14 सितम्बर 1949 को हमारे देश की संविधान सभा ने एक मत से निर्णय लिया कि हिन्दी भारत की राजभाषा होगी. इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा के अनुरोध पर 1953 से देशभर में 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा.
यूनाइटेड नेशंस में हिंदी का प्रयोग बढ़ाने के प्रयासों के लिए हाल ही में भारत ने 8 लाख डॉलर का योगदान किया है.
इंडियन मिशन ने कहा कि भारत सरकार यूएन में हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास करती रही है. इन प्रयासों के तहत करीब चार साल पहले वर्ष 2018 में यूएन के डिपार्टमेंट ऑफ पब्लिक इंफॉर्मेशन के साथ मिलकर भारत ने Hindi@UN प्रोजेक्ट शुरू किया था. इसका लक्ष्य यूनाइटेड नेशंस की पहुंच हिंदी भाषा में बढ़ाने का है और दुनिया भर के लाखों हिंदी भाषी लोगों को वैश्विक मुद्दों को लेकर जागरूक करना है.
भारत सरकार द्वारा हिंदी के प्रचार प्रसार का यह प्रयास सालों से हो रहा है, हिंदी को विश्व भाषा बनाने की बात की जाती पर वास्तविकता यह है कि हिंदी अब तक अपने देश में ही लोकप्रिय नही हो पाई है.
हिंदी को देशभर लागू कराने का प्रयास विवाद का विषय भी रहा है. पिछले कुछ दिनों से कुछ बड़ी हस्तियां भी इस विवाद में उतरी हैं , पर वो सब हिंदी की जमीनी हकीकत से अनजान लगते हैं. भारतीयों ने अधिकतर कामकाजों में एक विदेशी भाषा को तो प्राथमिकता दी है पर हिंदी भाषा जो अधिकतर लोगों द्वारा समझे, बोले जाने की वजह से देश के विकास में सहायक है, उसे विवाद का विषय बना दिया है.
हाल ही में फ़िल्म निर्देशक, अभिनेता किच्चा सुदीप ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'पैन इंडिया फिल्में कन्नड़ में बन रही हैं, मैं इस पर एक छोटा सा करेक्शन करना चाहूंगा. हिंदी अब नेशनल लैंग्वेज नहीं रह गई है. आज बॉलीवुड में पैन इंडिया फिल्में की जा रही हैं. वह (बॉलीवुड) तेलुगू और तमिल फिल्मों का रीमेक बना रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी स्ट्रगल कर रहे हैं. आज हम वे फिल्में बना रहे हैं जो दुनिया भर में देखी जा रही हैं.'
किच्चा के इस बयान के बाद अजय देवगन ने हिंदी के समर्थन में हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बताते हुए यह ट्वीट किया.
अजय की रोज़ी रोटी हिंदी सिनेमा से चलती है तो उनका हिंदी के समर्थन में आना बनता है पर यहां वह हिंदी को राजभाषा की जगह राष्ट्रीय भाषा कह गए.
संसदीय राजभाषा समिति की 37वीं बैठक में गृह मत्री अमित शाह ने कहा था कि अलग-अलग राज्यों के लोगों को आपस में अंग्रेजी की जगह हिंदी में बात करनी चाहिए.
गृहमंत्री और अजय का हिंदी के समर्थन में दिया गया बयान जमीनी स्तर पर देश की राजभाषा की स्थिति के साथ न्याय करता नही जान पड़ता है.
किच्चा सुदीप भी अपनी जगह कहीं न कहीं सही ही हैं.
उत्तर भारत के लोग के लिए हिंदी पहली भाषा है तो दक्षिण, पूरब और पश्चिम में हिंदी दूसरे और तीसरे नम्बर पर खिसक जाती है.
हिंदी देश की राजभाषा है इसलिए सरकारी विभागों में हिंदी अनुभाग आवश्यक है और बहुत से सरकारी काम हिंदी में होते हैं लेकिन उस हिंदी को समझना अक्सर आम हिंदीभाषी के लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो जाता है.
उदाहरण के लिए हम अमित शाह के मंत्रालय की ही वेबसाइट का छोटा सा उदाहरण अपने पाठकों के सामने रखते हैं तो इसके होमपेज https://www.mha.gov.in/hi
में लिखे कुछ शब्दों को समझने के लिए हम गूगल का रुख करने पर मजबूर हो जाते हैं.
जैसे 'भित्ति चित्र' जिसे साधारण भाषा में दीवार पर बनाया गया चित्र भी कहा जा सकता था. साथ ही इसमें हमें 'अंतर्विष्ट' और 'उपबंध' जैसे कठिन शब्द भी दिखाई पड़ते हैं.
ज्यादातर कार्यालयों की हिंदी भाषा आमजनों के लिए समझनी मुश्किल ही बनी रहती है.
हिंदी भाषी लोगों को छोड़ दें तो अन्य के लिए तो हिंदी अनजान भाषा ही है.
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से जुड़े एक मामले में साल 2011 के अंत में गुजरात हाईकोर्ट ने कहा था कि गुजरातियों के लिए हिंदी भाषा एक अनजान भाषा है.
अपनों में ही बेगानी हिंदी
सिविल सेवा परीक्षा और एनटीए नेट जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा में हिंदी माध्यम में परीक्षा दे रहे छात्रों से यह कह दिया जाता है कि हिंदी अनुवाद गलत होने की स्थिति में अंग्रेज़ी में लिखे को सही माना जाएगा.
सिविल सेवा परीक्षा परीक्षा में वर्ष 2010 तक, हिंदी माध्यम के उम्मीदवारों में कम से कम तीन या चार उम्मीदवारों द्वारा शीर्ष 10 रैंकिंग प्राप्त की जाती थी. अब यह आंकड़ा शीर्ष 300 में भी नही है.
हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए इसे रोजगार की भाषा बनाना जरूरी है
कार्यालयों और शिक्षा क्षेत्र में बढ़ावा देने के साथ ही हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए उसे रोज़गार की भाषा बनाना भी जरूरी है.
अमर उजाला के साथ ज़ूम मीटिंग में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्योराज सिंह बेचैन कहते हैं कि विज्ञान ,मेडिकल और कानून की पढ़ाई हिंदी में की जाएगी, तभी रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी. अंग्रेजी के प्रति मोह के कारण हिंदी की अपेक्षा हुई है. अंग्रेजी स्कूलों में हिंदी बोलने में फाइन लगता है, कई जगह हिंदी बोलने पर मानसिक तौर से भी हीन संभावना महसूस की जाती है.
लोगों को एमए हिंदी बताने में शर्म महसूस होती है इसलिए एमए साहित्य कह दिया जाता है. विदेशी छात्र हिंदी को अधिक जिम्मेदारी से सीखते हैं.
सुरीनाम में हिंदी के विस्तार कारण फिल्मों और अखबारों को बताया गया.
भारत में भी हिंदी फिल्म और अखबारों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. हैदराबाद की रहने वाली और हिंदी विषय में शोध कर रही उषा यादव भी प्रोफ़ेसर बेचैन की तरह ही हिंदी अखबारों को बढ़ावा देने की आवश्यकता महसूस करती हैं. वह कहती हैं कि वैकल्पिक हटा कर हिंदी को अनिवार्य बना देना चाहिए.
यह सच है कि वक्त के साथ हिंदी प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, यूट्यूब ,व्हाट्सएप कई जगह लोगों को रोजगार दे रही है. कोरोना काल में इंटरनेट का प्रयोग कर हिंदी से रोजगार प्राप्त करने वालों की संख्या बढ़ी है.
मीडिया के साथ-साथ अध्यापन ,विज्ञापन ,अनुवादक और पर्यटन के क्षेत्र में हिंदी में रोज़गार की अथाह संभावना हैं.
विदेशी साहित्य के साथ-साथ देशी साहित्य का भी हिंदी अनुवाद उपलब्ध नहीं है, जिस कारण हम अपने ही साहित्य से अपरिचित हैं. देश में अंग्रेजी, हिंदी ,गुजराती पंजाबी या कोई भी अन्य भाषा पूरी तरह से प्रचलन में नहीं है. यदि सब जगह एक ही भाषा प्रचलन में होगी तो लोगों को भी विविध विषयों और साहित्य का ज्ञान एक ही जगह उपलब्ध हो जाएगा. हिंदी अधिकतर लोग समझते हैं इसलिए इन सब में बढ़ावा दिए जाने को लेकर यह बेहतर विकल्प है.
कई जगह अंग्रेजी के बिना काम नहीं तो उसका विकल्प क्या हो सकता है, इस जवाब को ढूंढने के लिए हम महाराष्ट्र में रह तकनीक के क्षेत्र में सालों से काम कर रहे कपिल जोशी से सम्पर्क कर इसका जवाब पाते हैं.
कपिल कई तकनीकी संस्थानों में कैंपस सिलेक्शन के लिए जाते रहते हैं, कपिल कहते हैं कि वह कम्पनी में आने के लिए किसी के द्वारा दिए जा रहे साक्षात्कार के समय यह ध्यान रखते हैं कि उसे कंपनी में आने के बाद कम से कम संचार के साधनों का प्रयोग करने लायक अंग्रेजी तो आती ही हो क्योंकि मेल आदि जैसे कार्यों को समझने के लिए अंग्रेजी तो आवश्यक ही है बाकी का काम हिंदी में चल सकता है.
इस बात का यह निष्कर्ष भी निकलता है कि यदि प्रथम और द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी का प्रचलन बढ़ाना है तो देश के अंदर संचार के साधनों में हिंदी को पूरी तरह से मिलाना आवश्यक है और जहां विदेशों से संचार किया जाता है, वहां भी धीरे-धीरे हिंदी की महत्ता बढ़ाई जाए.
हिमांशु जोशी.

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