गिरधारी का दोस्त चकरु- "ए गिरधारी मेरे माचिस के डिब्बों में एक तिल्ली और दो सन्दूक हैं, अपनी दिखा।"
गिरधारी- "बेटा चकरु तुम दो सन्दूक तो हम तीन बंदूक हैं, निकालो हमारे पांच सौ रुपए।"
सातवीं में पढ़ने वाला गिरधारी स्कूल कम जाता था और
पैसा पैसा कहते हुए दिन भर गांव के पास रुड़की वाले वर्मा जी के बाग में दिन भर अपने बिगड़ैल दोस्तों के साथ माचिस के डिब्बे वाले खेल से पैसा कमाता।
गिरधारी की मां चंपावती उसे दुनिया का सबसे अच्छा बेटा मानती थी, आखिर मानती भी क्यों न। गिरधारी ने ग्यारह साल की उम्र में ही अपने घर में खुद की कमाई से रेडियो, कुर्सी जोड़ लिए थे।
रामधारी को रुड़की जाने पर ही दिहाड़ी मिलती थी, कई बार वो रुड़की में ही अपने अन्य साथियों के साथ सड़क किनारे सो जाता था, इन परिस्थितियों में उसे अपने बेटे गिरधारी के बारे में ज्यादा सोचने का वक्त भी नही था।
वक्त बीतता गया, गिरधारी की पैसे की भूख बढ़ती जा रही थी। दसवीं में पहुंचते गिरधारी गांव के नए जुआरियों का मुखिया बन गया था, साथ ही उसने मंगलौर से रुड़की जाने वाली गाड़ी में क्लीनर का काम भी शुरू कर दिया।
स्कूल में कम और गाड़ी में लटके हुए ज्यादा दिखने वाला गिरधारी अपने कान में सवारियों से मिले नोटों को घुमा कर रखता और इन रंगबिरंगे नोटों की खुशबू उसे और पैसा कमाने के लिए प्रेरित करती।
"चकरु हमने सुना है ये गांव की लकड़ी रुड़की में बहुत महंगी बिकती हैं, चल आज से सांझ ढलते ही सेकल में इन्हें वहीं पहोंचा दिया करेंगे" गिरधारी बोला।
"गुरु जैसा तू कहे" बचपन से ही गिरधारी की पैसा कमाने की कला का कायल चकरु हमेशा उसकी हां में हां ही मिलाता था।
लकड़ी बेचकर और जुआं खेलकर पैसा कमाने वाला गिरधारी आज रुड़की से सूट बूट पहन नई स्पलेंडर बाइक खरीद कर आया था। उसकी मां चंपावती ये देख फूली नही समा रही थी, कमज़ोर देह के हो चुके रामधारी को तो शुरु से ही इन सब मोहमाया से मतलब नही था तो वह एक तरह बैठे हुक्का गुड़गुड़ाने में व्यस्त थे।
गिरधारी को इस भेष में देख गांव भर में कानाफूसी तो थी पर जमींदार साहब के घर, गांव में अपनी बाइक के बाद दूसरी बाइक आने की खबर से सबसे ज्यादा कौतूहल था। जमींदारनी की नज़र छत पर चढ़ गिरधारी के घर की तरफ ही गढ़ी हुई थी।
इन गरीबों के पन्नी से ढके एक लाइन में बने कच्चे मकान अलग ही चमकते थे, पर इनके बीच महंगे तिरपाल वाला गिरधारी का घर अलग ही दिखता था।
चकरु की मेहनत और गिरधारी का दिमाग जैसे जैसे बढ़ रहे थे। वैसे वैसे गिरधारी के पैसे की भूख भी बढ़ने लगी। चौड़ी छाती, लंबा कद, घुंघराले बाल, घनी मूंछो वाला गिरधारी अब 24 साल का आकर्षक युवा हो चला था। पैसा पैसा करता वो कई सारे गैरकानूनी काम करने लगा था, जिसमें नशा, तस्करी और मानव तस्करी जैसे काम शामिल थे।
एक रात गांव के ही ढाबे में चकरु के साथ पैग बनाते गिरधारी बोला "यार चकरु मुझे थोड़ा और पैसा मिल जाए तो रुड़की में घर बन जाए। बापू तो रहे नही, अब शहर में घर बना कर मां को वहीं रखता हूं।
वहीं शादी भी कर लूंगा और तू भी साथ ही रह लेगा।"
कुछ दिनों बाद नशे की तस्करी से गिरधारी मोटा पैसा कमा रहा था और अब उसने चकरु को हिस्सा देना कम कर दिया था।
नई अल्टो कार खरीद, गले में सोने की मोटी चैन पहने गिरधारी ने मंगलौर की कच्ची सड़क में खूब धूल उड़ाई और फिर मां को कार बैठाकर रुड़की में घर बनाने के लिए खरीदा नया प्लॉट भी दिखा दिया।
जल्द पैसा कमाने की चाह रखने वाले मंगलौर के युवाओं में गिरधारी से अच्छा उदाहरण और कोई न था, उनके लिए वो आदर्श बन गया था।
चकरु अब धीरे-धीरे पैसों के पुजारी गिरधारी से जलने लगा था, पुलिस ने नशीली वस्तुओं के व्यापार पर लगाम कसने के लिए नशे के सौदागरों पर अच्छा खासा इनाम रखा हुआ था।
पुलिस के इनाम का लालच और गिरधारी का घमंड चकरु को अपने लँगोटिया दोस्त का दुश्मन बना गया।
चकरु ने चरस लेकर शहर जा रहे गिरधारी की पुलिस से मुखबिरी कर दी।
मंगलौर से रुड़की जाने वाली सड़क के दोनों तरफ पेड़ थे, पुलिस अपनी जीप को ओट में लगाए गिरधारी का इंतजार कर रही थी।
अल्टो कार में गिरधारी कान के ऊपर दो हज़ार का नोट मोड़ कर फंसाया हुआ, अपनी धुन में मग्न होकर चला आ रहा था। पुलिस ने उसे रुकने का इशारा किया तो उसने गाड़ी और तेज़ भगा दी।
अगले दिन तेज़ बरसात हो रही थी,
चकरु अस्पताल के बाहर एक कोने में खड़ा गिरधारी की मां को संभाल रहा था। गिरधारी की लाश पोस्टमार्टम के लिए ले जाई जा रही थी, जीवन भर पैसे के पीछे भागने वाले गिरधारी के कान में अब भी दो हज़ार का नोट फंसा हुआ था और इंस्पेक्टर खुम्मन ने चकरु की तरफ आकर उसके हाथ में गिरधारी की मुखबिरी का इनाम एक लाख रुपए पकड़ा दिए।
इस दुनिया में अकेली रह गई चंपावती इस खेल को कहां समझती , उसकी बूढ़ी हो चुकी आंखे तो बस अपने बेटे को आखिरी बार देख लेना चाहती थी।
हिमांशु जोशी
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