उत्तराखंड में ऐतिहासिक अस्कोट- आराकोट यात्रा पद्मश्री से सम्मानित डॉक्टर शेखर पाठक के मार्गदर्शन में छठी बार हो रही है। यात्रा से जुड़े यात्रियों ने यमुनोत्री से जुड़ी ऐसी जानकारी साझा की है, जिसे सुनकर हमें अपनी नदियों के रखरखाव के बारे में नए सिरे से सोचना होगा। इसके साथ ही उत्तराखंड के जंगलों में आग की समस्या का समाधान भी जंगलों में ग्रामीणों के अधिकारों से ही होता दिख रहा है।
मनमोहन चिलवाल रिटायर्ड बैंक कर्मी हैं और नैनीताल में रहते हैं. मनमोहन ने इससे पहले दो बार यात्रा में आंशिक तौर पर हिस्सा लिया था लेकिन इस बार वह पहली बार पूरी यात्रा में शामिल हो रहे हैं। यमुनोत्री पहुंचने के लिए उन्होंने दल के अन्य छह सदस्यों के साथ उत्तरकाशी से असी गंगा घाटी, डोडीताल, दरवा टॉप, सीमा बुग्याल, हनुमान चट्टी का रास्ता चुना। अगोड़ा गांव से यमुनोत्री तक यह पैदल रास्ता करीब 51 किलोमीटर है। मनमोहन कहते हैं इसमें उन्होंने 3800 मीटर की अधिकतम ऊंचाई को भी पार किया। सुबह 8 बजे अगोड़ा से शुरू हुआ यह रास्ता बुग्याल का रास्ता था, बुग्याल में ऊंचे नीचे रास्ते होते हैं और यह घास से भरे होते हैं। इनमें विभिन्न प्रकार के फूल भी थे, जैसे पोटेंटिला, स्नेक लिली, ब्रह्म कमल, अतीस, सफेद बुरांश, प्रिमुला आदि थे।
मनमोहन कहते हैं कि इस रास्ते मे हम घने कोहरे की वजह से कई बार भटके और कभी- कभी तो कोहरा इतना घना था कि वह अपने से 20 मीटर की दूरी पर खड़े साथी को भी नही देख पा रहे थे। ढाई घण्टे रास्ता भटकने के बाद उन्होंने सही रास्ता देखा। आगे वह कहते हैं कि अब तेज़ चलते हुए उनका दल रात करीब 9 बजे हनुमान चट्टी पहुंचा। वहां एक ढाबे में रात्रि विश्राम करने के बाद सुबह 8 बजे वह यमुनोत्री के लिए रवाना हुए, करीब 10 बजे यमुनोत्री पहुँचने पर उन्होंने देखा कि बाजार का कचरा नदी में फेंका जा रहा था, साथ ही सफाई कमर्चारी घोड़े की लीद भी नदी में ही झाड़ रहे थे। यही पानी आगे चलकर यमुना की मुख्यधारा में शामिल होता है और कई राज्य यही पानी पीते हैं। अपनी बात आगे बढ़ाते मनमोहन कहते हैं कि साल 1991 में जब वह पहली बार यमुनोत्री गए थे, तब नदी का पानी बहुत साफ था। अब उन्होंने एक नई बात वहां यह देखी कि महिलाओं की साड़ी, धोती भी नदी में प्रभावित की जा रही थी, जिसकी वजह से यमुनोत्री के स्त्रोत पर ही इन कपड़ों का बड़ा ढेर लग गया था।
हर्ष काफर ने कहा जो सक्षम उनके लिए घोड़ा क्यों!
उत्तराखंड में युवाओं के बीच सोशल मीडिया पर खासे लोकप्रिय हर्ष काफर भी इस साल अस्कोट- आराकोट यात्रा में हिस्सा ले रहे हैं। यात्रा में चलते हुए वह अपने अनुभवों को सोशल मीडिया पर साझा भी कर रहे हैं। उन्होंने फेसबुक पर इसी मुद्दे को लेकर पोस्ट करते लिखा-
'यमुनोत्री में नहाने के बाद
अपनी साड़ियाँ चढ़ा देती है नारी
मुझे बस ये जानना है
ये परंपरा कहाँ से शुरू हुई प्यारी।
इस विषय पर हमने पहली बार यह यात्रा कर रहे हर्ष काफर से बातचीत करी, वह कहते हैं कि हनुमानचट्टी से जानकी चट्टी की तरफ जाने के बाद यमुनोत्री का ट्रैक शुरू होता है। वहां खाने की, घोड़ों की लीद की बदबू आ रही थी। आगे बात करते हर्ष कहते हैं कि सिर्फ असहाय लोगों को ही घोड़ा मिलना चाहिए। जानकी चट्टी से यमुनोत्री लगभग 5 से 6 किलोमीटर ही होगा इसलिए जो चल सकते हैं ऐसे सक्षम लोगों के लिए घोड़ा नही चलवाया जाना चाहिए। घोड़ों के अनियंत्रित तरीके से चलने की वजह से पैदल यात्रियों को बड़ा खतरा रहता है। इसके साथ ही साड़ियों को नदी में फेंकने के नए चलन पर भी वह सवाल उठाते हैं।
हरीश पाठक 'पहाड़' प्रकाशन के प्रबन्धक हैं, वह साल 1974 से हर दस साल में होने वाली ऐतिहासिक अस्कोट- आराकोट यात्रा के पचासवें वर्ष में भाग ले रहे हैं। हरीश कहते हैं कि यह उनकी दूसरी अस्कोट- आराकोट यात्रा है। अपनी अब तक की लगभग 1100 किलोमीटर की यात्रा के अनुभव में पड़े यमुनोत्री पड़ाव पर बात करते हरीश कहते हैं कि यमुनोत्री हमारा धार्मिक स्थल है और वहां से यमुना नदी का उद्गम होता है। जब हम सात यात्रियों का दल, मुख्य दल से अलग यात्रा करते वहां पहुंचा तो हमने देखा कि यमुनोत्री बाजार में गंदगी भरी पड़ी है। घोड़े, यात्रियों को कंधे में ले जाते नेपालियों, यात्री वाहनों से बाजार में चलने की जगह नही थी। हरीश कहते हैं कि इसका समाधान घोड़ों के लिए एक अलग स्टैंड बना कर, वहीं से यात्रियों को बैठा कर किया जा सकता है। इसके आगे लगभग छह किलोमीटर दूर तीर्थ स्थान तक पहुंचने के लिए हम नदी के किनारे चलते हैं, तब हम देखते हैं कि उस रास्ते में घोड़ों की वजह से नदी में गिरने और चोट लगने का भय बना रहता है। मैंने घोड़ों को लीद करते देखा और उसको देख मुझे यह समझ नही आया कि इस गंदगी का सही निस्तारण कैसे किया जाता होगा क्योंकि वहां उसके लिए कोई डस्टबिन या उसे अलग से इकट्ठा करने की जगह नही थी। हरीश कहते हैं यमुनोत्री के नजदीक पहुंच कर हमें यमुना में धोती, साड़ियां दिखती हैं और थोड़ा आगे चलते यमुना के हिस्सों में इनका ढेर भी नजर आता है। वहां स्थानीय लोगों से पूछने पर पता चला कि पहले यह कपड़े नदी नही फेंकी जाती थी, कुछ सालों पहले ही इसकी शुरुआत हुई है। हरीश कहते हैं उन कपड़ों को नदी में फेंकना ही है तो यमुनोत्री मंदिर के रखरखाव करने वालों द्वारा इसका निस्तारण किया जाना चाहिए।
जंगलों पर ग्रामीणों के अधिकार से ही बचेंगे जंगल।
48 वर्षीय खेमराज सिंह ज्याड़ा डख्याट गांव में खेतीबाड़ी करते हैं, गांव के जंगल के बारे में बात करते वह कहते हैं कि गांव के जंगल पर पूरा अधिकार ग्रामीणों का ही है। ग्राम वन पंचायत समिति डख्याट समिति का सरपंच होता है, जिसका चुनाव पांच साल में होता है और यह चुनाव प्रशासनिक अधिकारियों की देखरेख में होता है। इस बार जब मई जून और अब भी बड़कोट और आसपास पानी की दिक्कत हुई तो हमारे गांव के चार पानी के स्त्रोत सूखे नही और आस पास के गांव भी यहां से पानी ले गए। पहाड़ की बाकी जगह के लोग इस गर्मी में रजाई छोड़ते गए तो हमारे यहां मौसम इतना ठंडा रहा कि रात में हम रजाई ओढ़ के सोते हैं। खेमराज कहते हैं कि गांव वालों के लिए इस जंगल की लकड़ी, चारा पत्ती काटना मना है। हर पांच साल में वन पंचायत समिति की निगरानी में लकड़ियों की काट छांट की जाती है। जंगल में अगर रात के बारह बजे भी आग लग रही होती है, तो हम उसकी आग बुझाने जाते हैं।
ठडुंग गांव में जंगल देता है पानी तो ग्रामीण करते रहे हैं उसकी सुरक्षा।
जंगल में ग्रामीणों के अधिकारों की महत्वता का अंदाज़ा हम ठडुंग गांव में जाकर जगमोहन सिंह राणा के साथ बातचीत करते भी लगा सकते हैं। जगमोहन कहते हैं कि हमारा गांव लाल धान की खेती के लिए मशहूर है और हमारे यहां पानी का स्रोत ही अच्छी खेती की वजह है। गांव के ठीक ऊपर बांझ के पेड़ों का जंगल है और उसकी हम पूरी तरह से रक्षा करते हैं। गांव में 7-8 लोगों की टीम बनी है जो जंगल में आग लगने पर वन विभाग के साथ आग बुझाने में मदद करती है।
हिमांशु जोशी।
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