Wednesday, April 22, 2026

विश्व पुस्तक दिवस: चार किताबें, चार रंग और एक समाज की पूरी कहानी

विश्व पुस्तक दिवस पर हम साल 2022 में प्रकाशित होकर आई चार किताबों की बात करेंगे, इन चार किताबों में पहाड़ का संघर्ष, बचपन की मासूमियत, स्त्री मन की जटिलता और समाज पर व्यंग्य एक साथ दर्ज है. ये किताबें अपने समय और समाज को समझने के लिए चुनी गई हैं.

जनांदोलन, पहाड़ और बदलता उत्तराखंड

उपन्यास 'देवभूमि डेवलपर्स' में नायक और नायिका अपने-अपने सफर पर निकलते हैं, उनका ये सफर बाद में एक बन जाता है. नायक नायिका के इस सफर को 'दावानल' उपन्यास के लिए मशहूर लेखक नवीन जोशी ने उत्तराखंड के पिछले कुछ सालों में महत्वपूर्ण रहे जनांदोलनों के साथ जोड़ते हुए लिखा है. लेखक इस किताब को लिखते हुए उत्तराखंड के राजनीतिक और सामाजिक ढांचे पर भी पाठकों की समझ बनाने में कामयाब रहे हैं. 'लपूझन्ना' के लेखक अशोक पांडे द्वारा खींचा गया चित्र इस किताब का आवरण चित्र है. बर्फ से लदे हिमालय, रोलर, सड़क और बच्चे के साथ साधारण कपड़ों में खड़ी महिला को देख कर ,यह अनुमान लगाया जा सकता है कि किताब हिमालय के साथ हो रही छेड़छाड़ और पहाड़ों में रहने वाले लोगों के कठिन जीवन पर लिखी गई है. 'कूच करो भई कूच करो' इस किताब का पहला भाग है, जो हमें साल 1984 के उत्तराखंड में पहुंचा देता है. लेखक द्वारा यह किताब बहुत ही आसान भाषा में लिखी गई है , जिसकी वजह से पाठक किताब की शुरुआत में इसे पढ़ने में रुचि लेने लगते हैं. शराब के विरुद्ध आंदोलनों के दौर के साथ दुनिया भर में मशहूर चिपको आंदोलन पर लिखते हुए लेखक अपनी कहानी के मुख्य पात्र पुष्कर से पाठकों का परिचय कराते हैं. कहानी पढ़ते हुए आपकी समझ में आने लगेगा कि इसमें शामिल बहुत से पात्र और घटनाएं वास्तविक हैं. किताब के दूसरे भाग में पुष्कर की पत्नी कविता के जरिए हम सच्चे और अच्छे पत्रकार के गुण जान सकते हैं. कविता के जरिए लेखक ने पत्रकारिता के छात्रों को बहुत सारी सीखें देने की कोशिश करी है. 'बहुत सुंदर है हमारा गांव. कविता की नजरें हिमालय के शिखरों पर टिकी थी. काश,जीवन भी सुंदर होता. पुष्कर ने आह भरी' यह पंक्ति पहाड़ में रहने वाले लोगों के द्वारा उठाए जा रहे कष्टों की तरफ इशारा करती है. इस भाग को आगे पढ़ते हुए हमें पहाड़ों में पिनालु का साग उगाने और मधुमक्खी पालन जैसे स्वरोजगारों के बारे में जानकारी मिलती है. 'कोई कह रहा है छोटी जात की है. किसी ने चला दी, मुशई (मुसलमान) से ब्या किया है. मैंने बता रखा है, देसी है मगर बामण है. तू यही कहना' पंक्ति पहाड़ में व्याप्त जातिवाद को दर्शाती हैं. इस किताब में अन्य कई जगह भी उत्तराखंड में व्याप्त जातिवाद के कारणों को गहराई से समझाया गया है, पुष्कर का जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाना कहानी का सबसे जरूरी हिस्सा भी जान पड़ता है. किताब का तीसरा भाग 'बाँध दी गई नदी में डूबता समाज' है.  यह उत्तराखंड के निर्भीक पत्रकार उमेश डोभाल के बारे  में बहुत सी जानकारी देता है. यहां पर उत्तराखंड में जल-जंगल-जमीन के लिए सालों से लड़ रहे लोगों के आपसी सम्बन्धों के बारे में भी लिखा है. टिहरी बांध बनने से रोकने के लिए चले संघर्ष और उस संघर्ष की नाकामी पर लेखक ने यहां बहुत कुछ लिखा है.  'विस्थापन सिर्फ मकान और आदमी का नही होता, पूरी सभ्यता, समाज, संस्कृति और जीवन स्त्रोतों से उखड़ जाना होता है' पंक्ति लिख कर लेखक ने विस्थापितों का दर्द समझाने की कोशिश की है. 'राजधानी से राज्य छुड़ाकर लाना है' इस रोचक उपन्यास का अगला भाग है और इस भाग में शराब से पहाड़ के जीवन पर पड़ते बुरे असर की शुरुआत को सामने लाया गया है. खटीमा, मसूरी गोलीकांड के समय में मीडिया की क्या भूमिका रही थी,  किताब पढ़ते हमें इसकी जानकारी भी मिलती जाती है. 'शांत हिमालय धधक रहा है' किताब का पांचवा भाग है और इसे पढ़ते कहानी के समय में उत्तराखंड को लेकर चल रही फेक न्यूज बनाम 'समाचार' के बारे में जानकारी मिलती है. समाचार द्वारा साल 1994 में जनता तक सही खबरें पहुंचाए जाने का तरीका पढ़ने योग्य है. मैदान से पहाड़ जाने के दौरान बदलती दशा को सामने लाने के लिए किताब की यह पंक्ति 'हल्द्वानी से आगे पहाड़ चढ़ने पर प्राकृतिक दृश्य ही नही बदलता, आबादी की संरचना और हालात भी बहुत बदल जाते हैं' महत्वपूर्ण है. किताब के इस भाग में अतुल शर्मा और नरेंद्र सिंह नेगी जैसे जन कवियों की कविताओं के साथ ही उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था, राजनीति के बारे में भी लिखा गया है. किताब में बहुत सी जगह ऐसी हैं जहां लेखक ने अपने शब्दों के जरिए उत्तराखंड के पहाड़ों की खूबसूरती का मनमोहक दृश्य पाठकों की आंखों के सामने साक्षात रख दिया है. अगला भाग आपको उत्तराखंड राज्य गठन के आसपास वाले समय में पहुंचा देता है और इसकी शुरुआत पुष्कर द्वारा नए राज्य को लेकर बुने गए सपनों के टूटने से शुरू होती है.  उत्तराखंड गठन के दिन को लेखक ने बड़े बेहतरीन तरीके से लिखा है. इसे पढ़ते नायक की उधेड़बुन पाठक को खुद की उधेड़बुन महसूस होने लगती है. पृष्ठ संख्या 205 में लिखी हुई पंक्ति 'कुंदन को अफसोस हुआ कि वह लखनऊ में उत्तराखण्डियों को सस्ते प्लॉट दिखाने में इतना व्यस्त रहा कि अपनी मातृभूमि की ओर उसका ध्यान ही नही गया' उत्तराखंड में भूमाफियाओं के कब्जे की शुरुआती दिनों की स्थिति दर्शाती है. इस कहानी की मदद से आप उत्तराखंड की राजनीति में दो पार्टियों के बढ़ते वर्चस्व और क्षेत्रीय पार्टियों के पतन की गणित भी समझ सकते हैं. किताब में लेखक ने उत्तराखंड से पलायन करने के नुकसान और पलायन रोकने के समाधान को भी बड़े ही रोचक तरीके से लिखा है. 'श्याम दत्त जी के लिए सबसे पीड़ादायक अपने बैल से बिछड़ना रहा। उनसे अपने कान खुजलाए बिना वह गोठ में  बंधता न था' पंक्ति को पलायन झेलने वाला ही समझ सकता है. पृष्ठ संख्या 227 और 228 में गैरसैंण राजधानी आंदोलन की घटना को इस तरह से लिखा गया है ,मानों वह सब आंखों के सामने ही घटित हो रहा हो. अगले भाग 'विकास अर्थात ट्रिकल डाउन इकोनॉमी' में कहानी डाम से जूझते हुए उत्तराखंड पर पहुंचती है और फिर त्रेपन सिंह चौहान द्वारा चलाए गए फलेण्डा आंदोलन पर लिखा गया है.  किताब का अंतिम भाग 'देवी का थान पतुरिया नीचे' कुछ सालों पहले घटित नानीसार की घटनाओं पर केंद्रित है और इसे पढ़ाते हुए लेखक आपको उत्तराखंड के आज तक पहुंचा देते हैं. लेखक नवीन जोशी ने इस उपन्यास के जरिए पाठकों को अपने लोगों और उनके साथ अपनी धरती से जो प्रेम करने की सीख दी है, उसके लिए यह उपन्यास खरीदना आवश्यक है.


बचपन, दोस्ती और छोटे शहर की दुनिया


2022 में 'लपूझन्ना' एक उस्ताद के लिए उसके शागिर्द की तरफ़ से लिखी खूबसूरत कहानी है। लेखक अपने बचपन की याद अब तक नही भुला सके हैं और उन यादों में लेखक का ख़ास दोस्त भी है, ये वो ख़ास दोस्त है जो हम सब की ज़िंदगी में कभी न कभी तो रहा ही है और उसको हम हमेशा याद करते हैं।  अपनी दीदी की घड़ी चोर उसके पैसे से जियाउल को घड़ी गिफ़्ट करने वाला लफत्तू लेखक असोक का हीरो है। लपूझन्ना हमारी अपनी ही कहानी है, इसमें लपूझन्ना हम ही हैं जिसके लिए ये दुनिया बहुत छोटी है इतनी छोटी कि हम अपने दोस्तों के साथ धमाचौकड़ी मचाते इसे पूरा नाप लेना चाहते हैं। 

किताब का आवरण चित्र अंग्रेज़ी की कहावत 'डोंट जज ए बुक बाई इट्स कवर' को झुठला देता है, यह किताब के प्रति एक उमंग सी जगा देता है, इस उमंग को पहचानने की कोशिश करो तो यह वही जान पड़ती है जो बचपन के दिनों दिन भर नंगे पैर क्रिकेट खेलते, एल्युमिनियम के तार वाली गाड़ी चलाते महसूस होती थी। पिछले आवरण में लेखक की फ़ोटो के साथ उनका परिचय दिया गया है, जो जरूरी था। क़िताब की शुरुआत संजय चतुर्वेदी के लिखे पत्र से होती है। जिसमें सादिक, मख्लूक जैसे अरबी शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, पत्र से पता चलता है कि क़िताब उत्तराखंड के छोटे से कस्बे रामनगर के बैकग्राउंड पर लिखी गई है। इसके बाद 'मंज़रों में था जो शहर बसा' किस्सा शुरू होता है, लेखक ने देशज और विदेशज शब्दों के मिश्रण का प्रयोग कर कमाल लिखा है।  लेखक पाठकों को अपने बचपन की कहानी बताते  किताब आगे बढ़ाते हैं, बाल मन के अंदर दूसरे धर्म और दूसरे लिंग के प्रति उमड़ते सवालों को जानते आपका मन किताब में लगना शुरू हो जाएगा। 'बागड़ बिल्ले का टौंचा' जैसा शीर्षक पढ़ आपको बच्चों के खुराफाती दिमाग की याद आने लगेगी तो 'पदाया' शब्द आपकी भूली बिसरी डिक्शनरी में फिर जुड़ जाएगा। लेखक पाठकों को क़िताब पढ़ाते उनके दिमाग और ज़ुबान के साथ खेलते भी दिखते हैं। एक तरफ़ अपने दोस्त लफत्तू की तुतलाती ज़ुबान से निकला "पैतै काटो अंकलजी औल अपना काम कलौ" वाक्य हूबहू लिख लेखक पाठकों को तुतला बनाते हैं तो दूसरी तरफ़ बागड़बिल्ले की आंख का वर्णन जिस तरह किया गया है वह ऐसी आंखों की तस्वीर सचमुच मन में बना देता है। रामनगर की भौगोलिक स्थिति का खाका भी बेहतरीन तरीके से खींचा गया है। इंटरनेट युग में जब हम अपने आसपड़ोस में रहने वाले लोगों को जानते तक नही हैं। तब लेखक के उनके बचपन में पड़ोसियों से सम्बंध के बारे में पढ़ना, घर से दूर तक की जानकारी रखना, रामलीला जाना, क्रिकेट खेलना एक परीकथा सा लगता है। लेखक अपने जीवन के किस्सों को पाठ का रूप देते पाठकों को किताब से जोड़े रखते हैं। 'चोट्टे लफत्तू' शब्द के साथ बौने की साइकिल और उसकी जिंदगी की कहानी आपको हंसा देगी। ऐसा नही है कि किताब पाठकों को सिर्फ़ हंसाने भर के लिए ही लिखी गई है 'टांडा फिटबाल किलब और पेले का बड़ा भाई' खिलाड़ियों की बदहाली बताने के साथ शुरू होता है और मौका न मिलने वाले खिलाड़ियों की आंखों देखी दास्तान सुनाने के साथ ख़त्म होता है। 'नौ फुट की खाट और ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रपति का आगमन' पढ़ आपका मन रामनगर घूम आने को करने लगेगा। क्रिकेट के बारे में लिखा पढ़ आपको हाल ही में आई फ़िल्म '83' भी याद आ जाएगी। ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रपति के आगमन का दृश्य तो पाठकों को उसी समय में वापस ले जाएगा।  अब तक पाठक किताब की देशज-विदेशज भाषा में रम जाएंगे। लफत्तू और तिवारी मास्साब का डुओ आपको अपने स्कूली दिन याद दिलाने के साथ हंसाते हुए लोटपोट भी कर देगा। लफत्तू इस किताब का जॉनी लीवर है और उसके महिमामंडन में लिखी यह पंक्ति इसे साबित भी करती है ' लफत्तू तब तक महाचोर के रूप में इस कदर विख्यात हो चुका था कि अपने घर से उसे एक अख़बार तक लाने नही दिया जाता था। जब वह एक बार ड्रेस पहनकर रेडी हो जाता तो उसके पिताजी उसे दुबारा पूरी तरह नंगा करते और बस्ता खाली करवाकर जमातलाशी लेते थे'। 'ब्रेस ब्रेस, ब्रेसू टी थानी जो दल गया वो मल गया' में साईंबाबा की अफवाह और मधुबाला से आशिकी करवा लेखक द्वारा बाल मन के एक अलग खिंचाव की तरफ चमक मारी गई है। किताब में बाल मन पर फिल्मों से पड़ने वाले प्रभाव को बड़े प्रभावी तरीके से पाठकों को समझाया गया है। 'ख' और 'भ' की अदला बदली वाले खेल में लेखक ने अपनी लेखन कला के झंडे गड़वा दिए हैं। किताब में आपको कम सुनाई देने वाला 'गुरुपुत्र' शब्द भी पढ़ने को मिलता है। शीर्षक 'फुच्ची कप्तान की आसिकी' पढ़ने से विलुप्त होती लवलैटर प्रथा फ़िर याद आती है तो लफत्तू का अपने पापा को "बल्ब को भल्ब कैते हो आप! क्या खाक इंग्लित पलाओगे पापा" कहना आपको भी किताब का हिस्सा बनाता है। ये सब किताब के वो हिस्से हैं जो हिंदी किताबों को पढ़ने का ट्रेंड फिर शुरू करा सकते हैं, 'झुकेगा नही' कहने वाले पुष्पा की तरह लफत्तू भी देश का जाना माना पात्र बनने की क्षमता रखता है। गोबर डॉक्टर, जगुआ पौंक जैसे नाम दिए जाने के पीछे की कहानी भी लेखक द्वारा विस्तार से लिखी गई है।  'रामनगर का कलापारखी समाज पूर्णमुदित हो जाता' जैसी पंक्ति लेखक की हिंदी में मज़बूत पकड़ की तरफ़ इशारा करती है। 'ज्याउल ,उरस की मूफल्ली, मोर्रम और ब्रिच्छारौपड़' पढ़ते पता चलता है कि बच्चों के मन में कैसे बचपन में ही हिन्दू-मुसलमान के बीच दूरी के बीज उगा दिए जाते हैं। आगे पढ़ते किताब वो दिन भी याद दिलाती है जब अमीर-गरीब के बच्चे साथ ही पढ़ा करते थे। लफत्तू द्वारा भिखारी को बैरिंगगाड़ी में बैठा घुमाने वाला किस्सा खूब हंसाएगा, तो कुछ समय बाद किताब पाठकों को इमोशनल करना शुरू हो जाएगी।  अब एक बेहतरीन कहानी अपने अंत की तरफ़ बढ़ती दिखती है। नसीम अंजुम की एंट्री किसी अभिनेत्री से कम नही है। 'नसबंदी और लकड़ी का रैक' की शुरुआत मुंह में पानी ले आती है। चीनी की सब्ज़ी का किस्सा पाठकों को किताब के आख़िरी पन्नों में भी फिर से गुदगुदाता है। पृष्ठ 216 में किताब का सार है, क़िताब खत्म करने पर आपका मन जरूर करेगा कि कभी लेखक से मिल उनसे लफत्तू, बागड़बिल्ले के बारे में ढेर सारे सवाल पूछ लिए जाएं और बमपकौड़ा खाने के लिए लेखक की कल्पनाओं के खुले आकाश में उड़ रहे नक्शे अनुसार रामनगर पहुंचा जाए। 

स्त्री मन, पहचान और सामाजिक सच्चाई

अमूमन कई मर्द ये मानते हैं कि औरत का सिर्फ एक ही रूप है और औरत ने वो रूप सिर्फ उसके लिए ही धारण किया है. लेकिन एक औरत के कई रूप होते हैं और सिर्फ उसका रूप रंग ही उसकी पहचान नही है.  साठ से अधिक फिल्मों में काम कर चुकी अभिनेत्री सुष्मिता मुखर्जी की लिखी किताब 'बांझ' एक औरत के ढेर सारे रंगों को हमारी आंखों के सामने लाती है. 

2022 में प्रकाशित इस शानदार किताब के आवरण चित्र में एक स्त्री की पेंटिंग है और इसे गौर से देखा जाए तो ऐसा लगता है मानो स्त्री में पूरी सृष्टि ही समाहित है. पिछले आवरण में आपको किताब के अनुवादक दीपक दुआ और लेखिका सुष्मिता मुखर्जी के बारे में जानकारी मिलती है. इसमें लिखा है यह किताब 11 कहानियों का संग्रह है और यह कहानियां इस बात को स्थापित करती हैं कि एक औरत का महत्व समाज द्वारा उस पर लगाए गए ठप्पों से कहीं अधिक है. यह बात सत्य तो है पर किताब की कहानियां इस सत्य के साथ कितना न्याय कर सकी हैं यह आप किताब पूरी पढ़ने के बाद ही बता सकेंगे. 'समर्पण' के दो शब्द 'खुरदुरी बुनाई' ही आपके दिल के तार हिला देंगे.यहां पाठकों के मन में 'शुरुआत ऐसी तो अंत कैसा' विचार आने लगेगा. किताब के परिचय में सुष्मिता ने जिस तरह से अपनी जीवन यात्रा को समेटा है ,उसे पढ़ ऐसा लगता है मानो वह इस किताब के जरिए ऐसा कुछ कहना चाहती हैं जो वह आज तक किसी से कह न पाई हों. अनुवादक दीपक दुआ ने भी सुष्मिता के उन विचारों को भली-भांति समझ कर बड़ी खूबसूरती से हिंदी पाठकों तक पहुंचाया है. किताब का शीर्षक बांझ, इस किताब की पहली कहानी का नाम भी है. रुक्मिणी के चेहरे और बिछौने का वर्णन जिस तरह से किया गया है, वह उसके नीरस जीवन की तरफ इशारा कर देता है. कहानी में एक के बाद एक कई पंक्तियां आपको एक स्त्री के जीवन की सच्चाई से परिचित कराती हैं. 'शादी के बाद माता पिता ने उसे ऐसे भुला दिया जैसे कोई हिसाब पूरा हो जाने के बाद पर्चा फाड़ दिया जाता है' पंक्ति हमारे देश की बहुत सी औरतों की सच्चाई सामने रखती है. बांझ कहानी में लेखिका द्वारा हमारे समाज में पितृसत्ता के वर्चस्व और उसके खात्मे के समाधान को लिख दिया गया है, पितृसत्तात्मक समाज के अंत का जो तरीका इस कहानी में लिखा गया है शायद वो कई पाठकों को सही न लगे पर यह पाठकों पर है कि वह इसे कैसे रूप में लेते हैं. किताब की दूसरी कहानी भारत के उन लोगों की सच्चाई है ,जो बड़ी-बड़ी इमारतों के पीछे छिपे रहते हैं और हम उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते. पेट की मजबूरी इन गरीबों से क्या कुछ कर कराती है ,लेखिका अपनी कहानी के जरिए पाठकों तक उनकी कहानी बड़े ही भावुक तरीके से पहुंचाती हैं. 'साकरी बाई' की शुरुआत में पाठक भी साकरी बाई को पुकारने लगेंगे. इस कहानी में हम पढ़ते हैं कि हमारे समाज में एक औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन है. किताब में आपको बार-बार महिलाओं की पहचान उनकी सुंदरता (जिसमें रंग और कद काठी को मानक बना दिया जाता है) से किए जाने का अहसास होगा और हम अपने आसपास देखें तो यह वास्तविकता ही है. 'यादें, लाल नाक की' कहानी में 'सफेद, शोक में डूबे रंग वाली' पंक्ति में लेखिका सफेद रंग को शोक वाला रंग करार दे पाठकों को ऐसी शोक सभाओं की याद दिला देती हैं ,जहां सभी लोग सफेद वस्त्र धारण किए होते हैं. रिश्तो की जटिल गणित पर लिखी गई यह कहानी अपने अंत से पाठकों को कुछ देर तक फिर से इस कहानी को सोचने पर मजबूर कर देगी. हम सब अपनी जिंदगी में कुछ ना कुछ ढो ही रहे हैं और उससे मुक्ति चाहते हैं. रिश्तो से मुक्ति भी इसमें शामिल है और इसी मुक्ति से जुड़ी एक कहानी भी लेखिका ने बड़ी रोचकता के साथ लिख डाली है. स्टारबज्ज कहानी में दुर्गा का ड्राइवर के सामने लगे शीशे में खुद को निहारना, पसंद करना, इस बात की निशानी है की अधिकांश महिलाएं खुद को एक सौंदर्य उत्पाद के रूप में स्वीकार कर चुकी हैं. वह खुद चाहती हैं कि लोग उनके रूप रंग को निहारे लेकिन वह अपनी असली ताकत को नहीं पहचानती. कहानी में लेखिका ने दुर्गा के वर्तमान से शुरू होकर उसके अतीत की कहानी को बड़े ही बेहतर तरीके से लिखा है और इस कहानी का अंत भी किताब की अन्य कहानियों की तरह ही पाठकों की सोच से परे है. बड़ी बिंदी और छोटी ड्रेस कहानी के कुछ शब्द कई पाठकों को अश्लील लग सकते हैं और हो भी सकता है कि वो इनको लेकर हो-हल्ला मचाएं. ऐसे देश में जहां महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे शब्द महिलाओं का सम्मान न करने वाले लोगों की सोच को आइना दिखाने के लिए बिल्कुल सही हैं  औरतों का बड़ी बिंदी वाली औरत और छोटी ड्रेस वाली औरत के रूप में बंटवारा, भारत के घर-घर की कहानी है. महिलाओं को इस रूप में भी बांट दिया गया है. किताब में कहानियों के शीर्षक बड़े ही सटीक हैं और नीचे दिए गए पृष्ठों की संख्या के चारों और की गई ग्रे शेड पाठकों का ध्यान खींचती हैं. लेखिका ने कभी खुद ही कहानी का एक पात्र बनकर कहानी लिखी है तो कभी दर्शक बनकर. 'मुझे लगता है इस किस्म के रचनात्मक लोगों की बीच प्यार का अंकुर नहीं फूटता, सीधे फूल ही खिलता है' पंक्ति लेखिका खुद रचनात्मक होने की वजह से ही लिख पाई हैं. बे-पर परिंदा कहानी में एक मां बनने जा रही महिला का कबूतर के बच्चों से लगाव, इस किताब का आकर्षण है. ये कहानी सन्देश देती है कि एक औरत ही अपने परिवार को एक साथ रखती है.  'उम्र भर के दोस्त' कहानी ऐसे लिखी गई है मानो सुष्मिता पाठकों के सामने बैठकर उन्हें यह कहानी सुना रही हों. यह किताब की एकमात्र ऐसी कहानी है जिसमें स्त्री से ज्यादा पुरुष को महत्व दिया गया है. 'शालीमार' वो कहानी है जिसे पढ़कर लगता है कि अगर किताब का नाम बांझ न होता तो शालीमार होता. पृष्ठ संख्या 76 के अंत की कुछ पंक्तियां पढ़ एक औरत की मजबूरी समझी जा सकती है. किताब की अंतिम कहानी 'अफेयर' में श्रीला ने उन महिलाओं का प्रतिनिधित्व किया है जो अपना परिवार संभालने की व्यस्तता में अपना सपना भूल चुकी हैं. कहानी का अंत पढ़ आप महसूस करेंगे कि महिलाएं हमेशा से ही पुरुषों से ऊंचा उड़ सकती हैं. लेखिका भी तो यही चाहती थी कि समाज ने जो ठप्पा औरत की छवि पर लगा दिया है इस किताब को पढ़ समाज समझे कि औरत को ऐसे किसी ठप्पे की जरूरत नही है. बहुत सी किताबों से अलग इस किताब का आभार अंत में है. लेखिका ने दीपक दुआ द्वारा किए अनुवाद में जिन रूपकों के प्रयोग की बात करी है, वास्तव में उनसे कहानियों की खूबसूरती बढ़ी है.  आखिरी पन्नों में लेखिका और अनुवादक का परिचय पिछले आवरण में भी दिया है इसलिए उसकी कोई आवश्यकता नही लगती, हां प्रकाशक के बारे में जानकारी वाला पन्ना सही है. 

व्यंग्य, किस्से और समाज का आईना

साल 2022 की एक और शानदार कृति 'बब्बन कार्बोनेट' कई किस्सों को साथ मिलाकर लिखी गई एक ऐसी किताब है जिसमें सामाजिक कुरीतियों, दिखावे के ऊपर पारंपरिक तरीके से नही बल्कि व्यंग्यात्मक तरीके से प्रहार किया गया है.  

 किताब का आवरण चित्र 'द जंगल बुक' की याद दिलाता है और आपको इस चित्र के चित्रकार के बारे में किताब के शुरुआत में जानकारी मिल जाती है. 'सियाही स्टूडियो' ने किताब के आवरण को जिस मेहनत से तैयार किया है, उसका नतीजा यह है कि पाठक किताब हाथ में पकड़ते ही खुद को तरोताज़ा सा महसूस करेंगे.  किताब का पहला पन्ना तीन दशक का लेखन अनुभव लिए किताब के लेखक अशोक पाण्डे का परिचय देता है. इन तीन दशकों में लेखक ने 'लपूझन्ना' जैसी चर्चित किताब लिखी है तो वह लोकप्रिय वेबसाइट का 'काफल ट्री'के संस्थापक संपादक भी रहे हैं. 'विलक्षण हाजिर जवाब एंग्री यंग मैन के साथ' हिंदी के मशहूर कवि मृत्युंजय का लिखा है, किताब में इस्तेमाल की गई भाषा पर मृत्युंजय लिखते हैं 'वैसे तो यह किताब देशज भाषा में लिखी गई है, जहां स्थानीयता की बहार है पर संस्कृत शब्दावली को व्यंग के लिए इस्तेमाल करने की तकनीक में यह किताब दक्ष है'. किताब पढ़ने के बाद आप लेखक की इस बात पर ही सबसे ज्यादा प्रभावित भी होंगे. अनुक्रम के ज़रिए यह पता चलता है कि किताब में 49 अलग-अलग किस्सों को लिखा गया है. किताब हर उम्र के लोगों के लिए लिखी गई, इसमें बच्चों के मन मे चलने वाली खुराफात है तो वयस्कों के संसार से जुड़े किस्से भी हैं. 'गरमपानी के नारायण राम मास्साब का किस्सा' जैसे शुरुआती शीर्षक से आपको यह विश्वास हो जाएगा कि इतने शानदार आवरण के बाद पाठकों को किताब के अंदर भी कुछ ना कुछ शानदार पढ़ने को जरूर मिलेगा. 'मैग्नीफाइंग' ,'अप्रेंटिस' जैसे विदेशज शब्द और 'झूलसैंण', 'भिन्नोट' जैसे देशज शब्द के साथ लिखे गए किस्से आपको अपनी ज़िंदगी के रोज़ के किस्से जैसे ही लगेंगे. किताब में एक जगह हनीमून को 'मधुमास' लिख दिया गया है. यह शब्द विश्वास दिलाता है कि ऐसे प्रयोगधर्मी हिंदी लेखक ही हिंदी भाषा को अंग्रेज़ी पर बढ़त दिलाएंगे. 'टेलर मास्साब' खिताब की तुलना 'शास्त्रीय गायक उस्ताद' से करना लेखक का अपना ही कमाल है.  किताब पढ़ते आप उत्तराखंड भ्रमण पर भी रहेंगे, खासतौर पर नैनीताल के आसपास पड़ने वाले इलाकों में ही अधिकतर कहानी अपने अंजाम पर पहुंची थी. 'फलाणी चीज़ के चक्कर में मित्र कुत्ता बन गया है' पंक्ति जिस किस्से में इस्तेमाल की गई है, वह हम अपने मित्रों के साथ दिन भर कई बार साझा करते हैं और लेखक की यही खूबी है कि वह ऐसे विचारों को सही जगह सही समय पर इस्तेमाल करने के लिए सहेज कर रखते हैं. इस किताब के किस्से ऐसे नही हैं कि आप उन्हें पढ़ें और फिर भूल जाएं, इन पन्नों को आप हमेशा के लिए याद रखना चाहेंगे ताकी चालीस साल बाद भी आप उन्हें किसी को सुना सकें. लेखक की एक खास बात है, उन्होंने बहुत सी कहानियों को व्यंगात्मक तरीके का इस्तेमाल करते हुए खुद से जोड़ा है. जैसे एक जगह वो लिखते हैं 'उन्हीं के धूम्र भण्डार में डाका डाल कर मैंने और खानदान के तकरीबन दस चचेरे-ममेरे भाइयों ने सिगरेट की लत हासिल की थी'. 'माधुरी दीक्षित, नानाजी और पानी की बोतल' किताब का सबसे खूबसूरत किस्सा है. इस किस्से में एक आदमी का अपने रिश्तों के प्रति प्रेम दिखता है, साथ उसका सामाजिक विषयों पर आत्ममंथन भी है. इस तरह व्यक्ति के सामाजिक और व्यक्तिगत, दोनों तरह के जीवन पर सुंदरता से प्रकाश डाला गया है. पृष्ठ 28 में शव के हालात का लेखक ने जिस तरह से वर्णन किया है उसके बाद लेखक का नाम स्वतः ही भारत के अग्रणी हिंदी लेखकों में दर्ज हो जाएगा. इस किताब में आपको 'पदिया गांठी', 'गुट्टू भाई', 'जिबुवा बिरालु' जैसे कई मज़ेदार नाम भी मिलते हैं और उनके पीछे की कहानी भी बड़ी रोचक है. लेखक ने कुछ इसी तरह का प्रयोग अपनी किताब 'लपूझन्ना' में भी किया था, जो काफी सफल रहा था. आगे पढ़ते आपको लेखक द्वारा वर्तमान पत्रकारिता पर लेखक द्वारा किया गया एक तगड़ा व्यंग्य दिखेगा, जो आज के हालातों पर बिल्कुल फिट बैठता है. लेखक लिखते हैं 'अपने असमय निधन से पहले 'हिमालयी नवोन्मेष' नाम से बेहैसियत प्रकाशक-सम्पादक-पत्रकार-हॉकर एक टुकड़िया अनियतकालीन पाक्षिक अख़बार भी निकालने लगे थे क्योंकि उन्हें भनक थी कि ऐसे टुच्चकर्मों को बहुत सम्मान दिए जाने का युग जल्द ही आने को था'. लेखक ने किताब में कई प्रयोग किए हैं जैसे एक जगह उन्होंने लिखा है 'गुट्टू भाई की ज़बानी है' यहां लेखक गुट्टू भाई बन खुद के शब्द लिख पाठकों को ही गुट्टू भाई बना देते हैं. एक जगह लेखक लिखते हैं 'आंख बंद कर के पैले दिमाग के अंदर लाल पॉइंट को ढूंढना होगा और उसके बाद उसी को देखता रैना' इसे पढ़ पाठक लेखक के कहे का अनुसरण भी करने लगते हैं. 'मारुति वैन में इस जगह बैठने वाली सवारी को अपनी दोनों टांगे गीयर के इधर-उधर रखनी होती थी' इस पंक्ति में इतनी क्षमता है कि पाठकों के मन में इस तरह वैन में बैठने की छवि उभर आना स्वाभाविक है. इसी तरह अंग्रेज द्वारा बोले गए 'टुमको दो गन्टा दीया नरेन' वाक्य से आप भी हेनरू लाटा बन जाएंगे. किताब के ज़रिए पाठक को 'सांप के कान के नीचे वाले माल' जैसा नया मुहावरा सीखने को मिलता है. सामाजिक कुरीतियों पर व्यंग्य करती कहावत 'भूसा भरण और शादी के रिसेप्शन,आंधी-तूफान या बर्फ बाढ़ की परवाह नहीं करते, होकर रहते हैं' इस किताब का आकर्षण है. लेखक ने किताब के ज़रिए पहाड़ों से जुड़ी कहावतों को दुनिया तक पहुंचाने का प्रयास किया है, जैसे वह लिखते हैं 'हमारे इधर तिवारी लोग तिवाड़ी कहे जाते हैं'. आगे के किस्सों में टीनएजर्स में नशाखोरी की आदत पर भी लिखा गया है. लेखक लगभग हर किस्सों में पाठकों के लिए संस्पेंस बनाए रखने में कामयाब रहे हैं. 'तस्व्वुर' शब्द का प्रयोग पढ़ने में अच्छा लगता है तो 'स्कूलसखा' शब्द भविष्य में प्रयोग होने के लिए पाठकों की डिक्शनरी में खुदबखुद शामिल हो जाता है. बीयर और रम के लिए 'पी गई' की जगह 'समझी गई' का प्रयोग करना हिंदी जगत में नया-नया है. किताब में पहाड़ पर भी बहुत कुछ लिखा गया है. 'पहाड़ के लिए कुछ करने का जज़्बा' में लेखक द्वारा पहाड़ों से हो रहे पलायन जैसे गम्भीर मुद्दे को बड़ी खूबसूरती से छू लिया गया है.  'हिमालय की धवल श्रंखलाएं अपनी पूरी धज में थी' पंक्ति के ज़रिए हिमालय की जो छवि पाठकों के मन में छोड़ी जाती है, वह उनको हिमालय भ्रमण के लिए उकसाने में कामयाब रही है. 'दलिद्दर कथा' किस्से के ज़रिए लेखक ने एक ऐसे विषय पर बात की है जिसे अक्सर गम्भीरता से नही लिया जाता. उन्होंने पीढ़ियों से पहाड़ों में रह रहे मुसलमानों के प्रति हो रहे व्यवहार पर बड़े व्यंग्यात्मक तरीके से लिखा है. बड़ी-बड़ी बातों को सहजता से लिख जाना ही लेखक की सबसे बड़ी खूबी है. पति-पत्नी की झिकझिक वाली प्यारी कहानी और उसमें पीक भरे मुंह से निकले शब्दों को वैसा ही लिख देना, किताब से पाठकों को बांधे रखता है. 'भीमताल का सुतली वाला कुत्ता' किस्से में कुत्ते के गले में सुतली की बात सोच कर ही आप हंसने लगेंगे. कुत्ते के रंग और शरीर का वर्णन लाजवाब है. पृष्ठ '86' वह पन्ना है जिसके लिए आप किसी किताब को खरीदने के लिए दस हज़ार रुपए भी खर्च कर दें तो कम हैं. इस किस्से को पढ़कर लगता है कि अगर लेखक ने किताब का नाम 'सुतली वाला कुत्ता' रख दिया होता तो बेहतर होता. किताब को प्रचारित करने का एक उपाय यह भी हो सकता था कि इस पन्ने को देश की गली-गली पर चिपका दिया जाता. किताब का शीर्षक जिस किस्से से लिया गया है, लेखक के सामने उस किस्से को पाठकों के सामने साबित करने का भारी दबाव है , क्योंकि किताब के अन्य किस्से बहुत ही आला दर्जे कह रहे हैं. यह वाला किस्सा थोड़ा अडल्ट टाइप का है और किस्से में लिखी गई कुछ जगहों के बारे में जानकारी लेने के लिए आपको गूगल का सहारा लेना होगा क्योंकि किताब के सारे पाठक तो नैनीताल से नहीं होंगे ना. 'जयसंकर सिज़लर' किस्से में छोटे शहर के लोग बड़े शहरों के बारे में जो कुछ भी सोचते हैं उस सच्चाई को लेखक द्वारा बड़े ही व्यंग्यात्मक तरीके से लिख दिया गया है. 'पूरन दा और तेल का कनस्तर' किस्सा किताब के हर किस्से की किसी न किसी खूबी को खुद में समेटा हुआ है. 'हम सब तोंदू हैं' में लेखक ने जिस तरह से श्मशान का लाइव चित्रण किया है, उसे आप बड़े ध्यान से पढ़ेंगे. किताब खत्म होते-होते 'लौंडा पटवारी का' किस्सा आपको पेट पकड़ हंसा देता है. इस किताब के ज़रिए लेखक ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर उसे समझने का भार अपने पाठकों पर छोड़ दिया है, यह अब 'बब्बन' के पाठकों पर है कि वह अपने प्रिय लेखक की बातों को किस तरह से लेते हैं, वह इसे गम्भीरता से समझते हैं या हंस कर भूल जाते हैं.


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