मुझे 2006 विश्व कप का फुटबॉल विश्व कप आज भी याद है. फ्रांस और इटली के बीच खेले गए उस फाइनल मैच के अतिरिक्त समय में फ्रांस के कप्तान जिनेदिन जिदान का मार्को मातेरात्ज़ी को मारा गया हेडबट, रेड कार्ड और फिर पेनल्टी शूटआउट में इटली की जीत, सब कुछ जैसे कल की ही बात हो. इटली तब फुटबॉल की दुनिया में तगड़ी टीमों में से एक थी.
लेकिन लगभग दो दशक बाद हालात ऐसे हैं कि विश्व कप के सबसे बड़े मंच पर इटली को ढूंढना पड़ रहा है. चार बार की विश्व विजेता टीम लगातार तीसरे विश्व कप के लिए क्वालिफाई नहीं कर सकी है. जिस टीम ने कभी दुनिया को बुफोन, तोती, पिर्लो और डेल पिएरो जैसे महान खिलाड़ी दिए थे, उसकी यह दशा देखना वाकई में दुखदाई है.
*बर्लिन की वह रात, जब इटली दुनिया का बादशाह बना*
घरेलू फुटबॉल में कैल्सियोपोली फिक्सिंग विवाद के बीच इटली की टीम 2006 विश्व कप में मैदान पर अपनी साख बचाने उतरी थी. कोच मार्सेलो लिप्पी की रणनीति, फैबियो कैनावैरो की कप्तानी और जियानलुइगी बुफोन की शानदार गोलकीपिंग ने इटली को एक अभेद्य टीम में बदल दिया. पूरे टूर्नामेंट में उसकी रक्षात्मक दीवार को तोड़ना दुनिया की बड़ी टीमों के लिए भी मुश्किल साबित हुआ. उस समय इटली का पारंपरिक कैटेनैशियो सिस्टम एक बार फिर दुनिया के सामने अपनी पूरी ताकत के साथ खड़ा था. कैटेनैशियो सिस्टम फुटबॉल की वह प्रसिद्ध रणनीतिक प्रणाली है जिसमें बेहद मजबूत रक्षापंक्ति और स्वीपर डिफेंडर के जरिए विरोधी टीम के लिए गोल करना असंभव बन जाता है.
*जर्मनी और फ्रांस के खिलाफ वो मुकाबले, जो इतिहास बन गए*
डॉर्टमुंड में जर्मनी के खिलाफ 4 जुलाई 2006 में खेले गए सेमीफाइनल को आज भी विश्व कप इतिहास के सबसे यादगार मुकाबलों में गिना जाता है. निर्धारित 90 मिनट तक 0-0 की बराबरी के बाद यह ऐतिहासिक सेमीफाइनल मैच एक्स्ट्रा टाइम में गया.
उसमें पहले आंद्रेया पिरलो के बेहतरीन पास पर फाबियो ग्रोसो ने शानदार गोल कर इटली को बढ़त दिलाई. इसके तुरंत बाद जर्मनी के हमले को नाकाम कर इटली ने काउंटर-अटैक किया और डेल पिएरो ने दूसरा गोल दागा. इटली ने मेजबान जर्मनी को 2-0 से हराकर उनके घरेलू मैदान पर कभी न हारने के रिकॉर्ड को तोड़ दिया.
9 जुलाई 2006 को बर्लिन में खेले गए फाइनल मुकाबले में इटली और फ्रांस निर्धारित समय तक 1-1 की बराबरी पर रहे. एक्स्ट्रा टाइम के दौरान फ्रांस के कप्तान जिनेदिन जिदान ने मार्को मातेरात्सी को हेड बट मारा और उन्हें रेड कार्ड मिला.
तनावपूर्ण पेनल्टी शूटआउट में इटली ने फ्रांस को 5-3 से हराकर चौथी बार फीफा वर्ल्ड कप का खिताब जीता.
*कभी दुनिया की सबसे बड़ी लीगों में थी सीरी ए*
इटली की घरेलू लीग सीरी ए कभी विश्व फुटबॉल का केंद्र मानी जाती थी. 1990 और 2000 के दशक में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी और कोच यहां खेलते थे. एसी मिलान, इंटर मिलान, युवेंटस और रोमा जैसे क्लब यूरोप पर राज करते थे. लेकिन समय के साथ इंग्लैंड की प्रीमियर लीग और स्पेन की ला लीगा आर्थिक और खेल दोनों स्तरों पर आगे निकल गईं. विदेशी खिलाड़ियों पर बढ़ती निर्भरता और स्थानीय प्रतिभाओं को सीमित अवसर मिलने का असर राष्ट्रीय टीम पर भी पड़ा. जिस लीग ने कभी पिर्लो, तोती और डेल पिएरो जैसे खिलाड़ी तैयार किए थे, वही व्यवस्था अब वैसी पीढ़ी तैयार करने में संघर्ष करती दिख रही है.
*स्वर्णिम पीढ़ी के जाने के बाद क्यों गहराया संकट?*
विश्व कप जीतने वाली पीढ़ी के संन्यास लेने के बाद इटली को नए सितारों की तलाश थी, लेकिन वह वैसा प्रतिभा पूल तैयार नहीं कर सका. पिर्लो जैसा मिडफील्डर, तोती जैसा प्लेमेकर और डेल पिएरो जैसा फिनिशर लंबे समय तक नहीं मिला. युवा विकास कार्यक्रमों में गिरावट और घरेलू क्लबों की प्राथमिकताओं ने भी इस समस्या को और बढ़ाया. धीरे-धीरे इटली का फुटबॉल मॉडल यूरोप की तेज, तकनीकी और आक्रामक फुटबॉल शैली के मुकाबले पिछड़ता चला गया.
कई विशेषज्ञ इसकी एक वजह सीरी ए में विदेशी खिलाड़ियों की बढ़ती मौजूदगी को भी मानते हैं. इंटर मिलान, एसी मिलान और अन्य बड़े क्लबों में विदेशी खिलाड़ियों की अहम भूमिका रही, जबकि स्थानीय युवा खिलाड़ियों, खासकर स्ट्राइकर और अटैकिंग खिलाड़ियों को अपेक्षाकृत कम अवसर मिले. इसका असर राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ी विकास पर भी पड़ा.
*2018 से 2026 तक, लगातार बढ़ता गया संकट*
साल 2018 में स्वीडन से हारकर इटली 60 साल बाद विश्व कप से बाहर हुआ. उस हार के बाद जियानलुइगी बुफोन की आंखों में आए आंसू इतालवी फुटबॉल के दर्द की तस्वीर बन गए. इसके बाद 2022 में यूरो कप जीतने वाली टीम से वापसी की उम्मीद थी, लेकिन उत्तर मैसिडोनिया ने प्लेऑफ में हराकर उसे एक और झटका दे दिया. तब इसे एक दुर्घटना माना गया, लेकिन 2026 तक आते-आते यह साफ हो गया कि समस्या कहीं ज्यादा गहरी है.
इटली क्वालिफाइंग ग्रुप में नॉर्वे से पीछे रह गया और उसे फिर से प्लेऑफ खेलना पड़ा. बोस्निया और हर्जेगोविना के खिलाफ निर्णायक मुकाबला पेनल्टी शूटआउट तक पहुंचा, जहां हार के साथ इटली लगातार तीसरी बार विश्व कप से बाहर हो गया. इस नाकामी के बाद सिर्फ टीम ही नहीं, बल्कि पूरा फुटबॉल प्रशासन सवालों के घेरे में आ गया. कोच गेनारो गट्टूसो ने पद छोड़ दिया, जबकि इतालवी फुटबॉल महासंघ (FIGC) के नेतृत्व पर भी सवाल उठे.
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