह शिकायत अक्सर सुनाई देती है कि उद्योगों में स्थानीय युवाओं को अपेक्षित अवसर नहीं मिल रहे हैं और बाहरी राज्यों के लोगों की संख्या अधिक दिखाई देती है.
पहाड़ के कई गांव आज भी बेहतर रोजगार की तलाश में हो रहे पलायन की कहानी कहते हैं. ऐसे में युवाओं की नजर केवल अग्निवीर योजना पर नहीं, बल्कि इस सवाल पर भी है कि रोजगार सृजन को लेकर राजनीतिक दलों का ठोस रोडमैप क्या है.
*अंकिता भंडारी का नाम आज भी क्यों चर्चा में रहता है?*
सितंबर 2022 में हुए अंकिता भंडारी हत्याकांड ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था. राहुल गांधी ने अपने संबोधन में इस मामले का जिक्र किया और इसे न्याय तथा महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बताया.
यह मामला सिर्फ एक आपराधिक घटना न रहकर उत्तराखंड में महिलाओं की सुरक्षा, सत्ता के प्रभाव और न्याय व्यवस्था पर भरोसे का सवाल बन गया. पौड़ी जिले की रहने वाली अंकिता के परिवार और कई सामाजिक संगठनों की ओर से समय-समय पर मामले के सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच की मांग उठती रही है. राज्य में आज भी यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का हिस्सा बना हुआ है.
हालांकि महिलाओं की सुरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल भी महिलाओं के जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं. इसलिए महिला सुरक्षा के मुद्दे को व्यापक सामाजिक संदर्भ में देखने की मांग भी उठती रही है.
*पहाड़ के अस्पताल, जहां इलाज से पहले मिलता है रेफर*
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है. चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जैसे जिलों में रहने वाले लोगों को गंभीर बीमारी की स्थिति में अक्सर देहरादून, ऋषिकेश या हल्द्वानी जाना पड़ता है.
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, आधुनिक उपकरणों का अभाव और दूर-दराज के इलाकों तक स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. जिला अस्पतालों को मजबूत किए बिना पहाड़ की स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव संभव नहीं है.
स्वास्थ्य सेवाएं हर चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बनती हैं, लेकिन चुनावी भाषणों में यह विषय अक्सर उतनी प्रमुखता नहीं पा पाता जितनी अन्य राजनीतिक मुद्दों को मिलती है.
*आस्था भी जरूरी, लेकिन पहाड़ कितना बोझ उठाए?*
चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है. लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी हुई है. लेकिन बढ़ती भीड़ के साथ पर्यावरण और बुनियादी ढांचे पर दबाव भी बढ़ा है.
जोशीमठ भू-धंसाव के बाद विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन पर विमर्श और तेज हुआ है. पर्यावरणविदों का एक वर्ग लंबे समय से मांग कर रहा है कि धार्मिक पर्यटन को रोकने के बजाय उसे वैज्ञानिक और नियंत्रित तरीके से संचालित किया जाए, ताकि पर्यावरण को नुकसान कम हो और स्थानीय लोगों को ट्रैफिक, कूड़ा प्रबंधन तथा संसाधनों पर बढ़ते दबाव से राहत मिल सके.
उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होने वाला है.
*कैंची धाम का जाम और बढ़ती चिंता"
नैनीताल जिले का कैंची धाम पिछले कुछ वर्षों में देश के सबसे लोकप्रिय धार्मिक स्थलों में शामिल हुआ है. छुट्टियों और विशेष अवसरों पर यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या इतनी बढ़ जाती है कि भवाली-अल्मोड़ा राष्ट्रीय राजमार्ग पर कई किलोमीटर लंबा जाम लग जाता है.
पर्यटन से स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ जरूर मिला है, लेकिन लगातार बढ़ती भीड़ ने यातायात, पार्किंग और बुनियादी सुविधाओं पर दबाव भी बढ़ाया है. स्थानीय निवासियों, स्कूली बच्चों और मरीजों को भी कई बार घंटों जाम में फंसना पड़ता है.
ऐसे में धार्मिक पर्यटन के बेहतर प्रबंधन और दीर्घकालिक योजना की मांग लगातार उठ रही है. यह मुद्दा स्थानीय लोगों के लिए किसी राजनीतिक सवाल से ज्यादा रोजमर्रा की परेशानी का विषय बन चुका है.
*दलबदल की राजनीति पर क्या होगी स्पष्ट नीति?*
उत्तराखंड की राजनीति में दलबदल कोई नया विषय नहीं है. राज्य गठन के बाद कई बड़े नेता और विधायक समय-समय पर राजनीतिक दल बदलते रहे हैं. इससे राजनीतिक दलों की वैचारिक प्रतिबद्धता और जनता के भरोसे को लेकर सवाल उठते रहे हैं.
युवा मतदाताओं के बीच यह चर्चा आम है कि जो नेता एक विचारधारा और पार्टी के नाम पर वोट मांगते हैं, वे बाद में दूसरी पार्टी में क्यों चले जाते हैं. ऐसे में यह सवाल केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि सभी राजनीतिक दलों के सामने है कि वे दलबदल को लेकर कितनी स्पष्ट नीति अपनाते हैं और अपने पुराने कार्यकर्ताओं को कितना महत्व देते हैं.
हिमांशु जोशी
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