Saturday, February 21, 2026

पंचाचुली की परछाइयाँ : दारमा घाटी की दो प्राचीन लोककथाएँ

*पंचाचुली की परछाइयाँ : दारमा घाटी की दो प्राचीन लोककथाएँ*

*बर्फीली चोटी पर खिंची दूध की रेखा*

कुमाऊँ के धारचूला और मुनस्यारी के बीच बसे रं समुदाय की लोककथाओं मे दारमा घाटी की एक मार्मिक कहानी सुनाई जाती है। कहा जाता है कि बहुत पहले दारमा घाटी से एक युवती दूध से भरा डिब्बा लेकर पंचाचुली पर्वत पार करते हुए मुनस्यारी की ओर जा रही थी। उन दिनों यही ऊँचा पहाड़ी मार्ग लोगों की जीवनरेखा था। रास्ता कठिन था, चढ़ाई तीखी और चारों ओर बर्फ से ढकी चट्टानें थीं, फिर भी पहाड़ के लोग साहस के साथ इन पहाड़ी राहों पर चलते थे।

कथा के अनुसार, ऊँचाई पर पहुँचते ही उसका पैर अचानक फिसल गया। हाथ से दूध का डिब्बा छूट गया और वह ढलान की ओर गिरने लगी। गिरते हुए उसके मन में पीड़ा और आक्रोश भर उठा और उसने दुखी होकर कहा कि अब इस गंदे और खतरनाक रास्ते से कोई भी उस पार नहीं जा सकेगा। लोकविश्वास है कि उसके शब्द श्राप बन गए। उसी क्षण से पंचाचुली की चोटियों पर बर्फ का सिलसिला बढ़ गया और धीरे धीरे वह पुराना पैदल मार्ग हिम के नीचे दबकर खत्म हो गया।

रं बुजुर्ग यह भी बताते हैं कि जब वह गिरी, तब उसके डिब्बे से दूध बहता हुआ पहाड़ की ढलानों में फैल गया। आज पंचाचुली की बर्फीली चोटियों पर जो सफेद लकीरें दिखाई देती हैं, उन्हें लोग उसी दूध की धार का निशान मानते हैं।

*फिलम गांव की लोककथा : राख की पुड़ी और देवता का गुस्सा*

दारमा घाटी के फिलम गांव में रं समुदाय के बुजुर्ग एक पुरानी कथा सुनाते हैं, ये आज भी पहाड़ की स्मृतियों में जीवित है। कहा जाता है कि बहुत पहले इस गांव में भयंकर अकाल पड़ा। खेत सूख गए, अनाज खत्म होने लगा और लोग चिंता में डूब गए। तभी गांव के एक आदमी को रात में स्वप्न आया। स्वप्न में देवता प्रकट हुए और बोले कि यदि वह उन्हें कुत्ते की बलि के साथ राख की पुड़ी बनाकर खिलाएगा तो गांव की विपत्ति दूर हो जाएगी।

सुबह उठकर उस व्यक्ति ने वैसा ही किया। उसने श्रद्धा से कुत्ते की बलि देकर और राख की पुड़ी बनाकर देवता को अर्पित की। लोककथा कहती है कि उसी साल बारिश खूब हुई, खेत लहलहा उठे और गांव में समृद्धि लौट आई। लोगों ने इसे देवता की कृपा माना और गांव में फिर से खुशहाली छा गई।

अगले वर्ष फिर वही देवता उसके सपने में आए। इस बार उन्होंने कहा कि मुझे कल दिन के समय भोजन कराना, तभी सब ठीक रहेगा। आदमी के मन में संकोच आ गया। उसे लगा कि दिन में ऐसा करने पर लोग उसका मजाक उड़ाएंगे। इसलिए उसने रात के अंधेरे में ही, अच्छी फसल होने के बावजूद, फिर से कुत्ते की बलि दी और राख की पुड़ी बना कर देवता को दे दी। कहते हैं कि देवता इस बात से नाराज हो गए, क्योंकि उनकी आज्ञा का पालन सही ढंग से नहीं हुआ था।

लोककथा के अनुसार, उसी के बाद सामने का विशाल पहाड़ खिसककर फिलम गांव की ओर आ गया। गांव में अफरा तफरी मच गई। कई लोग अपनी जान बचाकर दूर भाग गए। कुछ ने पास ही नई जगह चुनकर बसना शुरू किया, जबकि कुछ परिवार अल्मोड़ा और आसपास के इलाकों की ओर चले गए। बुजुर्ग आज भी इस घटना को देवता के क्रोध और मनुष्य की झिझक के परिणाम के रूप में याद करते हैं।

हिमांशु जोशी

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