यात्रा का पड़ाव स्वील गांव में पहुंचने पर हमें मनमोहन सिंह चौहान मिलते हैं। वह कहते हैं कि हमारा गांव कमल सेराई पट्टी में आता है। पट्टी के बारे में ज्यादा जानकारी देते वह कहते हैं पट्टी से अर्थ है कि सरकारी आंकड़ों में बीस पच्चीस गांव एक पट्टी में आते हैं।
आज स्वील में रुद्रेश्वर महादेव मेला लग रहा है।
यह मेला जून जुलाई में लगता है।
इस साल बजलाड़ी थान से महाराज बाहर निकल कर पश्चिम के कंडाव थान और देवसारी थान के तीस गांवों का भ्रमण करेंगे। मनमोहन ने बताया थान का अर्थ है कि चौदह गांव लगभग एक मंदिर की पूजा करते हैं। रुद्रेश्वर महाराज देवता चार थान के देवता हैं। हर साल देवता का निवास अलग अलग थान में होता है।
इन दो महीनों में महाराज जिस जिस गांव जाएंगे, वहां उस दिन मेला लगेगा। इसमें गांव से बाहर रहे सभी लोग अपने अपने गांव आकर पूजा पाठ करते हैं।
पहली रात को महाराज की पालकी में एक चांदी का बॉक्स रखा जाता है, यह गोलाकार बॉक्स पौराणिक काल से ही देवता के साथ है। पालकी मंदिर में रहती है, जिसमें देवता के साथ रुद्रेश्वर महादेव कमेटी के लोग रहते हैं। अगली सुबह आठ बजे मूर्ति दर्शन हेतु बॉक्स से बाहर निकाल कर देवस्थान (पीड़ा) पर रखी जाती है। लगभग दो ढाई हजार लोग इसके दर्शन करते हैं।
दिन में तीन बजे के लगभग महाराज की मूर्ति फिर बॉक्स में रख दी जाती है और पालकी सजाई जाती है। इसके बाद महाराज जी की पालकी मंदिर के प्रांगड़ में रखकर पूजा की जाती है। फिर दो- दो कर लोग पालकी को कंधे में रखकर ढोल नगाड़ों के साथ पालकी को नचाते हैं।
इसके बाद देवता को नाचते गाते दूसरे गांव के लिए विदा कर दिया जाता है।
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