Sunday, July 5, 2026

उत्तराखंड की भाषाओं का बदलता दौर : बोली, पहचान और भाषा पर सुरेश पंत से बातचीत

*उत्तराखंड की भाषाओं पर बढ़ती चेतना, सुरेश पंत ने बताए बोली और भाषा के बीच के मिथक*


उत्तराखंड में कुमाऊँनी और गढ़वाली जैसी भाषाओं को लेकर नई पीढ़ी में रुचि बढ़ रही है. सोशल मीडिया से लेकर साहित्य तक इन भाषाओं में नए प्रयोग हो रहे हैं. भाषाई पहचान, स्थानीय बोलियों के संरक्षण और हिंदी के साथ उनके संबंध पर भी लगातार चर्चा हो रही है. ऐसे समय में भाषाविद सुरेश पंत से हुई बातचीत केवल उनके व्यक्तिगत सफर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उत्तराखंड की भाषाई विरासत, कुमाऊँनी के भाषावैज्ञानिक अध्ययन, भाषा शिक्षण और बोली-भाषा से जुड़े कई प्रचलित सवालों पर भी रोशनी डालती है. हिंदी अकादमी, दिल्ली सहित कई संस्थानों से सम्मानित सुरेश पंत ने देहरादून में हमारे साथ अपने शोध, लेखन, कुमाऊँनी भाषा और हिंदी शिक्षण से जुड़े अनुभव साझा किए.

*कुमाऊँनी में मौलिक शोध की शुरुआत*


सुरेश पंत बताते हैं कि उनकी पहली पुस्तक 'कुमाऊँनी क्रियापदों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन' थी. कुछ वर्षों बाद यही विषय उनका शोध विषय भी बना. यह शोध उन्होंने चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से पीएचडी के लिए किया. बाद में इसी विषय पर उनकी पुस्तक भी प्रकाशित हुई.

उन्होंने कहा कि उस समय देश के प्रमुख हिंदी भाषाविदों ने इस काम को विशेष महत्व दिया. प्रोफेसर जगन्नाथन, प्रोफेसर भाटिया, डॉ. दिलीप और के. के. गोस्वामी जैसे विद्वानों ने इस शोध को हिंदी भाषाविज्ञान में दुर्लभ और मौलिक माना. उनका कहना था कि ऐसा काम हिंदी में भी नहीं हुआ था और कुमाऊँनी में किया जाना इसे और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है.

शोध में कुमाऊँनी और हिंदी क्रियापदों का तुलनात्मक अध्ययन शामिल था. क्रियापदों के वैज्ञानिक वर्गीकरण को लेकर यह काम विशेष रूप से सराहा गया.

*उत्तराखंड की भाषाओं को एक मंच पर लाने की कोशिश*


सुरेश पंत बताते हैं कि भाषा में उनकी रुचि पीएचडी से बहुत पहले की है. वे पर्वतीय भाषाओं में विशेष रुचि रखते थे. इसी कारण उन्होंने 'उत्तरीय' नाम से एक अनियतकालीन लघु पत्रिका शुरू की. यह पत्रिका भाषा विज्ञान पर केंद्रित थी.

उनका उद्देश्य था कि उत्तरीय का एक विशेषांक पर्वतीय भाषाओं पर निकाला जाए. पर्वतीय भाषाओं से उनका आशय उस पूरे क्षेत्र से था, जिसे ग्रियर्सन ने पश्चिमी पहाड़ी, मध्य पहाड़ी और पूर्वी पहाड़ी भाषाओं के रूप में वर्गीकृत किया था. यह क्षेत्र कश्मीर से लेकर नेपाल तक फैला है.

वे बताते हैं कि उन्होंने इस क्षेत्र में काम कर रहे भाषाविदों से लेख मांगे. शुरुआत में उन्हें भरोसा नहीं था कि लोग सहयोग करेंगे, क्योंकि पत्रिका का पाठक वर्ग बहुत सीमित था. लेकिन जिन लोगों से उन्होंने संपर्क किया, उन्हें यह योजना पसंद आई और लगभग सभी ने लेख भेजे.

सुरेश पंत कहते हैं कि उत्तरीय का प्रसार बहुत सीमित था. वे पचास से कुछ अधिक प्रतियां परिचितों को भेजते थे और कुल मिलाकर सौ से भी कम पाठकों तक पत्रिका पहुंचती थी. इसके बावजूद लेखकों ने कभी यह नहीं पूछा कि उसका प्रसार कितना है.

अमेरिका की एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहे अनूप चंदोला, हिमाचल, नेपाली और अन्य पहाड़ी भाषाओं पर काम कर रहे विद्वान तथा मैसूर स्थित केंद्रीय हिंदी संस्थान से जुड़े शोधकर्ताओं ने खुशी-खुशी लेख भेजे. उनके अनुसार यह अनुभव बताता है कि बौद्धिक काम का मूल्य पाठक संख्या से तय नहीं होता.

बातचीत के दौरान उन्होंने एक प्रसंग भी साझा किया. आगरा में पढ़ा रहे एक विद्वान ने विषय पर लिखने से यह कहते हुए मना कर दिया कि हाल ही में उन्होंने एक अपरिचित व्यक्ति के आग्रह पर लंबा लेख लिखा था, जिसका उचित उपयोग नहीं हुआ. इस अनुभव ने उन्हें सिखाया कि शोध और लेखन में भरोसे की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है.

*उपाधि से बड़ा है शोध और व्याकरण को जीवन से जोड़ने की कोशिश*


उत्तरीय में प्रकाशित लेखों को बाद में उन्होंने पुस्तक रूप में प्रकाशित किया. पहाड़ी भाषाओं पर यह उनकी पहली पुस्तक थी. जब उन्होंने इसकी भूमिका अमेरिका में अनूप चंदोला को भेजी तो उन्हें उत्साहवर्धक उत्तर मिला.

उन्हें प्रिय डॉक्टर पंत कहकर संबोधित किया गया. इस पर उन्होंने स्पष्ट किया कि वे उस समय पीएचडी नहीं थे और स्वयं को एक साधारण हिंदी शिक्षक मानते थे. इसके बावजूद उन्हें शोध कार्य जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया गया. बाद में मित्रों और सहकर्मियों के आग्रह पर उन्होंने पीएचडी पूरी की.

उनका कहना है कि उपाधि से अधिक महत्व काम की ईमानदारी का है. हालांकि शैक्षणिक दुनिया में उपाधि की भूमिका को पूरी तरह नकारा भी नहीं जा सकता.

सुरेश पंत स्वीकार करते हैं कि छात्र जीवन में उन्हें भी व्याकरण रोचक नहीं लगता था. कारण यह था कि व्याकरण को शास्त्रीय और रटंत पद्धति से पढ़ाया जाता था. संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया केवल परिभाषाओं तक सीमित रह जाते थे.

यहीं से उन्हें यह समझ आई कि व्याकरण को जीवन से जोड़ना होगा. उन्होंने व्याकरण को खेल, उदाहरण, चुटकुलों और दैनिक जीवन के अनुभवों के जरिए पढ़ाने की कोशिश की. यही दृष्टि उनकी पुस्तकों और लेखन में दिखाई देती है. सोशल मीडिया पर भी वे इसी तरह के प्रयोग करते हैं.

उनका मानना है कि भाषा और व्याकरण का संबंध भी इसी तरह समझा जाना चाहिए. वे कहते हैं कि भाषा आगे-आगे चलती है और व्याकरण उसके पीछे. उनके अनुसार शब्दों की पहली प्रयोगशाला समाज होता है. समाज में शब्द पहले प्रयोग से स्थिर होते हैं फिर बाद में व्याकरण उनके नियमों को पहचानता है और शब्दकोश उनके अर्थों को व्यवस्थित करता है.

*देशभर के हिंदी शिक्षकों के साथ अनुभव*


सुरेश पंत बताते हैं कि उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी शिक्षकों के प्रशिक्षण का अवसर मिला. वे एनसीईआरटी, इग्नू, नवोदय विद्यालय और केंद्रीय विद्यालय संगठन जैसे संस्थानों से जुड़े. उन्होंने देश के लगभग सभी राज्यों में कार्यशालाएं कीं.

उनका मानना है कि उत्तर भारत में जहां हिंदी मातृभाषा के रूप में पढ़ाई जाती है, वहीं दक्षिण भारत और कई अन्य क्षेत्रों में यह दूसरी या तीसरी भाषा है. ऐसे में पढ़ाने की चुनौतियां भी बदल जाती हैं. शिक्षक तभी प्रभावी बनता है, जब वह बच्चों के अनुभवों से जुड़ता है.

*बोली और भाषा के बीच कोई मौलिक अंतर नहीं*


सुरेश पंत कहते हैं कि एक समय था जब पहाड़ी बोलना हीनता से जोड़ा जाता था. पहाड़ से बाहर आए लोगों में यह धारणा बन गई थी कि हिंदी या अंग्रेजी बोलने से अधिक प्रतिष्ठा मिलेगी. वे इसे केवल उत्तराखंड की समस्या नहीं मानते.

उनके अनुसार आज हिंदी भाषी समाज में भी अंग्रेजी को श्रेष्ठ और हिंदी को कमतर समझने की प्रवृत्ति दिखाई देती है.

वे स्पष्ट कहते हैं कि बोली और भाषा के बीच कोई मौलिक अंतर नहीं है. जो बोली जाती है, वही भाषा है. ब्रज, अवधी और खड़ी बोली भी कभी बोलियां थीं. अंग्रेजी भी एक समय बोली ही थी.

*कुमाऊँनी नाम की कहानी*


वे कुमाऊँनी नाम की उत्पत्ति पर भी विस्तार से बात करते हैं. कुर्मांचल जैसी पुराणिक व्याख्याओं पर सवाल उठाते हुए वे कहते हैं कि संस्कृत कभी जनभाषा नहीं रही. इसलिए हर स्थान या नाम को संस्कृत से जोड़ना उचित नहीं है.

उनके अनुसार मूल नाम कुमूँ (कुमों) था. इससे कुमाओं बना और अंग्रेजी लिप्यंतरण के कारण कुमाऊन और कुमाऊनी शब्द प्रचलन में आए. अंग्रेजी में अनुनासिक ध्वनियों के लिए अलग संकेत न होने के कारण यह परिवर्तन हुआ.

सुरेश पंत मानते हैं कि आज उत्तराखंड में भाषा को लेकर चेतना पहले की तुलना में बढ़ी है. कुमाऊँनी और गढ़वाली में कविता, कहानी, नाटक और व्यंग्य लगातार लिखे जा रहे हैं. नई संस्थाएं बन रही हैं और भाषाओं को लेकर संवाद भी बढ़ रहा है.

डिजिटल दौर में भाषा की बदलती चुनौतियों पर बात करते हुए वे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीनी अनुवाद का भी जिक्र करते हैं. उनके अनुसार एआई ने कई काम आसान किए हैं, लेकिन भाषा के भाव, संदर्भ और अर्थ की सूक्ष्म परतों को समझना अभी भी मशीनों के लिए आसान नहीं है. उन्होंने कहा कि शब्द केवल बोले नहीं जाते, वे अनुभव भी किए जाते हैं. इसलिए लेखक, पत्रकार और अनुवादक के लिए शब्दों के सही अर्थ और संदर्भ को समझना पहले से अधिक जरूरी हो गया है.

उनके अनुसार भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान और स्मृति का आधार भी है. जब तक समाज अपनी भाषा को सम्मान नहीं देगा, तब तक उसकी सांस्कृतिक जड़ें भी पूरी तरह मजबूत नहीं हो पाएंगी.

सुरेश पंत की हाल के वर्षों में प्रकाशित पुस्तकों में 'शब्दों के साथ साथ' (भाग 1), 'शब्दों के साथ साथ' (भाग 2) और 'भाषा के बहाने' शामिल हैं. उनकी नई पुस्तक 'साधो शब्द विचारो' भी प्रकाशित हो गई है. इसके अलावा शैक्षिक व्याकरण पर उनकी कई पुस्तकें विद्यालयों में पढ़ाई जा रही हैं. उन्होंने 'भाषा के बहाने' नाम से एक यूट्यूब चैनल भी शुरू किया था. समय की कमी के बावजूद बड़ी संख्या में लोग आज भी उससे जुड़े हुए हैं.

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