कंधे में बोझ लादे बस यूंही चलते जाना।
चिंता की लकीरों से चेहरों पर झुर्रियां पड़ जाना,
और वक्त से पहले बूढ़ा हो जाना।
रोज़ शाम होते ही इंसानों का घरों में छुप जाना,
और बैल-बकरियों का बाघ के डर से मिमियाना।
दाढ़ी-मूंछ निकलते ही रोटी के जुगाड़ में अपना घर छोड़ शहर जाना,
पीछे पलट मां को आंसू पोछते भी न देख पाना।
आसान नही है यहां रह पाना
कंधे में बोझ लादे बस यूंही चलते जाना।
उड़नखटोलों को देख नौनिहालों का सपनों में खो जाना,
फिर नन्हें पैरों से स्कूल पहुंचने के लिए पहाड़ नापना।
प्रसूता का वक्त पर इलाज न मिलने से दम तोड़ देना,
मरीजों को डोलियों में लादे गांववालों का आँसू बहाना।
पहाड़ियों का दर्द जाने कौन समझ पाएगा,
शायद कभी कोई शेखर दा की तरह पैदल पहाड़ नाप इनके दुख दर्द समझ पाएगा।
गिर्दा के पीछे चलने वाला जन भटका और आगे रहने वाला तंत्र आज मरा हुआ है,
जाने कौन अब पहाड़ के लिए आवाज़ उठाएगा।
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