Tuesday, April 28, 2026

आज 29 अप्रैल, विश्व नृत्य दिवस है. ऐसे मौकों पर हम नृत्य की बात तो करते हैं, लेकिन यह कम सोचते हैं कि नृत्य हमारे समय में किस दिशा में जा रहा है.
नृत्य अब मंच से निकलकर मोबाइल स्क्रीन तक आ गया है. कुछ सेकंड के वीडियो में कला भी है और पहचान की तलाश भी. लोकप्रियता बढ़ी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या समझ भी उतनी ही बढ़ी है.
भारत में नृत्य हमेशा परंपरा और संस्कृति से जुड़ा रहा है, फिर भी नई पीढ़ी का झुकाव तेजी से पश्चिमी शैलियों की ओर दिखता है. रियलिटी शो और सोशल मीडिया ने अवसर दिए हैं, लेकिन उन्होंने नृत्य को किस रूप में बदला है, यह देखना जरूरी है.
आज का दिन शायद इसी पर ठहरकर सोचने का है कि नृत्य हमारे लिए सिर्फ प्रदर्शन है या हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी. इसी विषय को समझने के लिए हमने कथक नर्तक आशीष सिंह (नृत्य मंजरी दास) से बातचीत की.

आशीष सिंह वाराणसी से हैं और इस समय वृन्दावन धाम में रहकर अपनी नृत्य साधना कर रहे हैं. इन्होंने कथक की प्रारंभिक शिक्षा पंडित बिरजू महाराज की शिष्या श्रीमती संगीता सिन्हा से प्राप्त की और बनारस घराने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से संगीत एवं मंच कला में स्नातक और परास्नातक करने के साथ इन्होंने देश और विदेश में कई प्रस्तुतियां दी हैं.

इन दिनों भारत में युवाओं का झुकाव पश्चिमी नृत्य शैलियों की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में भारतीय शास्त्रीय और लोक नृत्यों का भविष्य आप कैसे देखते हैं?
इस सवाल पर आशीष कहते हैं पाश्चात्य नृत्य को अपने ही देश में ज्यादा बढ़ावा दिया जा रहा है और उसका असर आज के युवाओं पर साफ दिखता है. युवा यह देख रहे हैं कि भारतीय नृत्य को साधने में जितनी मेहनत और समय लगता है, उतनी चुनौती पाश्चात्य शैलियों में नहीं है. उसमें कम समय में जल्दी पहचान भी मिल जाती है और आमदनी के मौके भी ज्यादा दिखते हैं.
यह दुखद है कि अपनी ही संस्कृति उपेक्षा का शिकार हो रही है. हम अपनी कला और कलाकारों को वह सम्मान और संरक्षण नहीं दे पा रहे हैं, जिसके वे हकदार हैं. हमारे यहां जो बड़े आयोजन होते हैं, उनमें भी अक्सर बाहर के फिल्मी कलाकारों को प्राथमिकता दी जाती है, इस पर सोचने की जरूरत है.
अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में भारतीय परंपरा और नृत्य को आगे ले जाना और भी कठिन हो जाएगा.


रियलिटी शो नृत्य को लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं, ये भारतीय नृत्य शैलियों की गहराई और मूल स्वरूप को कमजोर भी कर रहे हैं! यह पूछने पर उन्होंने कहा, बिलकुल ऐसा ही हो रहा है. नृत्य को प्रसिद्धि तो मिल रही है, लेकिन अपने मूल रूप के लिए नहीं, बल्कि वैसा रूप सामने आ रहा है जो समाज को तुरंत पसंद आ जाए.
इसी कारण भारतीय नृत्य शैलियों की गहराई और उनके मूल तत्व धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं. प्रस्तुति में बाहरी आकर्षण ज्यादा हो गया है और परंपरा पीछे छूटती दिख रही है.
जरूरत इस बात की है कि रियलिटी शो अपनी मूल परंपरा के अनुरूप भी आयोजित हों, ताकि हम अपनी संस्कृति का असली रूप दर्शकों तक पहुँचा सकें.

सोशल मीडिया के दौर में नृत्य तेजी से छोटे वीडियो और रील्स तक सीमित होता जा रहा है. इस पर आशीष सिंह कहते हैं कि नृत्य अब कला के बजाय मनोरंजन का जरिया बनता जा रहा है. पहले नृत्य भगवान के चरणों में समर्पित किया जाता था, उन्हें प्रसन्न करने का माध्यम था, लेकिन आज वही नृत्य लोगों को रिझाने का साधन बन गया है.
हमारी भारतीय नृत्य परंपरा एक साधना है, जिसे कुछ सेकंड की रील में पूरी तरह नहीं दिखाया जा सकता. इसके लिए गहराई, समय और निरंतर अभ्यास की जरूरत होती है.
नृत्य को समझने और साधने के लिए कठिन परिश्रम जरूरी है, तभी उसकी असली भावना सामने आ सकती है.

नई पीढ़ी को भारतीय नृत्य से जोड़ने के सवाल पर आशीष सिंह कहते हैं कि बदलाव करना है तो अपनी व्यवस्थाओं में करना होगा. जब युवाओं को अपने शहरों में नृत्य के लिए सही मंच मिलेगा, प्रदर्शन के मौके मिलेंगे और अलग अलग आयोजनों में भागीदारी का अवसर मिलेगा, साथ ही इस कला से जुड़ी रोजगार की संभावनाएं भी सामने आएंगी, तो वे खुद ही इससे जुड़ेंगे.
वह कहते हैं कि थोड़ा बहुत बदलाव हर समय में होता रहा है, लेकिन मूल तत्व से समझौता नहीं होना चाहिए. अगर आज की युवा पीढ़ी को सही अवसर मिले, तो वे इस कला से जरूर जुड़ेंगे.

एक लड़का होकर कथक करने के कारण आशीष सिंह को समाज के ताने भी सुनने पड़े. लेकिन उन्होंने इन बातों को अपनी राह में रुकावट नहीं बनने दिया और नृत्य के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई.
विश्व नृत्य दिवस के मौके पर वह समाज को एक सीधा संदेश देते हैं कि अगर आप किसी का सहयोग नहीं कर सकते, तो उसे अपमानित भी मत करिए. किसकी किस्मत में क्या लिखा है, यह कोई नहीं जानता.
वह कहते हैं कि जब इंसान अपनी मंजिल पर ध्यान केंद्रित कर लेता है, तो लोगों के ताने और अशब्द सुनाई नहीं देते. बस एक ही बात समझ आती है कि हमें अपनी मंजिल तक पहुँचना है.

No comments:

Post a Comment

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...