खिड़की के उस पार सामने तार पर कबूतर का जोड़ा चोंच से चोंच मिला रहा है।
साल 2017 हां, शायद सत्रह ही, तुम अपने ऑफिस की खिड़की के बाहर ऐसे ही बैठे कबूतर के जोड़े की तस्वीर मुझे भेज रही थी।
उस लाल रंग की इमारत में स्लेटी रंग के कबूतर का जोड़ा अपनी मोहब्बत की दास्तान लिख रहा था। उनके साथ एक और मोहब्बत की दास्तां लिखी जा रही थी, हमारी दास्तान।
तुम और मैं ऐसे ही तो थे, मन मस्तिष्क से एक। एक दूसरे के लिए समर्पित।
इन शब्दों को पिरोना मैंने तुमसे ही तो सीखा है।
तुम्हारे अखबारों, मैगज़ीनों में लिखे आर्टिकल।
मेरे लंबे लंबे वाट्सएप मैसेज, जिन्हें पढ़ तुम बैचैन हो उठती थी।
बैचेन आज भी होती हो पर आज हालात कुछ और हैं।
आजकल मेरा लिखा कुछ भी पढ़ती हो तो यही कहती हो। 'सीखा किससे है'?
तुम्हीं तो प्रेरणा हो। तुमने जो दर्द दिया वो अब भी मेरे दिल के किसी कोने से निकलकर दिमाग में उतर आता है और फिर कुछ भी लिखता हूं तो उसमें दिल और दिमाग साथ ही शामिल हो जाते हैं।
कॉलेज के शुरुआती दिन ही थे, जब एक दिन तुम अपनी सहेली के साथ पहली बार मुझे दिखी थी। वाट्सएप ग्रुप में एक दूसरे की बातों का जवाब देते देते कब हम एक दूसरे के साथ चैटिंग करने लग गए पता ही नही चला। पहले पहले एक दूसरे को जानने के लिए लिखे ये मैसेज, किसी फिल्मी कहानी की तरह अपना रंग बदलते रहे।
मुझे याद है जब तुम्हें मैंने पहली बार कॉल की थी । 25 दिसम्बर 2016।
तुम्हारे घर, पिछली जिंदगी के बारे में जानने के बाद कब तुमसे दिल लग गया पता ही नही चला।
तुमने भी अपनी जिंदगी के खालीपन को मुझसे भर लिया था।
तुम्हारी हर याद हमेशा मेरे साथ है, बिल्कुल सामने। मानो किसी टेलीविजन पर चलती हुई।
बहुत खूबसूरत लग रही थी तुम उस दिन, जब हम पहली बार साथ घूमने नैनीताल गए थे।
भीगे खुले बालों के साथ तुम मेरे सामने आई और फिर सामने बैठे तुम्हें निहार रहा था तो मुस्कुराने पर हमेशा की तरह तुम्हारी नाक के दोनों तरफ निकल आई लकीरें। ये सब मेरी धड़कनें अब भी बढ़ा देते हैं।
उसी दिन पहली बार महसूस भी हुआ था कि किसी लड़की का साथ होना सिर्फ 'मजा' लेना भर नही होता, एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी का अहसास भी होता है। ये अहसास जब तक हम साथ रहे तब तक बने रहा और शायद इसी जिम्मेदारी ने हम दोनों को एक दूसरे के इतने करीब पहुंचा दिया।
मेरे विचारों में ये रिश्ता आज भी ठीक वैसा ही है जैसा हीर रांझा, रोमियो जूलियट का रहा होगा।
इतना सब पढ़ने के बाद कोई सोचेगा कि सब ठीक था तो, अलग क्यों।
मैं तुमसे कहता था न कि हमारी कहानी किसी बुलेट ट्रेन की तरह भाग रही है, बहुत तेज़। शायद तब मैं अकेले बैठ सोचता भी था 'कहानी लिखुंगा हम दोनों की, नाम.... 'बुलेट ट्रेन' ठीक रहेगा'।
आज जब भी मेरे मस्तिष्क में तुमसे दूर होने के दिनों की स्मृतियां जब नृत्य करने लगती हैं तो लगता है कि पूरे शरीर की रक्त धमनियां इस नृत्य से थक कर चूर हो रही हैं, मैं खुद को पेड़ से गिरे उस पत्ते की तरह महसूस करने लगता हूं जो टूट कर अंधड़, बारिश की वजह से पीला फिर काला से पड़ने लगा है। शायद प्रेम की अमर कथाओं में इसे ही किसी प्रेमी का प्रेम में तड़पना कहा गया है।
एक स्त्री का जीवन बहुत सी जिम्मेदारियों का घर होता है। घर में भतीजी, मम्मी, बहन, नानी सबको साथ जोड़े रखना तुम्हारी जिम्मेदारी थी।
बिना बाप की बेटी के लिए इस दुनिया में अकेले रहना कितना मुश्किल है ये मैंने तुमसे ही जाना।
तुम जब पहली बार अपनी मम्मी के साथ उसे देखने गई तो मैं सब कुछ भूल गया था, क्या कुछ नही कहा तुमसे। फिर भी तुम हमेशा मेरे साथ थी।
तुम्हारा सर मेरे कंधों पर ही अपना सुकून ढूंढता था, कई बार उसे मेरे नाम से बुला लेती थी।
कैसे तुम्हें, तुम्हारी यादों को गुनहगार ठहराऊं! तुमने तो एक दिन मेरी आँखों मे आंख मिला खुद कह डाला था 'मना कर दूं, अपने घर, कह दूंगी के मुझे नही करनी उससे शादी'
मैं चुप था, नही चाहता था कि हमारा रिश्ता तुम्हें कभी कोई दुख दे। क्या मैं तुम्हें कभी कोई दुख दे सकता था!
तुम्हारी शादी से कुछ दिन पहले हमारी बात होती रही पर फिर 'शौर्य' के पैदा होने पर तुमने मुझे उसकी तस्वीर भेजी थी।
तुम्हारी तरह ही है वो, वहीं आंखें, वही मासूमियत।
अब हमें पता है कि हम दोनों की मंजिल तो एक है, पर रास्ते अलग हैं। इस यात्रा में तुम्हारा सहयात्री कोई और है , मेरा सहयात्री कोई और।
फिर भी आज मैं खुश हूं क्योंकि इस स्मार्टफोन वाली जिंदगी में जहां भी रहूं, तेरी याद साथ ही है।
अब इस स्मार्टफोन की वजह से ये विरह भी इतना नही सालता।
जब याद आए तो महबूब की तस्वीर निहारी जा सकती है और तुम्हारी जिंदगी की कहानी भी वाट्सएप स्टेटस बताते ही रहता है।
शायद तुम भी मेरी तरह इसमें खुश रहती होगी या नही भी।
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