Monday, June 2, 2025

'ये मन बंजारा रे' : यात्रा, समाज और आत्म-खोज की अनूठी दास्तान

गीता गैरोला की किताब ये मन बंजारा रे एक यात्रा वृत्तांत से कहीं अधिक है। यह सामाजिक ढांचे, पर्यावरण, लैंगिक असमानता और सांस्कृतिक विरासत पर गहरे विचारों का संग्रह है।

'मैं उन सब में बड़ी शादीशुदा होने की सामाजिक सुरक्षा वाले हथियार से लैस थी', 'ये मन बंजारा रे' की शुरुआत में गीता गैरोला की अपनी यात्रा के दौरान लिखी यह पंक्तियां हमारे सामाजिक ढांचे पर सवाल उठाती हैं.

संभावना प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब में लेखक यात्रा का सलीका पाठकों के सामने रखती हैं पृष्ठ 21 में उन्होंने लिखा है 'गर्म कपड़े, कैमरे के सैल, दो जोड़ी मोजे, विंडचिटर, टोपी, कुछ बेसिक दवाइयां, बोरोलीन, पानी का गिलास वाला फिल्टर, सुई धागे की रील, एक बड़ी पॉलीथिन शीट और एक डिबिया में नमक, सब चीजें याद कर के पिट्ठू में रख दी.'

क्या किताब पहाड़ के संसाधनों का उचित प्रयोग नहीं कर पाने का दस्तावेज भी है, पृष्ठ संख्या 16 में लिखा है 'अरे भूली कौन आता है यहाँ माल्टे खरीदने.' 
'मुझे अचानक याद आया कि उद्यान विभाग फलों से जूस, अचार बनाना भी सिखाता है. इस बारे में उस वक्त वहां के दुकानदारों को कोई जानकारी नहीं थी.'

हिमालय की अधिकतर यात्राओं पर लिखी यह किताब  एक तरीके से हिमालय भ्रमण के लिए गाइड बुक भी है.  जैसे इसमें लिखा है 'चढ़ाई चढ़ने के साथ सूरज हिम श्रृंखलाओं को अपनी लाली से रंगने लगा था. यह अक्टूबर का महीना था इस वक्त हिमालय दर्शन अवर्णनीय होता है.'

किताब में बहुत सी जगह उत्तराखंड के मेलों की जानकारी और उनका इतिहास लिखा गया है.

किताब पढ़ते हुए हम गीता गैरोला को भी अपने जीवन में यात्राओं से परिवर्तन लाते देखते हैं, वह पितृसत्ता को चुनौती दिखाई देती रहती हैं, जैसे उन्होंने लिखा है 'उसके बाबा ब्याह के सालों बाद पैदा हुए बैठे को छाती तान के शान से गोद में लिए घूमते थे. सोचा जरा देखभाल कर के बाप होने का फर्ज निभाने का मौका उन्हें भी दिया जाए.'

सेवादास के बारे में किताब में लिखा है 'वे ढोलसागर पवाड़ों (एतिहासिक लोक गाथाएं) के गहन ज्ञाता थे. हमें अपनी क्षेत्रीय प्रतिभाओं की पहचान कर कद्र करने की समझ कब आएगी? हमारे पहाड़ों में जाने कितने ऐसे रत्न अनचीन्हे रह जाते हैं और उनकी विद्या भी उनके साथ ही समाप्त हो जाती है. विज्ञान के युग में अपनी परंपरागत प्रतिभाओं को रिकॉर्ड तक ना कर पाना हमारी पीढ़ी के लिए शर्मनाक ही कहा जाएगा.'

यात्रा में नई जगहों की मुश्किलें, लैंगिक असमानता, पर्यावरण, संस्कृति पर विचार करती रहती हैं.
'नन्दा भी तो औरत ही है माई जी और औरत होने के नाते उसको भी जरूर माहवारी होती होगी. एक औरत का इतना सम्मान और दूसरी तरफ जीती जागती औरतों के लिए यात्रा को वर्जित करना कहाँ का न्याय है.'

उत्तराखंड की कई महत्वपूर्ण जगह और यात्राओं का वर्णन भी उन्होंने आसान भाषा में दिया है, 'गढ़वाल के चमोली जिले में नन्दा देवी की जात यूँ तो हर साल होती है पर बारहवें साल में की जाने वाली जात को राजजात (राजयात्रा) कहा जाता है.'

राजजात यात्रा पहली बार पूरी करने वाली पांच महिलाओं में शामिल गीता गैरोला ने पहाड़ों की कठिन यात्रा और उनमें जाने का जज्बा लेखक के शब्दों से किताब में कई जगह झलका है , वह लिखती हैं 'कुलसारी तक पहुंचते तीन जगह सड़क सड़क पूरी तरह टूटी थी। चलने का रास्ता भी सड़क के साथ गायब हो गया था.'
ज्यूरांगली जैसी कठिन पहाड़ी पर चढ़ने उतरने के बाद वह लिखती हैं 'आज मैं कह सकती हूं स्त्रियाँ चाहें तो अपने लिए कुछ भी करने के लिए समर्थन जुटा सकती हैं.'

यात्राओं में काम आने वाले अनुभव भी उन्होंने बेहद सरल भाषा में पाठकों के साथ साझा किए हैं 'हमारे पास बदलने के लिए ज्यादा कपड़े नहीं थे, दिन भर जो कपड़े मोजे गीले हो जाते उन्हें रात को उतारकर पिट्ठू में रखे सूखे कपड़े और मोजे पहन लेते. दूसरे दिन सुबह सूखे कपड़े उतार कर पिट्ठू में रख देते और पहले दिन के उतारे हुए गिरे कपड़े पहन लेते.'

राजजात यात्रा में जाकर लेखक ने जलवायु परिवर्तन पर किताब के जरिए अहम बात बोली है, साल 2000 की राजजात यात्रा के बारे में बात करते वह लिखती हैं '1987 की राजजात में शामिल लोगों ने बताया कि कभी ये झील इससे दुगुनी बड़ी थी.'

पहाड़ की महिलाओं का कठिन जीवन पाठकों को दिखाने के लिए लेखक ने गीत का सहारा लिया है, जो उनकी दादी अपने खेतों में गा रही है. साथ में दादी के साथ ये बातचीत पहाड़ की महिलाओं को करीब से जानने का मौका देती है 'अरे बाबा हमारे पहाड़ी लोग अपने बेटे के लिए बहु के रूप में मजदूर लाते थे. पहाड़ की हर औरत खेती के काम के साथ घास, लकड़ी काटकर सारी जिंदगी बाप का कर्जा ही तो चुकाती है.'

'नीले पर्वतों के देश में' लेखक ने जम्मू कश्मीर की अपनी यात्रा के अनुभवों से वहां की खूबसूरती के साथ- साथ आर्टिकल 370 जैसे विषयों पर लिखा है. किताब के इस हिस्से में अपने बेटे और पति के साथ संबंधों पर भी उन्होंने खुल कर लिखा है, 'तब से आज तक गोलू के बाबा के साथ पारिवारिक कामों के अलावा कभी कहीं नही गई.'
 
'अभी बहुत कुछ बाकी है' में महिलाओं के बारे में लेखक जो भी लिखती हैं, पाठक उसमें खो जाते हैं। सरल भाषा की ये स्टोरीटेलिंग वाकई लाजवाब है और महिलाओं की सामाजिक स्थिति को पाठकों के सामने बार बार लेकर आती है 'हजारों लोग हम दोनों माँ बेटी के मालिक बनने को तैयार हुए, हमें कई तरह के लालच दिए'. 
बकरी चरा रही लड़कियों को 'तीन अप्रतिम सौंदर्य से पूर्ण वन कन्यायें' कहना साहित्यिक श्रेणी में गीता गैरोला को काफी आगे खड़ा कर देता है.

अपने बचपन को याद करती गीता गैरोला ने पाठकों को खुद से जोड़ लिया है,पाठक भी उनके बचपन की यादों में खो जाते हैं.
गढ़वाली गीतों और उनका अनुवाद, पाठकों को भी पहाड़ों से जोड़ता रहता है.

अपनी केरल यात्रा में गीता मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सवाल उठाती हैं तो पाठकों को लोगों का पहनावा भी बताती है.
इतिहास के बारे में भी वह बात करती रहती हैं. 'सुना है ब्रिटानिया के मिशनरी जार्ज अल्फ्रेड को कोवलम बीच बहुत पसंद आया और वो यही का हो कर रह गया था.'
ऐसे ही लोहाघाट के बारे में जानकारी देती हैं 'विक्टोरिया राज के मैकग्रोबर ने अपना चाय बागान बनाया जिसे बाद में स्वामी विवेकानंद ने मायावती आश्रम नाम दिया.

दलित महिलाओं का दर्द उन्होंने जिस तरह लिखा है उससे झलकता है कि गीता गैरोला ने अपने यात्राओं को सिर्फ प्रकृति की खूबसूरती देखने तक ही सीमित नही रखा बल्कि उन्होंने समाज की हर परतों को उधेड़ा है 'हमारे समाज में आज भी दलित महिलाएँ दो तरह से प्रताड़ित होती हैं. दलित होने के नाते और औरत होने के नाते.'

वृद्ध हो रहे पिता को लेकर लेखक का दर्द भी दिखा है 'दिन रात पुलिसिया परेड से गठे बदन वाले मेरे पिताजी आज इतने लाचार हो गए कि उन्हें घर से बाहर निकलने के लिए सहयोगी की जरूरत पड़ती है.'

यही जुड़ाव उनका अपने वन से भी है, जिसकी जगह सड़क बनने पर वह लिखती हैं 'तो फिर हमारा वण कहाँ गया?' यह पंक्ति विकास के लिए होने वाले विनाश को सामने ले आती है.

किताब पढ़ते लेखक नवीन जोशी की किताबें याद आती हैं जिनमें लिखा होता है कि जब गांव में लोग नही तब सड़क आई हैं, ये प्रवासियों के लिए बनी हैं. वैसे ही गीता भी लिखती हैं 'कितनी विडंबना है जब गाँव में लोग थे तब पानी नही था अब गाँव में लोग नही हैं पर घर घर पानी के नल लग गए.'

 छत्तीसगढ़, केरल में महिलाओं की स्थिति, वहां के पर्यावरण पर गंभीर बात हैं, पर कुछ घटनाओं ने किताब को ज्यादा लंबा खींच दिया है, जैसे पृष्ठ संख्या 45 में 'मेरा हाँफता काँपता मन कह रहा था कि चढ़ाई चढ़ते कमल को पीछे से एक डंडे से सटाक मार दूं , जुबान रुक जाएगी बाबू साहब की.' पृष्ठ 204 में ऐसे ही खिड़की पर खटखट की घटना का जिक्र हुआ है.

लेखक के महिला समाख्या कार्यक्रम में होने की वजह से उनकी कई यात्रा वैसी संभव हुई हैं, जैसा उन्होंने चाहा.
वह जहां गई वहां की प्रकृति और सांस्कृतिक विरासतों का वर्णन तो किया है पर उनका ज्यादा ध्यान सामाजिक कुरीतियों की तरफ ही ज्यादा रहा है, वह क्षेत्र की खूबसूरती उसकी बनावट पर विस्तार से लिख सकती थीं. 'यहाँ पर स्थानीय लकड़ी, पत्थर की वास्तुकला से बने पत्थर की स्लेटों वाली छत के मकानों की बसावट देखने लायक है.' विस्तार से लिखा जा सकता था.

महाराष्ट्र यात्रा में महाराष्ट्र के गांवों की तुलना उत्तराखंड के गांवों से करते उन्होंने 'बेचारा अपना उत्तराखंड और उसके दयनीय से ग्राम प्रधान' लिखा है, यात्रा के दौरान अपने गृहराज्य उत्तराखंड की तुलना अन्य राज्यों से करते रहकर उन्होंने अपने राज्य की नीति बनाने वालों का काम आसान कर दिया है.

यात्रा के दौरान पहाड़ की महिलाओं की उनके परिवार में स्थिति को वह खासतौर पर देख रही हैं 'मैंने धीरे से पार्वती से कहा तू तो खूब घी दूध खाती होगी. देव सिंह की तरफ इशारा कर बोली- जब दे देते हैं मैं खा लेती हूं.'

No comments:

Post a Comment

हेडबट से लेकर नाकामियों की हैट्रिक तक: आखिर इतालवी फुटबॉल के साथ क्या हुआ?

*हेडबट से लेकर नाकामियों की हैट्रिक तक: आखिर इतालवी फुटबॉल के साथ क्या हुआ?* मुझे 2006 विश्व कप का फुटबॉल विश्व कप आज भी याद है. फ्रांस और इ...