World Day of Social Justice पर जब बराबरी और अधिकारों की बात होती है, तो हिंदी सिनेमा की कुछ फिल्में खुद एक मिसाल बनकर सामने आती हैं.
साल 2016 में आई पिंक ऐसी ही फिल्म रही, जिसने सहमति और महिलाओं के अधिकारों पर समाज की सोच को नए ढंग से चुनौती दी.
*कोर्टरूम के अंदर बनी फिल्म का बैकग्राउंड*
निर्देशक अनिरुद्ध रॉय चौधरी की फिल्म पिंक साल 2016 में रिलीज हुई थी और शूजीत सरकार फिल्म के निर्माता थे. फिल्म में अमिताभ बच्चन, तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी और अंद्रिया तारियांग जैसे कलाकार नजर आए. दिल्ली की पृष्ठभूमि पर बनी इस कोर्टरूम ड्रामा की खास बात यह रही कि सिर्फ कहानी और संवादों के दम पर फिल्म से दर्शकों को बांधे रखा गया था. फिल्म की शूटिंग दिल्ली में ही की गई थी, शूटिंग के बीच में अमिताभ के ट्वीट से लोगों को कुछ धमाकेदार सामने आने की आहट लग गई थी.
https://x.com/i/status/708312436957249536
*कहानी, एक ' ना ' जो बहस बन गई*
'पिंक' तीन कामकाजी लड़कियों की कहानी है, वे सब एक पार्टी के बाद हुई घटना में फंस जाती हैं और समाज व कानून की नजर में कठघरे में खड़ी कर दी जाती हैं. एक रिटायर्ड वकील उनके पक्ष में खड़ा होता है और अदालत में सहमति, चरित्र और महिला स्वतंत्रता से जुड़े सवाल उठाता है. पूरी कहानी कोर्टरूम में हुई बहसों के जरिए यह दिखाती है कि 'ना' का मतलब हर परिस्थिति में 'ना' ही होता है.
*‘No Means No’ के बाद संवाद और अभिनय से जानी गई पिंक*
फिल्म अपने संवादों के लिए आज तक याद की जाती है. अदालत में अमिताभ बच्चन का वह सीन, जहां वह कहते हैं कि उसे बोलने वाली लड़की कोई परिचित हो, फ्रेंड हो, गर्लफ्रेंड हो, कोई सेक्स वर्कर हो या आपकी अपनी बीवी ही क्यों न हो... No means No, आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार पलों में गिना जाता है. वहीं तापसी पन्नू ने मीनल के किरदार में डर, गुस्से और आत्मसम्मान के संघर्ष को बेहद सहजता से निभाया.
फलक के किरदार में कोर्टरूम के अंदर 'मैंने उसे ना बोला लगातार ना बोला..' कहने वाली कीर्ति कुल्हारी के अभिनय को कई पुरस्कारों और सराहनाओं से नवाजा गया.
*रीमेक, इंटरव्यू और ‘पिंक’ की लंबी विरासत*
साल 2016 में रिलीज हुई Pink की सफलता इतनी बड़ी रही कि इसका तमिल रीमेक Nerkonda Paarvai (2019) और तेलुगु रीमेक Vakeel Saab (2021) भी बनाए गए, अलग-अलग भाषाओं में “No Means No” का संदेश आगे बढ़ा. वहीं 2024 में दिए एक इंटरव्यू में कीर्ति कुल्हारी ने फिल्म के प्रमोशन के दौरान खुद को साइडलाइन महसूस करने की बात कही थी, जिससे फिल्म से जुड़ी चर्चाएं फिर से सुर्खियों में आ गईं. हालांकि इस विवाद के बावजूद ‘पिंक’ की विरासत मजबूत बनी रही और आज भी सहमति, बराबरी और सामाजिक न्याय पर होने वाली चर्चाओं में यह फिल्म एक अहम संदर्भ के रूप में याद की जाती है.
No comments:
Post a Comment