Saturday, July 11, 2020

कोरोना काल राजनीतिक पार्टी लोकतंत्र से जनता लोकतंत्र लाने का सही समय ?


कोरोना प्रसार रोकने में सरकार की विफलता

पिछले साल ही चीन के वुहान शहर में कोरोना महामारी फैलने की ख़बर सामने आने लगी थी। भारत सरकार अपनी दूरदर्शिता की कमी के चलते तब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के स्वागत की तैयारियों में व्यस्त थी।
वहीं नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शन उग्र होने की वजह से देश के ह्रदय में बसा दिल्ली शहर धधक उठा। 
इस बीच ही देश के अंदर एक अदृश्य दुश्मन अपने पैर पसार चुका था।
बिना स्क्रीनिंग विदेश से आने वाले यात्री पूरे देश में फैल चुके थे। सरकार ने तब भी अंतराष्ट्रीय उड़ानों में प्रतिबन्ध लगाने में दो महीने से ज्यादा वक्त लगा दिया।
 22 मार्च को जनता का ध्यान थाली बजाने पर था तो वहीं सरकार ने बिना तैयारी के लॉकडाउन के गम्भीर परिणामों से बेखबर हो 25 मार्च से तीन महीने का लॉकडाउन लगा दिया। बेरोज़गार हो चुके श्रमिक भूखे मरने की डर से अपने परिवारों को साथ ले कर पैदल ही घर वापसी के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल सफर पर निकल पड़े और इस बीच 5 अप्रैल को देश साल की पहली दिवाली मनाने में मशगूल था।

श्रमिकों की घर वापसी के लिए बढ़ती भारी संख्या को देखते हुए 1 मई से श्रमिक ट्रेन तो चलाई गई पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लाखों श्रमिक पैदल ही अपने घर पहुंच चुके थे पर इनमें सब इतने भाग्यशाली नही निकले कुछ श्रमिक भूख-प्यास से तड़पकर बीच रास्ते में ही दम तोड़ते रहे तो कुछ सड़क और रेल दुर्घटनाओं का शिकार हो कर भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास पर हमेशा के लिए खूनी दाग छोड़ गए।

भाजपा सरकार ने शायद ही कभी विपक्षियों की बात सुनी हो, राहुल गांधी ने हॉवर्ड विश्विद्यालय के सूचनापत्र का हवाला देते हुए 12 फरवरी को ही ट्वीट कर दिया था कि हमारी सरकार इस खतरे को गम्भीरता से नही ले रही है। 

भारत में कोरोना टेस्टिंग अब भी उतनी नही हो रही है जितनी होनी चाहिए, सरकार की रणनीति में शुरू से अब तक कोई बदलाव देखने में नही आया है। स्वास्थ्य मंत्री यही कहते आए हैं कि हमने कोरोना से निपटने के लिए हर तरह की तैयारी कर रखी है। 8 जुलाई को तेजस्वी यादव बिहार के एक अस्पताल का वीडियो ट्वीट करते हैं जिसमें कोरोना मरीज़ एक ही वार्ड में एक शव के साथ दो दिन से रहने के लिए मजबूर हैं।
भारत में कोरोना मरीज़ों की संख्या 10 जुलाई तक आठ लाख की संख्या को पार कर गयी है और हम संक्रमित देशों की सूची में तीसरे स्थान पर हैं।
वहीं भारत सरकार अब भी यह मानने को तैयार नही है कि कोरोना का प्रसार सामुदायिक स्तर पर शुरू हो गया है।

बढ़ते कोरोना मरीज़ों की वजह से भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था अब चरमराने लगी है। बेड, वेंटिलेटर की कमी की वजह से अस्पताल नए मरीजों को भर्ती नही कर पा रहे हैं। कोरोना मरीज़ों की लाशों को गड्डे में फेंकने का वीडियो भी वायरल हुआ और ऐसे ही एक वीडियो में कूड़े वाली गाड़ी में कोरोना संक्रमित की लाश को ढोया जा रहा था।
ग्रामीण इलाकों में भी कोरोना संक्रमित मरीज़ मिलने लगे हैं जिन्हें इलाज के लिए 50-100 किलोमीटर दूर के अस्पतालों में भर्ती कराया जा रहा है।
दिल्ली की अमनप्रीत अपने ट्विटर हैंडल से पूरे सिस्टम से अपने कोरोना संक्रमित पिता के इलाज के लिए मदद की गुहार लगाते रही पर किसी भी अस्पताल ने उनके पिता को भर्ती नही किया और न ही प्रशासन की ओर से उनकी मदद के लिए कोई सामने आया।
अगर दिल्ली में कोरोना मरीज़ के साथ यह व्यवहार हुआ है तो उत्तर प्रदेश के किसी गांव या उत्तराखंड के किसी दुरस्थ पहाड़ी क्षेत्र में कोरोना मरीज़ के साथ क्या होगा इसका अनुमान आप खुद लगा सकते हैं।

सरकारी नीतियों पर भी सवाल

नम्बियों.कॉम द्वारा किए गए एक शोध में स्वास्थ्य देखभाल सूचकांक वर्ष 2020 में भारत बयालीसवें स्थान पर है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार के अनुसार 'भले ही स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार नही माना जाता हो परन्तु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 की उदार व्याख्या करें तो कोई भी स्वास्थ्य के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अभिन्न अंग के रूप में शामिल करने का प्रयास कर सकता है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है।'
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में मौलिक अधिकारों में स्वास्थ्य के अधिकार को शामिल करने पर कोई चर्चा नही की गई है। 
स्वास्थ्य पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में भारत का भी स्थान है। स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में भारत अपनी जीडीपी का 1 से लेकर 1.8 प्रतिशत तक ही खर्च करता है। 

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में जन स्वास्थ्य व्यय को 2025 तक जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है। इसमें भारत अब भी अमेरिका से बहुत पीछे है। अमेरिका अपनी जीडीपी का 17-18 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है।

भारतीयों की जेब पर अस्पतालों का खर्चा बहुत भारी पड़ता है। कई बार इलाज के दौरान लोगों को अपनी सारी सम्पत्ति तक बेचनी पड़ जाती है और फिर यह पैसा कभी सरकार या किसी एजेन्सी से वापस नही मिलता है।
स्वास्थ्य बीमा लेने वालों की संख्या में भारतीय बहुत पीछे हैं। हालांकि 2018 में प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना तो शुरू की गयी है पर इसकी भी कुछ सीमाएं हैं। इसमें प्रति परिवार प्रति वर्ष पांच लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज मिलेगा। यह इलाज पाने के लिए सरकार की ओर से ग़रीबी की कुछ परिभाषा बनाई गई है।

भारत के मध्यमवर्गीय परिवार अपने जीवन भर सरकार द्वारा बनाई गई गरीबी की इस परिभाषा और समाज द्वारा स्वीकृत मध्यमवर्गीय की परिभाषा के बीच झूलते रहते हैं। परिवार में किसी को एक गम्भीर बीमारी होते ही आधे से ज्यादा भारतीय परिवार सड़क पर आ जाते हैं।

भारत में कई राज्यों ने इस लॉकडाउन जैसे संकट के समय में भी श्रम कानूनों का एकतरफा निलंबन कर दिया गया। जिस पर देश के प्रमुख ट्रेड यूनियनों ने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन को पत्र लिखा था।
उत्तराखंड सरकार के श्रम अनुभाग द्वारा 5 मई 2020 को जारी किए गए संशोधन पत्र के अनुसार 12-12 घण्टे की दो पालियों में कार्य को स्वीकृति दी गयी है।
उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री सूचना परिसर से 6 मई 2020 को जारी किए गए एक पत्र के अनुसार उत्तर प्रदेश में वर्तमान समय में लागू श्रम अधिनियमों में तीन वर्ष की छूट प्रदान की गई है।

 कोरोना मरीजों से अपराधियों सा व्यवहार पंजाब के बरनाला में एक जेल को संगरोध केंद्र के रूप में बदला गया और देश के विभिन्न हिस्सों से भी इस तरह की खबरें आयी जो कोरोना मरीजों के साथ हो रहे गलत व्यवहार को दर्शाता है।
समाज में भी कोरोना मरीजों को लेकर नकरात्मक विचार घर कर गए हैं। कुछ मरीजों ने स्वस्थ होकर वापस अपने घर लौटने के बाद अपना निवास स्थान बदलने का विचार बनाया क्योंकि वह लोग इस संकट की घड़ी में अपने पड़ोसियों के द्वारा किए गए बुरे व्यवहार से दुखी थे।
कुछ ने कोरोना रिपोर्ट पॉज़िटिव आने पर कोरोना वॉरियर्स द्वारा किए गए दुर्व्यवहार के बारे में बताया कि कैसे उन्हें तैयार होने का मौका दिए बगैर एक अपराधी की तरह अस्पताल ले जाया गया।
पुर्वी राज्यों के लोगों के साथ नस्लभेदी टिप्पणियां की गई उन्हें कई जगह कोरोना फैलाने वाला कहा गया और चीन और नेपाल के साथ तल्ख़ होते रिश्तों के साथ यह स्थिति और भी ज्यादा ख़राब हो रही है।

पीएम केयर्स फंड पर बवाल कोविड-19 महामारी जैसी किसी भी तरह की आपातकालीन या संकट की स्थिति से निपटने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ एक समर्पित राष्ट्रीय निधि की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए और उससे प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करने के लिए पीएम केयर्स फंड के नाम से एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट बनाया गया है।

इस फंड में चीनी कम्पनियों से मिले दान पर जमकर विवाद हुआ और इस फंड से खरीदे जाने वाले वेन्टीलेटरों पर भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

पीएम केयर्स फंड के अस्तित्व पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, महामारी के इस दौर में सरकार को इस अनावश्यक विवाद से बचना चाहिए था और पहले से चले आ रहे राहत कोषों को ही बढ़ावा देना था।

कोरोना काल में भी राजनीति कोरोना काल में लोगों के अंदर भय बना हुआ है और लाखों लोग बेरोजगार हो गए है पर इस बीच भी देशभर में राजनीतिक पार्टियों की वर्चुअल रैलियां चालू हैं।

महाराष्ट्र में कोरोना संक्रमितों की संख्या 2,30,000 के पार पहुंच चुकी है पर वहाँ राजनीतिक खेल कोरोना काल की शुरूआत से अब तक चल रहा है।

मणिपुर में भी भाजपा सरकार गिराने के खेल में लोकतंत्र की असली पालक जनता का ध्यान किसे होगा!!

मध्य प्रदेश में आज कोरोना संक्रमितों की संख्या 16000 के आंकड़े को पार कर चुकी है और वहाँ भी राजनीतिक खेल कोरोना काल में भी चालू था।
कुछ समय तक मुख्यमंत्री महोदय को सत्ता के इस खेल की वजह से कोरोना प्रसार को रोकने का काम अकेले ही करना पड़ा था।

आधार और आरोग्य सेतु की अनिवार्यता

आधार की अनिवार्यता पर बवाल के बाद निजता के अधिकार पर चर्चा हुई। निजता का अधिकार हमें हमारे जीवन में होने वाले हस्तक्षेपों से बचाता है।
लोकतंत्र में यदि निजता का अधिकार प्राप्त है तो उसका पालन किया जाना भी आवश्यक है। 
अरोग्य सेतु एप और आधार कार्ड पर क्या सरकार यह गारंटी दे सकती है कि अगले पचास सालों तक इन दोनों के डाटा बेस पर कोई भी सेंध नही लगाएगा और अगर देती भी है तो इसकी क्या गारंटी है कि यह सरकार अगले पचास वर्षों तक सत्ता में रहेगी। 

स्मार्टफोन एक निजी सम्पत्ति है जिसे हम अपनी मेहनत की कमाई से जोड़ते हैं और लोकतांत्रिक देश में शायद हमें कोई इस बात पर मजबूर नही कर सकता कि आप इस एप को डाऊनलोड करने के बाद ही सार्वजनिक परिवहनों का इस्तेमाल कर सकते हैं और अगर किसी के पास बेसिक फोन है या वह स्मार्ट फ़ोन नही रखता तो क्या वह इन सार्वजनिक परिवहन के साधनों का प्रयोग नही कर सकता ?

जस्टिस बीएन कृष्णा समिति ने डाटा प्रोटेक्शन पर रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है और सरकार ने पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल 2018 पेश कर उसे कानून बनाने की तैयारी भी शुरू कर ली है। यह देखने वाली बात होगी कि उसमें बीएन कृष्णा समिति की कितनी सिफारिशों को लागू किया जाएगा पर यह सुप्रीम कोर्ट के निजता को मौलिक अधिकार मानने के ऐतिहासिक फैसले पर एक पहरा है। 
इसके कानून बनते ही सरकार स्वास्थ्य, देश की सुरक्षा के नाम पर कानूनी रूप से हम पर अरोग्य सेतु एप और आधार कार्ड जैसे अन्य तरीके अपनाकर हमारी निजता पर नए पहरे बैठाने लगेगी।
इंटरनेट में इस्तेमाल की गई हमारी हर गतिविधियों पर सरकार की नज़र रहेगी। 
हमारे डाटा पर सरकार की नज़र रखने का क्या दुष्परिणाम हो सकता है यह आप स्वयं मेरे साथ घटित  एक घटना से जान सकते हैं। एक नामी शॉपिंग साईट पर मेरे द्वारा की गई खरीददारी की पूरी जानकारी एक तीसरे पक्ष को भी थी जिसने मुझे एक ईनामी कार का प्रलोभन दिया। यह जानकारी तीसरे पक्ष तक पहुंचना बिना उस शॉपिंग साईट के किसी कर्मचारी के मिलीभगत के बगैर सम्भव नही है जिसने तीसरे पक्ष को मेरा डाटा बेचा हो।

पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन बिल 2018 के कानून बनने के बाद यही डाटा बेचने का काम डाटा प्रोटेक्शन विभाग से जुड़े किसी कर्मचारी द्वारा भी किया जा सकता है।

व्यापारियों के लिए महामारी एक बड़ा बाजार

तहलका की 26 जून 2010 में शांतनु गुहा रे की एक रिपोर्ट के अनुसार बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के संस्थान 'पथ' जो खुद को सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने वाला एक वैश्विक गैर लाभकारी संगठन कहता है द्वारा भारत में किए गए एक वैक्सीन ट्रॉयल में कुछ लड़कियों की जान गई थी जिनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी उनके माता-पिता से छुपाई गयी थी।
वैक्सीन ट्रॉयल में हुई मौतों पर भारत सरकार की तरफ से बिल एंड मेलिंडा गेट फाउंडेशन पर आज तक कोई कार्रवाई नही हुई है।

वर्ष 2017 में भारत सरकार ने टिकाकरण पर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के साथ सम्बन्धों में कटौती की थी। कोरोना काल में विश्व के सबसे बड़े परोपकारी के रूप में विख्यात इसी फाउंडेशन के स्वामी बिल गेट्स से भारतीय प्रधानमंत्री की वीडियो कॉल के माध्यम से वार्ता हुई। इस बातचीत के उपलब्ध कराए गए स्क्रीनशॉट्स में जनता के अपने हर सम्बोधन में नए-नए तरीके के मास्क पहनने वाले मोदीजी का मास्क गायब है और न ही बिल गेट्स ने मास्क पहना है।
बिल गेट्स को एड्स महामारी के बाद अब भारत में कोरोना का भी एक बड़ा बाज़ार दिख रहा है।

रिबेका प्रोजेक्ट फ़ॉर जस्टिस संगठन जो अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका में लोगों के जीवन गरिमा और स्वतंत्रता की रक्षा करने की वकालत करता है। वह कहता है कि बिल एंड मेलिंडा गेट्स की मदद से चलाए जा रहे एक प्रोग्राम पर एक मानवाधिकार रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और अफ्रीका में सैंकड़ों महिलाओं और लड़कियों को गर्भनिरोधक इंजेक्शन से जुड़े दुष्प्रभावों के बारे में नही बताया जा रहा है।

ग्लोबल फार्मास्युटिकल दिग्गज ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के बीच व्यापारिक सम्बंध बहुत पुराने हैं। 
ह्यूमोनोस्फीयर की एक रिपोर्ट के अनुसार ग्लैक्सो ड्रग में हुई एक धोखाधड़ी में बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन का सम्बंध भी था। 
यही ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन ब्रिटेन से कोरोना वैक्सीन आपूर्ति के सौदे में सबसे आगे चल रही है।

फार्मा कम्पनी माइलान और फाइज़र के बीच होने वाले विलय के बाद यह कम्पनियां एक बड़ी वैश्विक फार्मा कम्पनी बन जाएगी। हैदराबाद स्थित माइलान की लैब में भी बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने भारी निवेश किया है।
यही माइलान कम्पनी भारत में कोरोना वायरस के लिए अब तक की सबसे प्रभावी दवा रेमडिसिवीर पेश करने वाली है।

अपने देश की व्यवस्थाओं की समझ हर भारतीय को है। अपनी सुरक्षा अपने हाथों में ही होती है इसलिए कोरोना प्रसार को रोकने के लिए सरकार द्वारा सुझाए गए उपायों का पालन करे, जरूरत पड़ने पर ही घर से बाहर निकलें और सामाजिक दूरी का ध्यान रखें। हमेशा सेनेटाइजर को अपने पास रखें या घर से अंदर बाहर जाने के बाद अपने हाथों को साबुन से धोएं।

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