नीम करौली महाराज ने ही गिरिजा शंकर मुनगली के नामकरण में आकर उन्हें यह नाम दिया था, महाराज की पुत्री का नाम भी गिरिजा ही था। गिरिजा का मतलब है पार्वती या हिमालय की पुत्री।
चलिए इस नाम को गूगल पर सर्च करिए अब आपको इसके नतीजों में रिटायर्ड कर्नल गिरिजा शंकर मुनगली के 'एफसी टास्क फोर्स' के सदस्यों में चुने जाने के बारे में पता चलेगा।
गूगल की यह जानकारी उस शख्सियत की जानकारी देने के मामले में बहुत कम है जिसने नैनीताल की खूबसूरत वादियों से निकल उत्तराखंड का नाम देश-विदेश में रोशन किया।
सालों पहले नैनीताल की झील में अपने कुछ साथियों के साथ निडरता से तैरने वाले बालक गिरिजा का जन्म नैनीताल के एक धर्मपरायण परिवार में हुआ। उनके परदादा भवानी दत्त तब कुमाउनी समाज के प्रतिष्ठित लोगों में से थे, उन्होंने 19वीं शताब्दी में नैनीताल-हल्द्वानी सड़क के निर्माण के साथ ही भीमताल बैराज के निर्माण में अहम योगदान दिया था।
गिरिजा के पिता भुवन चन्द्र भी स्थापित ठेकेदार एवं सफल व्यापारी थे, उनके नीम करौली महाराज से बहुत अच्छे सम्बन्ध थे। नीम करौली बाबा ने वृंदावन से आने पर उनके हल्द्वानी स्थित घर में बहुत समय तक निवास किया था, बाबा के आदेशानुसार ही गिरिजा के पिता ने अपनी सामर्थ्यानुसार नैनीताल स्थित हनुमानगढ़ी मंदिर का निर्माण कराया।
नीम करौली महाराज ने ही गिरिजा शंकर मुनगली के नामकरण में आकर उन्हें यह नाम दिया था, महाराज की पुत्री का नाम भी गिरिजा ही था। गिरिजा का मतलब है पार्वती या हिमालय की पुत्री।
गिरिजा की एक बहन और चार भाई भी हैं और उन पर बचपन से ही अपने माता-पिता का बड़ा प्रभाव रहा और उनकी कही बातों को उन्होंने पूरे जीवन भर के लिए गांठ बांधा हुआ है। गिरिजा के पिता उनसे कहते थे कि जीवन में कुछ भी छोड़ना चाहते हो तो तुरंत छोड़ दो, अगर सोचोगे तो कभी नही छोड़ पाओगे।
अपनी माता कमला मुनगली की एक बात गिरिजा हमेशा दोहराते हैं और वह उसे ही अपने जीवन में सफलता का सूत्र बताते हैं, उनकी मां कहती थी कि तुम्हारा विश्व तुम्हारे मस्तिष्क के अंदर है। हारना और जीतना सब कुछ मस्तिष्क से ही नियंत्रित होता है।
नैनीताल का माहौल
बचपन से ही नैनीताल के पढ़ाई-लिखाई वाले माहौल का गिरिजा पर बहुत सकारात्मक असर पड़ा, वह कहते हैं कि नैनीताल की लाइब्रेरी ने उन पर बहुत गहरा प्रभाव डाला।
उसी लाइब्रेरी में किताब पढ़ते-पढ़ते उन्हें पता नही चला कि कब किताबें उनकी सबसे अच्छी दोस्त बन गई, किताबों के सिवा नैनीताल में राजीव लोचन साह और विजय मोहन खाती से भी उनकी आजीवन दोस्ती बन गई।
कॉलेज के दिनों में उनके प्रिय विषय अर्थशास्त्र और इतिहास थे, वह कॉलेज के दौरान ही एनसीसी की नेवल विंग से भी जुड़े।
नैनीताल में होने वाले खेलों से गिरिजा का रुझान खेलकूद की तरफ भी बराबर बना रहा।
कॉलेज के बाद गिरिजा ने अपने पिता के कहने पर अल्मोड़ा मैग्नेसाइट में नौकरी शुरू करी, उनके पिता चाहते थे कि गिरिजा कहीं काम कर जीवन के अनुभवों को सीखे। उनकी पहली तनख्वाह 175 रुपए थी, कुछ समय बाद उनके काम से प्रभावित हो कम्पनी ने उन्हें अहम जिम्मेदारी पर दिल्ली भेज दिया।
दिल्ली के अनुभवों ने गिरिजा को जीवन में संघर्षों से लड़ना सिखाया। इसी बीच घर के खराब होते आर्थिक हालातों ने उन्हें और भी अधिक मजबूत बनाया।
नैनीताल तल्लीताल कैंटोनमेंट क्षेत्र में जन्म लेने के कारण गिरिजा का सेना के प्रति बचपन से ही लगाव रहा, सेना से जुड़ने का गिरिजा का यह अधूरा सपना उनके दिल्ली प्रवास के दौरान और अधिक तब परवान चढ़ा जब वह 26 जनवरी की परेड देखने लाल किले पहुंचे।
यही शुरुआत थी जब गिरिजा ने सपने देखने शुरू किए और उन्हें पूरा भी किया।
सेना में अधिकारी के तौर पर जुड़ने के बाद उन्हें वहां अनेक विभूतियों के साथ काम करने और सीखने का मौका मिला जिनमें आर्मी चीफ बी सी जोशी, आर्मी वाइस चीफ जनरल दर, आईएमए के लंबे समय तक कमांडेंट रहे जनरल पन्त शामिल रहे।
सेना में रहने के दौरान ही जब गिरिजा अवकाश में नैनीताल आए तो उन्होंने वहां देवयानी को देखा, उन्हें पहली बार देखकर ही गिरिजा को महसूस हुआ कि यही उनकी जीवनसाथी होंगी।
देवयानी के पिता स्वामी राम, स्वामी राम हिमालयन यूनिवर्सिटी के संस्थापक और माता लीलू कुमार नैनीताल में अंग्रेज़ी की प्रोफेसर थी।
लीलू मशहूर लेखिका शिवानी और भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी के परिवार से सम्बन्ध रखती थी।
देवयानी से विवाह के बाद गिरिजा ने हिमालय विषय पर पीएचडी करी, जिसकी प्रेरणा उन्हें एडमण्ड हिलेरी से मिलने के बाद मिली।
गिरिजा की यह पीएचडी पद्मश्री शेखर पाठक के निर्देशन में पूरी हुई और इसी दौरान उन्हें हिमालय पर बहुत से किताबें पढ़ने का भी मौका मिला, जिससे वह गहराई से हिमालय को समझ सके।
सेना में वह पैराट्रूपर रहे और एक मौका तो ऐसा भी था जब उनके छोटे भाई जो वायुसेना में पायलट थे वह विमान चला रहे थे और गिरिजा ने उस विमान से जम्प करी थी।
जीवन बदलने वाली घटना
वर्ष 2001 में सियांग नदी में रिवर राफ्टिंग के दौरान हुई घटना को गिरिजा अपने जीवन को परिवर्तित करने वाली बताते हैं। वह कहते हैं कि जब उनकी राफ्ट वहां भंवर में फंस गई थी तो उन्हें उनकी मृत्यु स्पष्ट दिखी और उन्होंने वहां पर अपना पूरा जीवन प्रत्यक्ष देखा, उन्हें वह सब लोग दिखे जिनसे वह प्रेम करते हैं।
गिरिजा जब वहां से बचकर बाहर निकले तो उनका मस्तिष्क परिवर्तित होने लगा, वह कहते हैं कि उनके अंदर से मृत्यु का भय समाप्त हो गया और उन्हें अहसास हो गया कि कोई हमें हराता या जिताता नही है, पूरा बह्मांड हमारे अंदर ही है।
व्यक्ति जो चाहे कर सकता है।
अब गिरिजा को जीवन में कुछ नया करना था, वह फौज का जीवन छोड़ समाज के लिए कुछ करने का मन बना चुके थे। उन्होंने पुणे में फौज से वॉलंटरी रिटायरमेंट ले ली और कुछ समय भारत की बड़ी कम्पनियों में से एक 'वेंकीज़' में काम किया।
इसके बाद गिरिजा की इच्छा थी कि वह एक टाउनशिप विकसित करें और पुणे में जमीन ले उन्होंने अपने इस सपने पर काम शुरू किया।
गिरिजा की फौज में नौकरी के दौरान उनकी पत्नी देवयानी मुनगली ने अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए अलग-अलग स्कूलों में पढ़ाया, जिस वजह से उनका सपना था कि वह खुद का ऐसा स्कूल खोलेंगी जिसमें भारतीय बच्चे अन्य स्कूलों से हटकर सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्राप्त करें।
इसके लिए मुनगली दम्पति ने छह बच्चों के साथ संस्कृति स्कूल की शुरुआत की। स्कूल की पूरी योजना गिरिजा की पत्नी ने बनाई और गिरिजा ने यहां पर अपनी भूमिका सहयोगी तक ही सीमित रखी, वह पर्दे के पीछे ही कार्य करते रहे।
स्कूल के उद्घाटन में स्वयं एपीजे अब्दुल कलाम साहब आए थे। आज स्कूल की शाखाएं पुणे में तीन अन्य जगह भी खुल चुकी हैं और स्कूल ने महाराष्ट्र के सबसे अच्छे स्कूलों के तौर पर खुद को स्थापित किया है।
बाइचुंग भूटिया, किरण बेदी जैसे बड़े नाम स्कूल में आकर बच्चों को नई राह दिखाते रहते हैं।
मुनगली दम्पति विदेशों में अपने भ्रमण के दौरान वहां के स्कूलों में भी जाते हैं, देवयानी वहां से सीखे अनुभवों का फायदा उठा अपने स्कूल के छात्रों को भी विश्वस्तरीय शिक्षा प्रदान करने की कोशिश करती रहती हैं।
तिब्बतियों के धर्मगुरु दलाई लामा से हुई एक मुलाकात के बाद अब गिरिजा के उनसे बड़े ही आत्मीय सम्बन्ध हैं।
गिरिजा के दोनों बच्चे अपने पिता की दी हुई सीख से उनकी तरह ही निडर हैं और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ अब अपने माता-पिता के काम में सहयोग कर रहे हैं।
हिमालय के कर्ज़ को चुकाने का वक्त
गिरिजा अब पहाड़ में रोज़गार के अवसर पैदा करना चाहते हैं जिससे उत्तराखंड में पलायन की समस्या का समाधान हो।
वह शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी पहाड़ का विकास करना चाहते हैं, इन सब के लिए वह अपने अनुभवों को यहां झोंकना चाहते हैं।
वह कहते हैं उन्होंने जीवन में सब कुछ प्राप्त कर लिया है और अब पहाड़ का ऋण चुकाने का समय है, इसके लिए उन्हें कोई लाभ नही चाहिए।
इन सब के लिए वह एफडीआई का रास्ता अपनाना चाहते हैं।
गिरिजा ने अपने जीवन में जिन नियमों का पालन किया वह है-
● चलते रहिए
● सपने देखो पर एक लक्ष्य के साथ
● अपनी आवाज़ पर विश्वास करो
● अपने डर को कभी खुद पर हावी मत होने दो
हिमांशु जोशी, उत्तराखंड।
(लेखक गिरिजा शंकर मुनगली पर किताब भी लिख रहे हैं)









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