Wednesday, June 4, 2025

विश्व पर्यावरण दिवस 2025: युद्धों का पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव

विश्व पर्यावरण दिवस 2025: युद्धों का पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभाव

विश्व पर्यावरण दिवस 2025 (5 जून) हमें पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी याद दिलाता है, रूस-यूक्रेन, इस्राइल-फलस्तीन और भारत-पाकिस्तान जैसे हाल के युद्धों ने पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया है. 'United Nations Environment Programme' की रिपोर्ट्स में इन युद्धों को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं.

ये संघर्ष मिट्टी, जल, हवा और जैव विविधता को नष्ट कर रहे हैं, जिससे दीर्घकालिक पारिस्थितिक संकट पैदा हो रहा है.  रूस के आक्रामक रवैये की वजह से यूक्रेन में लगभग 42,000 भेड़-बकरियाँ, 92,000 गाय-भैंस, 2.58 लाख सूअर और 57 लाख से ज्यादा मुर्गियाँ मारे गए.

रूस-यूक्रेन युद्ध: पर्यावरण नरसंहार की त्रासदी

2022 से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूक्रेन के पर्यावरण को तबाह किया है. बमबारी और रासायनिक हथियारों से मिट्टी और नदियां दूषित हुई हैं. 'United Nations Environment Programme' की 'The Environmental Impact of the Conflict in Ukraine' रिपोर्ट के अनुसार  यूक्रेन में जंग से खेती को काफी नुकसान हुआ है. सबसे ज्यादा नुकसान यूक्रेन की मशहूर काली उपजाऊ मिट्टी (चेरनोज़म) को हुआ है. अमेरिकी कंपनी मैक्सार के सैटेलाइट चित्रों (जून 2022) में डोनेत्स्क-लुहान्स्क के खेतों में सैकड़ों गोले गिरने के गड्ढे और डोवहेंके में 40 मीटर चौड़ा बम गड्ढा दिखा. इन गड्ढों में फंसे बारूद के टुकड़े, जहरीली धातुएँ और ईंधन, बारिश के पानी के साथ मिलकर ज़मीनी पानी को प्रदूषित कर रहे हैं. खासकर खेरसॉन-मिकोलाइव इलाकों में, जहाँ ज़मीन के नीचे पानी सिर्फ 1-2 मीटर गहराई पर है. बड़े पशु फार्मों के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट भी बमबारी से टूट गए. 
डोनेत्स्क के एक सुअर फार्म से निकला जहरीला गंदा पानी कालमियस नदी में जा रहा है. युद्ध के चलते अभी इस प्रदूषण को रोकना मुश्किल है. रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि लड़ाई के चलते किसान जानवरों को खिला नहीं पाए या डॉक्टर नहीं बुला पाए. इस वजह से लगभग 42,000 भेड़-बकरियाँ, 92,000 गाय-भैंस, 2.58 लाख सूअर और 57 लाख से ज्यादा मुर्गियाँ मारे गए.


इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष: गाजा में पर्यावरणीय तबाही

इस्राइल-फलस्तीन संघर्ष, खासकर 2023 के बाद गाजा में, ने पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया. बमबारी से वायु प्रदूषण बढ़ा, जिसमें सफेद फॉस्फोरस जैसे रसायनों का उपयोग शामिल है. . 'United Nations Environment Programme' की 'Environmental impact of the conflict in Gaza' रिपोर्ट के अनुसार युद्ध में इस्तेमाल गोला-बारूद के ज़हरीले पदार्थ पेड़-पौधों और जानवरों को तुरंत नुकसान पहुँचाते हैं. इनसे मौत, बीमारी या विकास रुक सकता है . कुछ खतरनाक पदार्थ मिट्टी, पानी या समुद्र में दशकों तक रह सकते हैं, जिन्हें साफ करते समय सीधा संपर्क खतरनाक होता है. 

कई विस्फोटक इंसानों के लिए भी हानिकारक हैं, जैसे 'टीएनटी' से लिवर, किडनी खराब हो सकती है. आरडीएक्स दूषित पानी से नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है और कई गंभीर रोग सकते हैं. 
भारी धातुएँ (जैसे आर्सेनिक, सीसा) बेहद ज़हरीली हैं. थोड़ी मात्रा भी अंगों को नुकसान पहुँचा सकती है या कैंसर कर सकती है .
रिपोर्ट के अनुसार गाजा क्षेत्र में बम से बने गड्ढों की मिट्टी में निकल, क्रोमियम, ताँबा, मैंगनीज और सीसे की मात्रा बहुत ज़्यादा मिली, पुराने युद्धों से पता चलता है कि भारी धातुओं का प्रदूषण दशकों तक रहता है.

भारत-पाकिस्तान तनाव: कश्मीर की नाजुक पारिस्थितिकी को नुकसान

The Wildlife India के अनुसार जम्मू और कश्मीर राज्य ने 1947 के बाद से तीन युद्धों का सामना किया है और लगभग तीन दशकों तक युद्ध जैसी स्थिति में रहा है. मानव जीवन की क्षति के अलावा, इस संघर्ष ने क्षेत्र के पारिस्थितिक धन को भी नष्ट किया है. आतंकवाद-रोधी रणनीतियों के कारण सेना को जंगल क्षेत्रों में शिविर स्थापित करने पड़ते हैं, जिससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में व्यवधान पड़ता है. उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि 66% जीव-जातीय विविधता 460 मील लंबी और 15.5 मील चौड़ी नियंत्रण रेखा (LoC) के साथ मौजूद है और इसका काफी हिस्सा बारूदी सुरंगों के कारण नष्ट हो गया है.

 आतंकवादियों को पकड़ने की कोशिश में, सुरक्षा बलों द्वारा उच्च-वेग वाली राइफलों का व्यापक उपयोग, बिजली से घिरी बाड़, ठोस स्टील की दीवारें, रात भर की रोशनी, बहु-स्तरीय वाहन अवरोध, नई सड़कों का विशाल नेटवर्क, सभी इलाकों में चलने वाले वाहनों सहित गश्ती वाहनों का 24 घंटे का प्रवाह, निरंतर निम्न-स्तर के विमान उड़ानें, और पैदल गश्त जैसी विधियों का उपयोग होता है. हालांकि ये उपाय आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए बनाए गए हैं लेकिन ये हिमालयी घाटी के आसपास के गांवों और जंगलों में वन्यजीवों की आवाजाही में बाधा उत्पन्न करते हैं.

Center for Arms Control and Non-Proliferation की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध के दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभाव वायुमंडल में निकलने वाले धुएं से होंगे, और धुएं की मात्रा दोनों देशों के रणनीतिक हथियारों के आकार पर निर्भर करेगी. अध्ययन मानता है कि दोनों देश हिरोशिमा बम के आकार के हथियारों का उपयोग करेंगे, और अनुमान लगाता है कि दोनों देशों के बीच परमाणु संघर्ष से वायुमंडल में 17 मिलियन टन से अधिक काला कार्बन जाएगा. यह कार्बन सूर्य से गर्म होकर समताप मंडल में पहुंचेगा, जहां यह पृथ्वी तक सूर्य की रोशनी को रोकेगा और वैश्विक परमाणु सर्दी पैदा करेगा. यह आपदा कृषि को रोक देगी, समुद्र के तापमान को बदल देगी, और वैश्विक औसत तापमान को खतरनाक रूप से कम कर देगी. इसके अतिरिक्त, अध्ययन कहता है कि परमाणु युद्ध का धुआं कई वर्षों तक समताप मंडल में रहेगा, जिसका अर्थ है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष के पर्यावरणीय प्रभाव लंबे समय तक रहेंगे.


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