हिंदी सिनेमा में प्रेम कहानियां हमेशा भावनाओं और त्याग की मिसाल बनकर सामने आई हैं. 1976 में रिलीज हुई फिल्म लैला मजनू भी लंबे समय तक एक अमर प्रेम कथा के रूप में याद की जाती रही. लेकिन आज जब फिल्मों को सामाजिक और नारीवादी नजरिए से पढ़ा जा रहा है, तब यह सवाल भी उठता है कि क्या इस फिल्म ने अनजाने में पितृसत्तात्मक सोच को और मजबूत किया.
फिल्म की कहानी प्रेम के विद्रोह की बात करती है, लेकिन बड़े फैसलों की बागडोर पुरुषों और परिवार के हाथ में ही रहती है. लैला अपने प्रेम को लेकर स्पष्ट है, मगर उसकी जिंदगी का रास्ता परिवार की इजाजत और सामाजिक प्रतिष्ठा तय करती है. यह वही सामाजिक ढांचा है जिसमें लड़की की इच्छा से ज्यादा परिवार की इज्जत को महत्व दिया जाता है. फिल्म इसे चुनौती देने की कोशिश करती है, लेकिन अंततः उसी व्यवस्था को सामान्य भी बना देती है.
फिल्म का नैरेटिव भी मुख्य रूप से मजनू के अनुभवों और उसके दर्द के इर्द गिर्द घूमता है. कैमरा और कहानी दोनों मिलकर पुरुष नायक के जुनून को केंद्र में रखते हैं, जबकि लैला की पीड़ा अक्सर प्रतीकात्मक बनकर रह जाती है. इस तरह की प्रस्तुति ने उस दौर के हिंदी सिनेमा में पुरुष केंद्रित प्रेम कहानियों की परंपरा को और मजबूत किया, जहां महिला पात्र प्रेरणा या त्याग की छवि में सीमित रह जाती थी.
परिवार और समाज की इज्जत को लेकर जो दबाव फिल्म में दिखाया गया है, वह उस समय की सामाजिक मानसिकता का हिस्सा था. प्रेम करने वाले दो लोग सिर्फ अपने रिश्ते से नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ढांचे से लड़ते दिखाई देते हैं. दिलचस्प यह है कि फिल्म प्रेम को महान बताती है, लेकिन अंत में वही पितृसत्तात्मक व्यवस्था कहानी को दुखांत की ओर ले जाती है. यह विरोधाभास आज के दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या ऐसी कहानियां प्रेम की आजादी के साथ साथ सामाजिक नियंत्रण को भी वैधता देती थीं.
आज जब हिंदी सिनेमा में महिला पात्रों की एजेंसी और स्वतंत्रता पर ज्यादा चर्चा हो रही है, तब लैला मजनू जैसी फिल्में हमें यह समझने का मौका देती हैं कि रोमांस के सुनहरे फ्रेम के भीतर समाज की सत्ता संरचनाएं किस तरह काम करती थीं. पचास साल बाद इस फिल्म को सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक सोच के आईने के रूप में भी देखा जा सकता है.
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