Sunday, September 11, 2022

वो बचपन की यादें

बचपन! कब से मानूं!! तब से जब से होश संभाला या तब तक जब से जिम्मेदारी लेनी शुरू की।

बचपन के दोस्तों से जोड़ूं या बचपन की यादों से जोड़ूं। उनसे जोड़ूं जो बचपन में थे आज नही हैं या उनसे जोड़ूं जो आज होकर भी साथ नही हैं ।

क्रिकेट हां, इससे मेरे बचपन की हर डोर जुड़ी है। होश संभालने से लेकर अपनी जिम्मेदारी लेने तक।
इस क्रिकेट ने मुझे दुनिया से जोड़ा और सामाजिक बनाया। आज के बच्चों को फोन से चिपका देखता हूं तो इनके भविष्य को लेकर कई सवाल मन में उमड़ आते हैं। बच्चे हां दो भाई थे वो। मेरे पड़ोस में नए ही आए थे और घर जैसे ही हो गए। मैं सातवीं कक्षा में था और वो दोनों भाई दीपक, विक्की चौथी और दूसरी में।

क्रिकेट की छह सात लोगों की हमारी टीम में फील्डिंग करने के लिए हमें दो नए खिलाड़ी मिल गए थे।

दीपक के पापा गोपाल अंकल रोडवेज में ड्राइवर थे और ड्यूटी में रहते उन्हें विक्की से ज्यादा दीपक की ज्यादा चिंता लगे रहती थी।मुझसे कई बार कहते 'यार हिमांशु इसे समझाया कर, पढ़ाई में मन नही लगाता। विक्की तो ठीक है'।

क्रिकेट में मुंह खोल के बॉलिंग कराने वाला दीपक एक औसत खिलाड़ी ही था पर विक्की के तगड़े छक्के हमें प्रभावित करते थे। विक्की ज्यादातर मेरी टीम में ही रहता और दीपक विपक्षी।

इस बीच आइपीएल की शुरुआत हुई और गांगुली फैन दीपक ने अपनी टीम कोलकाता नाइट राइडर्स का सपोर्ट करना शुरू कर दिया था। मेरे पापा का वो स्कोर कार्ड था।
नीली कमीज और खाकी पेंट में साइड की मांग निकाल बाल बनाए दीपक सुबह सुबह 'अंकल नमस्ते । कल तो मुंबई जीत गई, कल साउथ अफ्रीका हार गई' जैसी खबरें जोर से चिल्लाता सुनाई पड़ता था।
कई बार दीपक के घर में बाहर वाले कमरे पर हम साथ बैठकर मैच देखते थे।

वक्त गुजरता गया, मैं स्कूल खत्म कर कॉलेज के लिए घर से दूसरे शहर चला गया। घर आता तो मम्मी से दीपक के शराब पीकर घर में लड़ने झगड़ने के किस्से अक्सर सुना करता था मेरा बचपन खत्म हो रहा था तो दीपक भी युवा हो रहा था, कभी कभी क्रिकेट खेलने जाते तो मैं उससे उसके नशे के आदत के बारे में बात करता तो वो यूंही कह देता 'यार हिमांशु दा , बस ऐसे ही थोड़ा शौक के लिए लगा लेता हूँ'।

अब मैं नौकरी लग चुका था और दीपक भी हल्द्वानी में कॉलेज पढ़ते हुए किसी होटल पर काम कर रहा था। शायद रिसेप्शन पर रहता था। एक दिन खबर मिली कि जंगलों के बीच दोस्तों के साथ ब्यानधुरा मंदिर जाते दीपक की मृत्यु हो गई। कारण कभी सामने नही आ पाया।
 मैं दीपक के गुजर जाने के बाद उनके घर में पहली बार गया तो दीपक की मम्मी से नजरें नही मिला सका था। उनकी आंखें बहुत उदास सी थी, शायद वो मुझमें अपने बुझे दीपक की तलाश में थी।

अब विक्की भी बड़ा हो गया था और हल्द्वानी से बीसीए के बाद दिल्ली में नौकरी करने लगा था। वहीं उसने अपने ऑफिस की एक सहयोगी से शादी भी कर ली थी।

दीपक के जाने के बाद गोपाल अंकल टूट गए थे,मेरे बचपन के दिनों में गोल मटोल रहे गोपाल अंकल अब डाइबिटीज की वजह से कमजोर होने लगे थे।
मुझे बचपन में उनके परिवार के साथ बालाजी मंदिर की यात्रा हमेशा याद रहती थी। हमारे घर में कोई भी फंक्शन होता तो गोपाल अंकल मेजबान की भूमिका में रहते थे।
एक दिन मम्मी ने फोन पर बताया कि गोपाल अंकल भी हार्ट अटैक की वजह से इस दुनिया से चले गए।

अब बचपन में मासूम से चेहरे वाला विक्की घर का कमाने वाला एकमात्र व्यक्ति बन गया था। 
मां के रहते अब शादी ब्याहों के निमंत्रण विक्की के नाम पर आने लगे। 
उसके द्वारा शराब पीकर पत्नी के साथ मारपीट और लड़ाई की खबरें भी सुनने लगा था।

कोरोना की वजह से विक्की लगभग दो साल से घर पर है। वो घर से ही काम करता है।
उस छोटे विक्की की अब एक छोटी सी प्यारी बिटिया भी है।
मैं महीनों बाद कल उससे मिलने गया, शायद वो अब घर में लड़ाई नही करता। इसी बीच उसने बताया कि उसे अगले महीने दिल्ली वापस लौटना है। पत्नी और बेटी के साथ मम्मी भी वहीं रहेंगी और वो इस घर को बेचकर दिल्ली में फ्लैट ले लेंगे।

विक्की से मैंने बस इतना कहा कि इस घर में तुम्हारी बहुत सी यादें हैं। कोशिश करना कि घर मत बेचना कभी कभी आते रहना।

उसके घर से बाहर आने पर सब कुछ मेरी आँखों के सामने घूमने लगा, उसका बचपन, मेरा बचपन, क्रिकेट का मैदान। 
वक्त बदल जाता है, बचपन भी बस याद बन कर रह जाता है। ठीक दीपक के कमरे की उस टीवी की तरह जिसकी जगह अब एलईडी टीवी ने ले ली थी।

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