Saturday, March 28, 2026

Earth Hour: एक घंटे की पहल, लेकिन क्या हम सच में जाग रहे हैं?

Earth Hour: एक घंटे की पहल, लेकिन क्या हम सच में जाग रहे हैं?

हर साल मार्च के आखिरी शनिवार को दुनिया भर में Earth Hour मनाया जाता है. इस साल यह 28 मार्च को है, जब रात 8:30 से 9:30 बजे के बीच लोग गैर जरूरी लाइट्स बंद करते हैं.

यह पहल की ओर से शुरू की गई थी, जिसका मकसद लोगों को ऊर्जा बचाने और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराना है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक घंटे के लिए अंधेरा करना काफी है, जब दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध की आग पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुंचा रही है.

एक तरफ हम Earth Hour के जरिए पर्यावरण बचाने की बात करते हैं, तो दूसरी तरफ युद्ध, औद्योगिक हमले और संसाधनों का विनाश उस कोशिश को कमजोर करते नजर आते हैं. असली चुनौती उस सोच को बदलने की है, जो पूरे साल हमारे फैसलों में दिखनी चाहिए.

Earth Hour के बीच युद्ध और पर्यावरण पर खास बातचीत

इन्हीं सवालों के बीच हमने बरेली कॉलेज, उत्तर प्रदेश के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. जसपाल सिंह से बातचीत की. उनसे जानने की कोशिश की कि जब दुनिया एक घंटे के लिए पर्यावरण के बारे में सोचती है, उसी समय युद्ध प्रकृति को कितना बड़ा नुकसान पहुंचाता है.

डॉ. जसपाल सिंह कहते हैं कि युद्ध का पर्यावरण पर दीर्घकालिक प्रभाव कितना गंभीर होता है?            

युद्ध का असर केवल सीमाओं या राजनीति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह हमारे पर्यावरण को एक ऐसा गहरा जख्म देती है जो दशकों तक नहीं भरता। जब युद्ध होता है, तो बम, मिसाइल और रासायनिक हथियारों के अंधाधुंध इस्तेमाल से हमारी मिट्टी और पानी दोनों ही जहरीले हो जाते हैं। धमाकों के बाद लेड (Lead), मरकरी (Mercury), सीसा (Cadmium) और यूरेनियम ( Uranium) जैसी भारी धातुएँ मिट्टी की परतों में गहराई तक मिल जाती हैं। इससे जमीन की प्राकृतिक उपजाऊ क्षमता पूरी तरह नष्ट हो जाती है और वह क्षेत्र कई सालों तक खेती के लायक नहीं रहता। हथियारों से निकलने वाले जहरीले रसायन और 'एजेंट ऑरेंज' (Agent Orange) जैसे घातक पदार्थ वर्षा जल के साथ रिसकर भूजल (Groundwater) में मिल जाते हैं। यह प्रदूषित पानी न केवल पीने के अनुपयुक्त हो जाता है, बल्कि इसके सेवन से कैंसर और जन्मजात विकृतियों जैसी गंभीर बीमारियाँ बढ़ने लगती हैं। इसका सबसे भयावह उदाहरण वियतनाम युद्ध में देखा गया, जहाँ जहरीले रसायनों का असर आज भी वहां की पीढ़ियों के स्वास्थ्य में दिखाई देता है। यह प्रदूषित तत्व खाद्य श्रृंखला (Food Chain) के जरिए इंसानों और जानवरों के शरीर में पहुँचकर उनके जीवन चक्र को बाधित करते हैं। इसके अतिरिक्त, युद्ध के दौरान जंगलों की कटाई और प्राकृतिक आवासों का विनाश पारिस्थितिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देता है। बमबारी और सैन्य गतिविधियों के कारण कई दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियाँ बेघर हो जाती हैं और विलुप्त होने की कगार पर पहुँच जाती हैं। युद्ध के कारण होने वाली आग, विशेषकर तेल के कुओं या औद्योगिक केंद्रों में, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) जैसी दमघोंटू गैसें घोल देती है। 1991 के खाड़ी युद्ध (Gulf War) के दौरान कुवैत के तेल कुओं की आग ने महीनों तक आसमान को काला रखा और समुद्री जीवन को अपूरणीय क्षति पहुँचाई। वर्तमान में जारी रूस-यूक्रेन युद्ध में भी बांधों के टूटने और औद्योगिक संयंत्रों पर हमलों के कारण बड़े स्तर पर पर्यावरणीय तबाही देखने को मिल रही है। सरल शब्दों में कहें तो युद्ध का असली नुकसान केवल दिखाई देने वाली तबाही नहीं है, बल्कि इसका गहरा और अदृश्य असर प्रकृति और मानव जीवन पर वर्षों तक पड़ता रहता है। यह आने वाली पीढ़ियों से उनकी साफ हवा, शुद्ध पानी और उपजाऊ जमीन छीन लेने वाला एक अक्षम्य अपराध है। प्रकृति की कोई सीमा नहीं होती, इसलिए एक क्षेत्र में हुआ पर्यावरणीय विनाश अंततः पूरी मानवता के भविष्य को खतरे में डाल देता है।


क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध के दौरान पर्यावरण संरक्षण को लेकर कोई ठोस नीति है?

इस सवाल पर प्रोफेसर जसपाल सिंह ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध के दौरान पर्यावरण संरक्षण को लेकर कई नियम और संधियाँ बनाई गई हैं, जिनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संघर्ष के कारण प्रकृति को अनावश्यक और लंबे समय तक नुकसान न पहुँचे। फिर भी, इन नियमों की प्रभावशीलता सीमित मानी जाती है क्योंकि इन्हें लागू करना कठिन होता है और कई बार देशों द्वारा इनका उल्लंघन किया जाता है। सबसे प्रमुख नियम Geneva Conventions से जुड़े हैं, जो युद्ध के दौरान मानवीय व्यवहार को नियंत्रित करते हैं। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि बिना किसी सैन्य आवश्यकता के किसी भी प्रकार का विनाश नहीं किया जाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी क्षेत्र में दुश्मन की सेना नहीं है, तो वहाँ के जंगलों को जलाना या खेती की जमीन को नष्ट करना अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ माना जाएगा। इसी प्रकार ENMOD Convention एक विशेष संधि है, जो पर्यावरण को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से रोकती है। इसका उद्देश्य यह है कि कोई भी देश मौसम, जलवायु या प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बदलकर दूसरे देश को नुकसान न पहुँचाए। उदाहरण के रूप में, यदि कोई देश कृत्रिम रूप से भारी वर्षा कराकर बाढ़ ला दे या सूखा उत्पन्न कर दे, तो यह इस संधि का उल्लंघन होगा। हालाँकि इस प्रकार के प्रयोग खुले तौर पर कम देखे गए हैं, लेकिन अतीत में ऐसी तकनीकों पर शोध किया गया था। इसके अलावा Additional Protocol I में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ऐसे तरीकों और हथियारों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए, जो पर्यावरण को “व्यापक, दीर्घकालिक और गंभीर” नुकसान पहुँचाएँ। सामान्य रूप से अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कानून यह सिद्धांत देता है कि सभी देशों की जिम्मेदारी है कि वे अपनी गतिविधियों से दूसरे देशों के पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाएँ। उदाहरण के लिए, यदि किसी देश की सैन्य गतिविधियों से पड़ोसी देश की नदियाँ प्रदूषित होती हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जा सकता है।

इसके अलावा International Court of Justice ने भी अपने निर्णयों में यह माना है कि पर्यावरण की सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय कानून का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे संघर्ष के समय भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, ICJ केवल तभी हस्तक्षेप कर सकता है जब देश उसके अधिकार क्षेत्र को स्वीकार करें, जिससे इसकी शक्ति सीमित हो जाती है। इन सभी बिंदुओं से यह स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नियम तो मौजूद हैं, लेकिन उनके पालन में कई चुनौतियाँ हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि “दीर्घकालिक और गंभीर नुकसान” को साबित करना कठिन होता है, और कई बार देशों को जवाबदेह ठहराने के लिए कोई सख्त दंड व्यवस्था नहीं होती। राजनीतिक हित भी इन नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा डालते हैं।

इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि संघर्ष के दौरान पर्यावरण संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय नीतियाँ एक महत्वपूर्ण शुरुआत हैं, लेकिन उन्हें और अधिक सशक्त, स्पष्ट और लागू करने योग्य बनाने की आवश्यकता है। जब तक सख्त नियम, निगरानी प्रणाली और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक पर्यावरण को पूरी तरह सुरक्षित रखना संभव नहीं होगा।

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