Saturday, April 4, 2026

बाली के महल पर सवाल, हम्पी की कहानी पर चर्चा: दून लाइब्रेरी में किताब का लोकार्पण

*बाली के महल पर सवाल, हम्पी की कहानी पर चर्चा: दून लाइब्रेरी में किताब का लोकार्पण*


‘हम्पी: उत्कर्ष से अपकर्ष तक’ पर चर्चा, इतिहास और दावों पर भी सवाल


दून लाइब्रेरी, देहरादून में इस शनिवार लेखक तापस चक्रबर्ती की पुस्तक ‘हम्पी: उत्कर्ष से अपकर्ष तक’ का लोकार्पण किया गया और इसके साथ ही किताब पर चर्चा भी हुई. यह पुस्तक विनसर प्रकाशन से प्रकाशित होकर आई है.

लेखक ने बताया कि वे यात्रा-वृत्तांत इस तरह लिखते हैं कि पाठक किताब को उनकी नजर से देख सके और उसे लगे कि वह उस क्षेत्र में स्वयं घूम रहा है. उन्होंने कहा कि जब यूनेस्को ने 2019 में हम्पी को “must see destination” की सूची में डाला, तब से वे वहां घूमना चाहते थे.

उन्होंने कहा कि यह जगह एक भौगोलिक करिश्मा है, जहां छोटे-छोटे पत्थरों पर विशालकाय पत्थर रखे हुए हैं.

*किष्किंधा से विजयनगर तक: इतिहास और वैभव*


तापस कहते हैं कि हम्पी में कोरेकल राइड होती है, जो काफी रोचक है. उन्होंने बताया कि हम्पी का पुराना नाम किष्किंधा है, जिसका रामायण से संबंध रहा है. बाली और सुग्रीव का किला वहां आज भी मौजूद बताया जाता है.

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बताते हुए तापस ने कहा कि हम्पी, विजयनगर राज्य की राजधानी थी. तेनालीराम का संबंध भी वहीं से रहा था. उन्होंने कहा कि विजयनगर की आबादी उस समय 5 लाख से ज्यादा थी, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कितना समृद्ध था. 50 रुपए के नोट में जो रथ है, वह हम्पी में ही स्थित है.

तापस कहते हैं कि विजय विट्ठल मंदिर के अंदर ऐसे स्तंभ हैं, जिनसे अलग-अलग ध्वनियां निकलती हैं और यह बेहद अद्भुत है. जब वे वहां गए, तो उनकी किस्मत अच्छी थी कि उन्हें पूरा परिसर देखने का अवसर मिला और वहां के दृश्य बेहद शानदार थे.

किताब के बारे में बात करते तापस ने आगे बताया कि साल 1565 के दौरान राज्य में युद्ध हुआ और हार के बाद राजा का परिवार विजयनगर से पलायन कर गया. इसके बाद दूसरी जगह उनका राज्य सीमित ही रह गया.

*किताब और बाली के महल पर सवाल*


तापस कहते हैं कि किताब में उन्होंने अपनी खींची 200 तस्वीरें शामिल की हैं. वे कहते हैं कि उन्हें ये पत्थर खंडहर नहीं लगते, बल्कि बोलते पत्थर लगते हैं.

किताब पर बात करते हुए लेखक एवं साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने कहा कि उन्होंने इस किताब को तीन बार पढ़ा है. इसमें इतिहास की अच्छी जानकारी है और लेखक इसमें गाइड की भूमिका में भी नजर आते हैं.

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि दून विश्वविद्यालय की कुलपति डॉक्टर सुरेखा डंगवाल ने कहा कि साहित्यकार इतिहासकार भी हो तो हम्पी जैसी किताब निकल सकती है. इस पुस्तक के पन्ने पलटने से हम्पी जाने की जिज्ञासा बढ़ती रहती है. उन्होंने यह भी कहा कि यह किताब स्कूली छात्रों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है, इससे वे अपने इतिहास को ज्यादा गहराई से समझ सकेंगे.

कार्यक्रम में डॉक्टर जितेन ठाकुर ने कहा कि किताब पठनीय है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किताब में बाली के महल की बात कही गई है, लेकिन यह संदेहास्पद लगता है कि त्रेता युग के अंत से अब तक बाली का महल किसी न किसी रूप में मौजूद हो. उनका मानना है कि संभवतः उस क्षेत्र को लोकप्रिय बनाने के लिए उसे बाली का महल कहा जाता है.

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