संभावना प्रकाशन से प्रकाशित गीता गैरोला की किताब 'ये मन बंजारा रे' एक यात्रा वृत्तांत से कहीं अधिक है. यह सामाजिक ढांचे, पर्यावरण, लैंगिक असमानता और सांस्कृतिक विरासत पर गहरे विचारों का संग्रह है.
सामाजिक ढांचे को चुनौती देती यात्रा
"मैं उन सब में बड़ी शादीशुदा होने की सामाजिक सुरक्षा वाले हथियार से लैस थी.", 'ये मन बंजारा रे' के आरंभ में गीता गैरोला की यह टिप्पणी यात्रा में स्त्रियों के लिए एक अदृश्य 'सुरक्षा कवच' की ओर इशारा करती है. किताब में लेखिका बार-बार यह दिखाती हैं कि पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को किस तरह इन प्रतीकात्मक सुरक्षा ढालों की आड़ में आज़ादी मिलती है और किस तरह यह व्यवस्था खुद में एक विडंबना है.
'नन्दा भी तो औरत ही है, माई जी और औरत होने के नाते उसको भी जरूर माहवारी होती होगी. एक औरत का इतना सम्मान और दूसरी तरफ जीती जागती औरतों के लिए यात्रा को वर्जित करना कहाँ का न्याय है.', जैसी टिप्पणी से वह धार्मिक और सामाजिक ढांचे की उस विसंगति को भी उजागर करती हैं जहां स्त्रियों के लिए कई प्रतिबंध हैं जबकि देवी की पूजा में उन पर आस्था रखी जाती है.
पहाड़ के संसाधनों के दोहरे चित्र
यह किताब पहाड़ के संसाधनों का उचित प्रयोग नहीं कर पाने का दस्तावेज भी है. पृष्ठ संख्या 16 में लिखा है 'अरे भूली कौन आता है यहाँ माल्टे खरीदने.' 'मुझे अचानक याद आया कि उद्यान विभाग फलों से जूस, अचार बनाना भी सिखाता है. इस बारे में उस वक्त वहां के दुकानदारों को कोई जानकारी नहीं थी.' इस तरह लेखिका दिखाती हैं कि पहाड़ के लोग अपने संसाधनों की संभावनाओं से अक्सर अनभिज्ञ ही रह जाते हैं. नीति-निर्माण और स्थानीय विकास के बीच जो दूरी है, वह यहां स्पष्ट झलकती है.
किताब पहाड़ के आर्थिक आत्मनिर्भरता के सवाल को भी मजबूती से उठाती है.
हिमालयी यात्राओं की सजीव झलकियां
'ये मन बंजारा रे' में लेखिका यात्रा का सलीका पाठकों के सामने रखती हैं. पृष्ठ 21 में उन्होंने लिखा है 'गर्म कपड़े, कैमरे के सैल, दो जोड़ी मोजे, विंडचिटर, टोपी, कुछ बेसिक दवाइयां, बोरोलीन, पानी का गिलास वाला फिल्टर, सुई धागे की रील, एक बड़ी पॉलीथिन शीट और एक डिबिया में नमक, सब चीजें याद कर के पिट्ठू में रख दी.' हिमालय की अधिकतर यात्राओं पर लिखी यह किताब एक तरीके से हिमालय भ्रमण के लिए गाइड बुक भी है. जैसे इसमें लिखा है 'चढ़ाई चढ़ने के साथ सूरज हिम श्रृंखलाओं को अपनी लाली से रंगने लगा था. यह अक्टूबर का महीना था इस वक्त हिमालय दर्शन अवर्णनीय होता है.'
राजजात यात्रा पहली बार पूरी करने वाली पाँच महिलाओं में शामिल गीता गैरोला ने पहाड़ों की कठिन यात्रा और उनमें जाने का जज्बा लेखक के शब्दों से किताब में कई जगह झलका है. वह लिखती हैं 'कुलसारी तक पहुंचते तीन जगह सड़क सड़क पूरी तरह टूटी थी. चलने का रास्ता भी सड़क के साथ गायब हो गया था.' ज्यूरांगली जैसी कठिन पहाड़ी पर चढ़ने उतरने के बाद वह लिखती हैं 'आज मैं कह सकती हूं स्त्रियाँ चाहें तो अपने लिए कुछ भी करने के लिए समर्थन जुटा सकती हैं.'
परंपरा, लोक संस्कृति और मेलों का दस्तावेज
किताब में बहुत-सी जगह उत्तराखंड के मेलों की जानकारी और उनका इतिहास लिखा गया है. उत्तराखंड की कई महत्वपूर्ण जगह और यात्राओं का वर्णन भी उन्होंने आसान भाषा में दिया है. 'गढ़वाल के चमोली जिले में नन्दा देवी की जात यूँ तो हर साल होती है पर बारहवें साल में की जाने वाली जात को राजजात (राजयात्रा) कहा जाता है.'
सेवादास के बारे में किताब में लिखा है 'वे ढोलसागर पवाड़ों (ऐतिहासिक लोक गाथाएं) के गहन ज्ञाता थे. हमें अपनी क्षेत्रीय प्रतिभाओं की पहचान कर कद्र करने की समझ कब आएगी? हमारे पहाड़ों में जाने कितने ऐसे रत्न अनचीन्हे रह जाते हैं और उनकी विद्या भी उनके साथ ही समाप्त हो जाती है. विज्ञान के युग में अपनी परंपरागत प्रतिभाओं को रिकॉर्ड तक ना कर पाना हमारी पीढ़ी के लिए शर्मनाक ही कहा जाएगा.'
स्त्री चेतना और पितृसत्ता पर प्रहार
किताब पढ़ते हुए हम गीता गैरोला को भी अपने जीवन में यात्राओं से परिवर्तन लाते देखते हैं. वह पितृसत्ता को चुनौती देती दिखाई देती रहती हैं. जैसे उन्होंने लिखा है 'उसके बाबा ब्याह के सालों बाद पैदा हुए बैठे को छाती तान के शान से गोद में लिए घूमते थे. सोचा जरा देखभाल कर के बाप होने का फर्ज निभाने का मौका उन्हें भी दिया जाए.'
पहाड़ की महिलाओं का कठिन जीवन पाठकों को दिखाने के लिए लेखक ने गीत का सहारा लिया है. जो उनकी दादी अपने खेतों में गा रही हैं. साथ में दादी के साथ ये बातचीत पहाड़ की महिलाओं को करीब से जानने का मौका देती है. 'अरे बाबा हमारे पहाड़ी लोग अपने बेटे के लिए बहु के रूप में मजदूर लाते थे. पहाड़ की हर औरत खेती के काम के साथ घास, लकड़ी काटकर सारी जिंदगी बाप का कर्जा ही तो चुकाती है.'
नई यात्राओं के अनुभव और सामाजिक अंतर्दृष्टि
'नीले पर्वतों के देश में' लेखक ने जम्मू कश्मीर की अपनी यात्रा के अनुभवों से वहाँ की खूबसूरती के साथ-साथ आर्टिकल 370 जैसे विषयों पर लिखा है. किताब के इस हिस्से में अपने बेटे और पति के साथ संबंधों पर भी उन्होंने खुल कर लिखा है. 'तब से आज तक गोलू के बाबा के साथ पारिवारिक कामों के अलावा कभी कहीं नहीं गई.'
अपनी केरल यात्रा में गीता मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सवाल उठाती हैं तो पाठकों को लोगों का पहनावा भी बताती हैं. इतिहास के बारे में भी वह बात करती रहती हैं. 'सुना है ब्रिटानिया के मिशनरी जार्ज अल्फ्रेड को कोवलम बीच बहुत पसंद आया और वो यही का हो कर रह गया था.' ऐसे ही लोहाघाट के बारे में जानकारी देती हैं 'विक्टोरिया राज के मैकग्रोबर ने अपना चाय बागान बनाया जिसे बाद में स्वामी विवेकानंद ने मायावती आश्रम नाम दिया.'
सामाजिक पीड़ाओं का मार्मिक चित्रण
दलित महिलाओं का दर्द उन्होंने जिस तरह लिखा है उससे झलकता है कि गीता गैरोला ने अपने यात्राओं को सिर्फ प्रकृति की खूबसूरती देखने तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि उन्होंने समाज की हर परतों को उधेड़ा है. 'हमारे समाज में आज भी दलित महिलाएँ दो तरह से प्रताड़ित होती हैं. दलित होने के नाते और औरत होने के नाते.'
वृद्ध हो रहे पिता को लेकर लेखक का दर्द भी दिखा है. 'दिन रात पुलिसिया परेड से गठे बदन वाले मेरे पिताजी आज इतने लाचार हो गए कि उन्हें घर से बाहर निकलने के लिए सहयोगी की जरूरत पड़ती है.'
सालों बाद गाँव में वापस जाकर 'मेरी दादी और मां की आवाज किस दिशा में बीज रही होगी?' लिखना भावुक कर देता है. यही जुड़ाव उनका अपने वन से भी है, जिसकी जगह सड़क बनने पर वह लिखती हैं 'तो फिर हमारा वण कहाँ गया?'
यात्राओं के बीच गृहराज्य की पीड़ा और तुलना
किताब पढ़ते लेखक नवीन जोशी की किताबें याद आती हैं जिनमें लिखा होता है कि जब गांव में लोग नहीं तब सड़क आई हैं, ये प्रवासियों के लिए बनी हैं. वैसे ही गीता भी लिखती हैं 'कितनी विडंबना है जब गाँव में लोग थे तब पानी नहीं था अब गांव में लोग नहीं हैं पर घर-घर पानी के नल लग गए.'
महाराष्ट्र यात्रा में महाराष्ट्र के गांवों की तुलना उत्तराखंड के गांवों से करते उन्होंने 'बेचारा अपना उत्तराखंड और उसके दयनीय से ग्राम प्रधान' लिखा है. यात्रा के दौरान अपने गृहराज्य उत्तराखंड की तुलना अन्य राज्यों से करते रहकर उन्होंने अपने राज्य की नीति बनाने वालों का काम आसान कर दिया है.
किताब की सीमाएं और संभावनाएं
छत्तीसगढ़, केरल में महिलाओं की स्थिति, वहां के पर्यावरण पर गंभीर बातें हैं. पर कुछ घटनाओं ने किताब को ज्यादा लंबा खींच दिया है. जैसे पृष्ठ संख्या 45 में 'मेरा हाँफता काँपता मन कह रहा था कि चढ़ाई चढ़ते कमल को पीछे से एक डंडे से सटाक मार दूं, जुबान रुक जाएगी बाबू साहब की.' पृष्ठ 204 में ऐसे ही खिड़की पर खटखट की घटना का जिक्र हुआ है.
लेखक के महिला समाख्या कार्यक्रम में होने की वजह से उनकी कई यात्राएं वैसी संभव हुई हैं, जैसा उन्होंने चाहा. वह जहां गई वहां की प्रकृति और सांस्कृतिक विरासतों का वर्णन तो किया है पर उनका ज्यादा ध्यान सामाजिक कुरीतियों की तरफ ही ज्यादा रहा है. वह क्षेत्र की खूबसूरती, उसकी बनावट पर विस्तार से लिख सकती थीं. 'यहाँ पर स्थानीय लकड़ी, पत्थर की वास्तुकला से बने पत्थर की स्लेटों वाली छत के मकानों की बसावट देखने लायक है.' विस्तार से लिखा जा सकता था.
एक जरूरी और सोचने को विवश करने वाली यात्रा
'ये मन बंजारा रे' को पढ़ना एक ऐसी यात्रा पर चलना है जहां पाठक हिमालय की ऊंचाइयों से लेकर समाज की गहराइयों तक उतरते हैं. गीता गैरोला ने इस यात्रा वृत्तांत को केवल प्राकृतिक सौंदर्य के चित्रण तक सीमित नहीं रखा बल्कि उसमें समाज की जटिलताओं, स्त्री चेतना, लोक संस्कृति, पर्यावरणीय चिंताओं और विकास की विडंबनाओं को गहराई से पिरोया है. किताब की भाषा सरल है और शैली संवादधर्मी. इससे पाठक गीता के अनुभवों से सहज ही जुड़ जाता है.
किताब की सबसे बड़ी ताकत इसकी संवेदनशील दृष्टि है.
गीता गैरोला का यह लेखन इस बात का प्रमाण है कि यात्रा केवल स्थानों को नापने का नाम नहीं बल्कि अपने समय, समाज और स्वयं को गहराई से समझने का भी माध्यम है.
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