Wednesday, November 13, 2024

माता पिता के लिए भी मोबाइल का त्याग जरूरी है।

कोरोना काल के बाद से बच्चों के हाथ में मोबाइल ज्यादा लंबे समय तक रहने लगा है। माता पिता भी अपनी व्यस्तता के बीच बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी मोबाइल पर थोपते हुए उन्हें मोबाइल थमा देते हैं, जिसका बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव दिखने लगता है। बच्चे सोशल मीडिया पर अपनी पहचान बनाने चाहते हैं इस वजह से वह रील्स बनाते हैं और आजकल रील्स बनाते वह कई बार अपने भविष्य के साथ अपनी जान तक गंवा रहे हैं। बच्चों पर मोबाइल की वजह से पड़ रहे इन नकारात्मक प्रभावों और उसके समाधान को जानने के लिए हमने मेडिकल सोशल सर्विस ऑफिसर रोहित गुप्ता के साथ बातचीत की।

आजकल हम देखते हैं कि छोटे बच्चों को उनके अभिभावकों द्वारा व्यस्त रखने, खाना खिलाने के लिए मोबाइल पकड़ाया जाता है, किस मनोस्थिति की वजह से ये बच्चे मोबाइल की तरफ आकर्षित हो रहे हैं! इससे बच्चों को क्या नुकसान है और किस तरह उन्हें फोन से दूर रखा जा सकता है?

इस सवाल पर रोहित कहते हैं पैरंट्स और बच्चे दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं। वह सोचते हैं कि मैं अपने काम में व्यस्त हूं तो बच्चों को भी मोबाइल में व्यस्त रख लूं। बच्चे अगर व्यस्त रहेंगे तो हम भी अपना काम कर लेंगे।
इसकी वजह से बच्चों का अपने माता पिता की जगह लगाव मोबाइल की तरफ चले जाता है। बच्चा खाली मस्तिष्क के साथ पैदा हुआ है, वह इसी फोन को अपना सब कुछ मानने लगता है। पहले चार पांच महीने में ही फोन दिखाने की वजह से बच्चों को अपने आसपास के लोगों से मतलब नही रहता, वह फोन की दुनिया को ही सच मानने लगते हैं और इस वजह से वह वर्चुअल ऑटिज़्म की तरफ बढ़ने लगते हैं। वर्चुअल ऑटिज़्म, बच्चों में इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का ज्यादा इस्तेमाल करने की वजह से होती है। इसकी वजह से बच्चों में बोलने, सीखने की क्षमता प्रभावित होने लगती है।

जब यह बच्चे बड़े होने लगता है तो वह लोगों से बातचीत करने के बजाए डिजिटल दुनिया को ही सही मानने लगते हैं, उनमें सामाजिकता जन्म नही ले पाती है। वयस्क होने पर अपने निजी जीवन में जब बच्चों को कोई दिक्कत आती है तो वह डिजिटल दुनिया में ही अपना समाधान खोजने लगते है। इस वजह से ही आजकल के बच्चे आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने लगे हैं, पिछले महीने हमने अमेरिका में देखा कि एक चौदह साल के लड़के ने एआई गर्लफ्रैंड की वजह से आत्महत्या कर ली थी। बच्चों को डिजिटल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए माता पिता को खुद त्याग करना होगा। उन्हें बच्चों के सामने फोन इस्तेमाल नही करना चाहिए क्योंकि बच्चा सब कुछ अपने माता पिता को देखकर ही सीखता है।

बच्चों पर लगातार नज़र बनाए रखना जरूरी है।

रोहित से दूसरा सवाल किया गया कि सोशल मीडिया एक आभासी दुनिया है, कई टीनएज लड़के लड़कियों के साथ हमने इसकी वजह से यौन शोषण के केस देखें हैं, कैसे हम इन बच्चों की समझ विकसित करें कि वह आभासी दुनिया के सही गलत का अनुमान खुद लगा सकें!

इस सवाल पर रोहित ने कहा कि माता पिता का किरदार बच्चों के जीवन के साथ हमेशा बने रहता है। उन्हें 'लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्
प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ' श्लोक के हिसाब से चलना चाहिए, जिसका अर्थ है बच्चों को पांच वर्ष तक बहुत प्रेम करना है, इसके बाद पंद्रह वर्ष तक बच्चों के व्यवहार पर पूरी नज़र रखनी है। वह कुछ गलत कर रहा है तो उसे तुरंत समझाना है, जहां उसके साथ गर्म होकर निपटना है वहां गर्म होना चाहिए और जहां नरम होना हो वहां उसके साथ नरम होकर व्यवहार करना चाहिए। इसके बाद सोलह साल से उनके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए, उससे ऐसा व्यवहार बनाए रखना है कि वह अपनी कोई भी बात अपने माता पिता के साथ साझा कर सके। अगर ऐसा नही हो पाया तो वह बाहर के लोगों से अपनी समस्या कहेगा और ऐसा करते वह गलत रास्ते की तरफ जा सकता है।

अपने स्किल्स पर काम करते सफलता प्राप्त की जा सकती है।

बच्चों को माता पिता रियलिटी शो में भेजते हैं, हार का उनके मन में क्या असर पड़ता होगा? कैसे इससे बचा जा सकता है, सवाल पर रोहित ने कहा कि जल्दी लोकप्रिय करने की चाहत में बच्चों को ऐसी जगह भेजा जाता है। यह रियलिटी शो एक कम्पटीशन है और बच्चों को सिखाया जाना चाहिए कि जीत के साथ हार भी जीवन का एक हिस्सा है, आजकल सोशल मीडिया ट्रोल का चलन भी बढ़ा है तो बच्चों को नकारात्मक बातों से दूर रहने की सलाह भी दी जानी चाहिए।

बाजार में सब कुछ बिकता है- अमीरी, गरीबी, सादगी, अय्याशी, बच्चों की मासूमियत तक बिक रही है। बाजार हमेशा एक सा नही रहता और बाजार कल किसी और का भी हो सकता है।
इसलिए बच्चों को यह बताना होगा कि आपके अंदर जो स्किल है उस पर बेहतर काम करो। उन्हें किसी शॉर्ट कट की जगह मेहनत करना सिखाना होगा, यहां हम सचिन तेंदुलकर का उदाहरण दे सकते हैं। उन्हें पढ़ाई के दौरान पहचान आ गया था कि मैं क्रिकेट में कैरियर बना सकता हूं, इसके बाद ही उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ी। हमें अपनी पढ़ाई और स्किल के बीच बैलेंस बनाना होगा।

बच्चों के साथ वक्त बिताएं माता पिता।

रोहित से हमारा आखिरी सवाल आजकल रील्स बनाने के ट्रेंड की वजह को लेकर था। 
रोहित ने इस पर कहा कि बच्चे कपोल कल्पना करते हैं, वह किसी और को सोशल मीडिया पर स्टार बनते देखकर सोचते हैं कि मैं भी ऐसा कर सकता हूं। यहां माता पिता को अपने बच्चों को बताना चाहिए कि आप अपनी योग्यता पर विश्वास रखो, फल देर से ही सही पर जरूर मिलेगा। उन्हें अपने बच्चों की हर एक्टिविटी पर ध्यान रखना चाहिए, टीनएज द्वारा स्कूलों में मोबाइल ले जाने की प्रथा को रोकना होगा। माता पिता को चाहिए कि डिनर पूरे परिवार का साथ बैठकर हो और उस समय किसी भी डिवाइस का प्रयोग न करते बच्चों की समस्या को सुना जाए। सम्भव हो सके तो पूरे परिवार को सप्ताह के अंत में एक बार साथ बैठकर बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत करना चाहिए।

हिमांशु जोशी।

No comments:

Post a Comment

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?

*आस्था के साथ जिम्मेदारी भी: बद्रीनाथ पहुंचे श्रद्धालुओं ने क्या कहा?* गर्मियों के मौसम में स्कूलों की छुट्टियों के साथ ही उत्तराखंड में चार...