Thursday, December 10, 2020

अब प्रवासी वाला शोर कहां है?

मेनस्ट्रीम मीडिया में बहुत शोर मचा था प्रवासी-प्रवासी। इनको रोकने के लिए कई योजनाओं की घोषणा हुई। 

आईपीएल, सुशांत, बिहार चुनाव और अब किसान आंदोलन। हम सब भूल गए, अवसाद में बहुत से युवा बेरोजगार आत्महत्या कर रहे हैं, छात्र अपने भविष्य को लेकर चिंतित है।

ट्रम्प के धूम-धड़ाके और फिर प्रधानमंत्री के जनता कर्फ्यू वाले सम्बोधन से देश ने कोरोना महामारी की शुरुआत देखी। फिर अपने मूल निवास स्थान से पलायन कर रोज़गार की तलाश में घर से दूर रह रहे लोग जो अब अपने ही देश में प्रवासी कहलाए जा रहे हैं की घर वापसी का सिलसिला शुरू हुआ।

अपने भविष्य के लिए चिंतित और सरकार के बिना परिणाम की चिंता किए बगैर लगाए गए लॉकडाउन की वज़ह से हमने देश की सड़कों पर घर लौट रहे 'प्रवासियों' की भारी भीड़ देखी। कोई पैदल ही अपने बच्चों को कंधे पर लादे सैंकड़ो किलोमीटर की यात्रा पर चल पड़ा तो कोई साईकिल, ठेलों पर अपने घर पहुंचा। सभी प्रवासी इतने खुशकिस्मत नही थे ,कई ट्रेन की पटरियों पर ही हमेशा के लिए सो गए तो कुछ की यात्रा पैदल चलते-चलते ही समाप्त हो गई।

देश की नीति निर्माण करने वालों का अपने ही देश के मज़बूर श्रमिकों के लिए 'प्रवासी' शब्द का इस्तेमाल करना कितना सही है? 
भारत का संविधान (अनुच्छेद19) सभी नागरिकों को भारत की सीमा में पूरी आज़ादी से आने-जाने व भारत की सीमा के किसी भाग में रहने तथा बसने का अधिकार देता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(आईएलओ) के अनुसार, 'प्रवासी श्रमिक' को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया जाता है जो रोज़गार के लिए एक देश से दूसरे देश प्रवासित होता है।

घर वापसी के लिए श्रमिक बम अनायास ही नही फूटा था जनसंख्या वृद्धि की वजह से आज़ादी के बाद से ही भारत में पलायन की समस्या बढ़ती चली गई।

 उत्तराखंड के 'ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग पौड़ी' की सितम्बर2019 की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस सालों में प्रदेश की 6338 ग्राम पंचायतों से 3,83,726 लोगों ने अस्थाई तौर पर पलायन किया जो समय-समय पर घर वापस आते रहे। वहीं 3946 ग्राम पंचायतों से 1,18,981 लोगों ने स्थाई तौर पर पलायन किया।
उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में देश के अन्य ग्रामीण इलाकों की तरह ही कृषि मुख्य व्यवसाय है। उसके बाद क्रमशः मज़दूरी और सरकारी नौकरी लोगों के लिए जीविकोपार्जन के साधन हैं।
प्रदेश के गांवों में सबसे ज्यादा पलायन 26-35 वर्ष के युवाओं ने किया है। प्रदेश से 50.16 प्रतिशत पलायन रोज़गार और उसके बाद 15.21 प्रतिशत पलायन शिक्षा की वजह से हुआ है।

पलायन की वज़ह से समाज में कुछ सकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिलते हैं जिनकी अक्सर अनदेखी ही की जाती है। पलायन से दूसरी जगह जाने वाले को जातिगत विभाजनों से मुक्ति मिलती है। मैंने स्वयं बहुत से लोगों को उत्तराखंड से मुंबई, बंगलौर जाते ही अपने उपनाम बदलते देखा है। 
महिलाएं जो फैसले और स्वतंत्रता संयुक्त परिवार में नही ले पाती हैं, पलायन करते ही और एकल परिवार में आने के बाद वह खुद को सशक्त महसूस करती हैं।
पलायनकर्ता अपने स्त्रोतों से विभिन्न प्रकार के कौशल लाता है, जिनका प्रयोग वह घर वापसी पर करता है। जैसे वर्तमान समय में होटलों पर कार्य कर चुके लोग लॉकडाउन के बाद अपने मूलस्थान में होटल व्यवसाय जमाने की कोशिश कर रहे हैं।

उत्तराखंड के खटीमा में श्रीपुर बिछुआ के रहने वाले भास्कर चौसाली लॉकडाउन से पहले दिल्ली के चाणक्यपुरी में एक होटल में कार्य करते थे। अब उन्होंने अपने गांव में ही एक फ़ास्ट फूड रेस्टोरेंट खोला है। भास्कर कहते हैं कि गांव में इतना काम है कि मुझे अपने साथ दो-तीन सहयोगियों की आवश्यकता है लेकिन फिर भी स्थिति सामान्य होने पर वह दिल्ली लौटना चाहते हैं। दिल्ली में वह दिन भर काम करने के बाद मन बहलाने देर रात तक घूम सकते हैं पर यहाँ तो शाम होते ही सन्नाटा छा जाता है।  गांव में मनमाफ़िक काम भी नही किया जा सकता क्योंकि लोग खुद के काम से ज्यादा दूसरों के कामों पर ज्यादा ध्यान देते हैं। शहर की तेज़ जिंदगी में तो पड़ोसियों के नाम तक नही पता होते।

'ग्राम्य विकास एवं पलायन आयोग पौड़ी' की कोविड19 के प्रकोप के बाद उत्तराखंड के पर्वतीय जनपदों में लौटे श्रमिकों की सहायता हेतु सिफारिशों पर अप्रैल 2020 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में वापस लौटे श्रमिकों की संख्या 59,360 थी। जिसमें सबसे अधिक 12,039 पौड़ी जिले से थे।
25 से 30 प्रतिशत श्रमिक उत्तराखंड के ही विभिन्न शहरों से वापस आए थे, 60-65 प्रतिशत श्रमिक देश के अन्य बड़े शहरों और 3-5 प्रतिशत श्रमिक विदेश से वापस लौटे थे। 
 श्रमिकों की सहायता और उनके वापस पलायन को रोकने के लिए सरकार ने बहुत सी योजनाएं शुरू की थी पर अधिकतर लोगों को इन योजनाओं का ज्ञान ही नही था।

हमें यह जानना जरूरी है कि तमाम बाधाओं को पार करते हुए ऐसी आपात स्थिति में यह श्रमिक अपने गांव या मूल स्थान ही क्यों वापस लौटे। 
छह लोगों के परिवार वाले धर्मवीर उत्तराखंड के रुद्रपुर में दूधियानगर इलाके में रहते हैं और पिछले सोलह वर्षों से गोलगप्पे का ठेला लगाते हैं। जब मेरी उनसे मुलाकात हुई तो धर्मवीर ने बताया कि आज महीनों बाद फिर से ठेला लगाया है। लॉकडाउन में उन्होंने रुद्रपुर की ही एक धान मिल में काम किया। 
ऐसे लाखों लोग थे जिन्हें संकट की इस घड़ी में सिर्फ कृषि आधारित उद्योगों का ही सहारा था। यह हमारे लिए लज्जा की बात है  कि लाखों कृषक इस समय अपने अधिकारों के लिए पिछले कई दिनों से देश की राजधानी के बाहर आंदोलन कर रहे हैं।

दीपावली के बाद अब वापस आए प्रवासी फिर से रोज़गार के लिए शहरों का रुख करने लगे हैं, फ़र्क बस इतना है कि ट्रेन और बसों के चलने पर वह भीड़ सड़कों पर नही दिख रही है। भविष्य की अनिश्चितता अब  भी वैसी ही बनी हुई है,  किसी को नही पता कि कोरोना की लहर फिर से वापस लौटने  या फिर से कोरोना जैसी कोई अन्य महामारी आने पर क्या होगा। अब समय आ गया है कि हमारी सरकार को कृषि के साथ सड़क, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे वास्तविक मुद्दों पर फिर से गम्भीरता से विचार करना चाहिए।

तीन हफ़्ते बाद ही अपने लिए दो जून की रोटी की व्यवस्था न कर पाने वाले मज़दूरों की समस्याओं के समाधान करने के लिये कई कानून जैसे-’ अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम, 1979 और  ‘असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 बनाए गए, परंतु कई कारणों से ये अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में असफल रहे हैं। 
असंगठित क्षेत्रों में कार्य करने वाले मज़दूरों को अधिकांशतः सरकार की योजनाओं की जानकारी नहीं होती है, ऐसे में जागरूकता और परामर्श के अभाव में बहुत से पात्र लोग भी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते। मज़दूरों को सीधे सहायता पहुंचाने के लिए उनकी पहचान के लिए उपलब्ध आधार कार्ड का सही उपयोग कर उन तक उचित जानकारियां पहुंचाने के साथ ही आवश्यकता पड़ने पर सरकारी सहायता पहुंचाने की व्यवस्था भी करनी चाहिए।

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