बचपन से ही भीग जाने से डर बहुत लगता है मुझे।
कभी इन बादलों के गरजते ही वो घर के बिखरे चिल्लरों और गेंहू को अपने पल्लू की गांठ में समेट लेते हैं,
तो कभी घर के नन्हें हाथों से गांधी के चश्में वाले चित्रों की किताबें भी साथ ही समेट ली जाती हैं।
यह सब देख इन बारिश की बूंदों से डर लगता है मुझे।
अब भी जब बादल गरजता है, इस बारिश के डर से कहीं छुप जाते हैं वो अधबनी सड़क और नालों के अभियंता, पर उनकी जगह कच्ची सड़क, नाली पर चल मिट जाने के डर से इन इन बारिश की बूंदों से डर लगता है मुझे।
ज़िद है उनकी उस अंधे विकास की, तभी तो इस बारिश में दरकता है हिमालय,
कहीं पत्थरों, मिट्टी के मलबे में दफ़न न हो जाए कोई मेरे अपने ये सोच सोच कर इन बारिश की बूंदों से डर लगता है मुझे।
बारिश का पानी आया है, फिर नदियां और तालाब भरने लगेंगे।
ज़ोर से गरजेंगे बादल और कागज़ की कश्तियों के साथ बहते रहेगा उस बारिश का पानी,
इसलिए कल सूखे तालाबों और खाली बर्तन के साथ तड़पते लोगों को सोच इन बारिश की बूंदों से डर लगता है मुझे।
हिमांशु
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