पहचान की त्वचा और समाज का आईना: देवीलाल का संघर्ष और 'बीइंग यू डे' के मायने
खुद को स्वीकार करने का दिन, लेकिन क्या समाज तैयार है?
आज 22 जून है. दुनिया भर में इसे 'अंतरराष्ट्रीय बीइंग यू दिवस' (International Being You Day) के रूप में मनाया जाता है. इस दिवस का संदेश सीधा है. आप जैसे हैं, खुद को वैसे ही स्वीकार करें. रंग, रूप, कद, वजन या शरीर की किसी भी विशेषता को शर्म का कारण नहीं, बल्कि अपनी पहचान का हिस्सा समझें.
लेकिन सवाल यह है कि क्या समाज भी लोगों को उनके वास्तविक रूप में स्वीकार करता है?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भी बहुत से लोग अपने शरीर में आए बदलाव की वजह से दूसरों की नजरों, सवालों और टिप्पणियों का सामना करते हैं. चमोली जिले के रामबगढ़ निवासी देवीलाल की कहानी इसी सवाल को हमारे सामने रखती है.
25 साल की उम्र में शुरू हुई एक लंबी लड़ाई
48 वर्षीय देवीलाल चमोली जिले के रामबगढ़ के रहने वाले हैं. उन्हें 25 साल की उम्र में सफेद दाग की समस्या हुई थी. शुरुआत में यह बहुत कम था, लेकिन अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों के प्रभाव में आकर उन्होंने कुछ दवाइयां लीं. इसके बाद दाग कम होने के बजाय बढ़ते चले गए.
देवीलाल बताते हैं कि शुरुआती दिनों में उन्हें काफी आत्मग्लानि होती थी. लोगों से मिलने-जुलने में भी झिझक महसूस होती थी. हालांकि अब उन्होंने इसके साथ जीना सीख लिया है.
वह कहते हैं, कोई मुंह पर इस बारे में बात करता है तो बुरा जरूर लगता है, लेकिन पहले की तरह अब मैं इस बारे में इतना नहीं सोचता.
यह वाक्य सुनने में सामान्य लग सकता है, लेकिन इसके पीछे दो दशक से ज्यादा का अनुभव है. एक ऐसा अनुभव, जिसमें बीमारी से ज्यादा लोगों की नजरों और सवालों का सामना करना पड़ा.
बीमारी नहीं, नजरिया भी एक मुद्दा है
सफेद दाग को लेकर समाज में आज भी कई तरह की गलत धारणाएं मौजूद हैं. कई लोग इसे छूत की बीमारी समझते हैं. कुछ लोग इसे अंधविश्वास से जोड़ देते हैं. ऐसे माहौल में व्यक्ति केवल बीमारी से नहीं, बल्कि समाज की प्रतिक्रिया से भी जूझता है.
देवीलाल की बातों से भी यही सवाल निकलता है. अगर 23 साल बाद भी किसी टिप्पणी से बुरा लगता है, तो क्या समस्या केवल त्वचा तक सीमित है?
इसी सवाल को समझने के लिए हमने एम्स बिलासपुर में मेडिकल सोशल वेलफेयर ऑफिसर रोहित गुप्ता से बात की.
लोग बीमारी से नहीं, लोगों के व्यवहार से ज्यादा प्रभावित होते हैं
रोहित गुप्ता का मानना है कि सफेद दाग जैसी स्थितियों में शारीरिक बदलाव जितना असर नहीं डालते, उससे कहीं ज्यादा असर समाज की प्रतिक्रिया का होता है.
उनके मुताबिक कई लोग समय के साथ अपनी स्थिति को स्वीकार करना सीख लेते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि भीतर की तकलीफ पूरी तरह खत्म हो गई है. कई बार व्यक्ति बार-बार होने वाली टिप्पणियों, सवालों और असहज परिस्थितियों से बचने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार कर लेता है.
किसी के सामने उसकी शारीरिक स्थिति को लेकर टिप्पणी करना या बार-बार सवाल पूछना सामान्य जिज्ञासा लग सकता है, लेकिन सामने वाले व्यक्ति पर उसका असर अलग हो सकता है. ऐसी बातें उसके आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को प्रभावित कर सकती हैं.
रोहित गुप्ता का कहना है कि समाज को यह समझने की जरूरत है कि विटिलिगो या सफेद दाग कोई छूत की बीमारी नहीं है. न ही यह किसी अंधविश्वास या पाप का परिणाम है. यह एक चिकित्सकीय स्थिति है और इसे उसी नजर से देखा जाना चाहिए.
उनका मानना है कि परिवार, दोस्त और समाज यदि सामान्य व्यवहार करें तो ऐसे लोगों के लिए जीवन काफी आसान हो सकता है. कई बार स्वीकार्यता और सम्मान किसी दवा से कम असर नहीं करते.
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