*छात्रों पर शिक्षा का दबाव, क्या है समाधान*
मैं गणित और विज्ञान में हमेशा से कमजोर रहा हूं और यह बात रिश्तेदारों और दोस्तों को भी पता थी. विषयों में प्राप्त अंकों का सार्वजनिक होना एक तरह से निजता का हनन था, लेकिन शायद उस समय मैंने इसे सहजता से झेल लिया. मेरे भीतर बेशर्मी की एक मोटी परत थी, जिसने मुझे बचाए रखा.
उत्तराखंड हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा का परिणाम आने के बाद विकास खंड लोहाघाट के एक गांव से चिंताजनक खबर सामने आई है. यहां एक छात्र ने फंदे में लटककर आत्महत्या करने का प्रयास किया. बताया जा रहा है कि छात्र ने हाईस्कूल बोर्ड परीक्षा में 73 फीसदी अंक प्राप्त किए थे. अच्छे अंक होने के बावजूद यह कदम उठाया जाना परीक्षा परिणाम और उससे जुड़े दबाव पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
*आंकड़े जो चुपचाप बहुत कुछ कहते हैं*
इसके आगे अगर व्यापक तस्वीर देखें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट Accidental Deaths & Suicides in India 2022 के अनुसार देश में परीक्षा में असफलता के कारण 2,248 लोगों ने आत्महत्या की. इसी वर्ष 13 हजार से अधिक छात्रों ने आत्महत्या की, यानी औसतन हर दिन 35 से ज्यादा छात्र अपनी जान गंवा रहे हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि परीक्षा और अंकों का दबाव अब केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक संकट बन चुका है.
*अंकों की अंधी दौड़ और खत्म होती सृजनशीलता*
छात्रों की आत्महत्याओं पर शिक्षक महेश पुनेठा कहते हैं कि जब तक हम परीक्षा में प्राप्त अंकों का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करना और उसका जश्न मनाना बंद नहीं करते हैं, तब तक अंकों के लिए लगने वाली अंधी दौड़ और उससे पैदा होने वाला दबाव खत्म नहीं कर सकते हैं. उनके अनुसार यही दबाव बच्चों को गहरे अवसाद की ओर ले जाता है और आत्महत्याओं जैसी घटनाओं को जन्म देता है.
वे कहते हैं कि अंकों के लिए लगने वाली यह अंधी दौड़ बच्चों की सारी सृजनशीलता को सोख लेती है और उनके स्वाभाविक विकास को अवरुद्ध कर देती है. यह स्थिति कुछ वैसी ही है जैसे अधिक दूध प्राप्त करने के लिए दुधारू पशुओं को इंजेक्शन लगाए जाते हैं. महेश पुनेठा ने आगे कहा कि दुनिया के कुछ देशों में बच्चों के अंकों को पूरी तरह गोपनीय रखा जाता है, यहां तक कि सहपाठियों को भी इसकी जानकारी नहीं होती और इसे बच्चे की निजता के अधिकार से जोड़कर देखा जाता है.
*दिखावे का समाज और अंकों की संस्कृति*
इस विषय पर ‘मेरी स्कूल डायरी’ किताब की लेखिका रेखा चमोली लिखती हैं कि हमारे जैसे समाज में यह व्यवस्था अभी संभव नहीं लगती, जहां लोग अपने कपड़ों, गहनों, गाड़ी, घर, बगीचे और यहां तक कि खाने-पीने तक को दूसरों को दिखाना अपनी शान समझते हैं. ऐसे माहौल में अंकों को गोपनीय रखने की बात व्यवहार में लागू करना कठिन दिखाई देता है.
वे आगे लिखती हैं कि शिक्षा लगातार अपने मूल उद्देश्य से भटकती जा रही है. एक अच्छा और संवेदनशील मनुष्य बनाने की प्रक्रिया के बजाय यह केवल अंकों की प्राप्ति तक सिमटती जा रही है. यही वजह है कि पढ़ाई का अर्थ सीखना नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा में आगे निकलना रह गया है.
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