*नैनीताल में सख्ती, बद्रीनाथ में अनदेखी... क्या फिर से तबाही को न्योता दे रहा उत्तराखंड?*
नैनीताल में नए निर्माण को लेकर वर्षों से सख्त नियम और प्रतिबंध लागू हैं. वहीं दूसरी ओर बद्रीनाथ धाम में तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या के बीच सड़क, होटल और अन्य आधारभूत ढांचे का विस्तार लगातार जारी है. ऐसे में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है. वर्ष 2025 में RESO Research Sociology Review में प्रकाशित शोधपत्र "Addressing the Environmental Crisis in Uttarakhand: A Sociological and Ecological Analysis" बद्रीनाथ, केदारनाथ, जलविद्युत परियोजनाओं, जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण और उत्तराखंड के समग्र पर्यावरणीय संकट का समाजशास्त्रीय और पारिस्थितिक दोनों दृष्टिकोणों से विश्लेषण करता है. सुरेंद्र कुमार, लुइस अल्बर्टो फ्लोरेस हर्नांडेज़ व अन्य द्वारा लिखे गए इस अध्ययन का निष्कर्ष है कि राज्य का पर्यावरणीय संकट सिर्फ जलवायु परिवर्तन का परिणाम नहीं है. विकास नीतियां, जलविद्युत परियोजनाएं, अनियंत्रित पर्यटन, तेज शहरीकरण और प्रशासनिक कमियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं.
*बद्रीनाथ और केदारनाथ में बढ़ते दबाव की तस्वीर*
अध्ययन के मुताबिक उत्तराखंड पिछले दो दशकों में तेजी से बुनियादी ढांचे के विस्तार का गवाह बना है. जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण, शहरी विस्तार के लिए वनों की कटाई और अनियंत्रित पर्यटन ने पर्यावरणीय क्षरण को तेज किया है. शोधपत्र के अनुसार बद्रीनाथ और केदारनाथ जैसे तीर्थस्थलों में तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या के साथ सड़क, होटल और अन्य आधारभूत ढांचे का विस्तार हुआ है. इसके परिणामस्वरूप अव्यवस्थित निर्माण, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन और प्रदूषण बढ़ा है. पिछले दो दशकों में आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता भी बढ़ी है, जिससे बड़े पैमाने पर विस्थापन, आजीविका का नुकसान और जैव विविधता को क्षति पहुंची है. अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के साथ विकास नीतियां और शासन संबंधी कमियां भी इस संकट को बढ़ा रही हैं.
*केदारनाथ से जोशीमठ तक, किन उदाहरणों से रखी गई बात*
अध्ययन अपने निष्कर्षों को 2013 की केदारनाथ आपदा, 2023 के जोशीमठ भूधंसाव और अलकनंदा तथा भागीरथी बेसिन की जलविद्युत परियोजनाओं के विश्लेषण के आधार पर प्रस्तुत करता है. शोधपत्र के मुताबिक हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत से अधिक तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, वर्षा का स्वरूप बदल रहा है और चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं. अध्ययन में गंगोत्री ग्लेशियर के लगातार पीछे हटने, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के बढ़ते खतरे और जैव विविधता पर पड़ रहे प्रभावों का भी जिक्र किया गया है. टिहरी बांध के उदाहरण के माध्यम से शोधकर्ताओं ने बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के नदी तंत्र, जलीय जीवन और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा की है. वहीं 2021 की चमोली आपदा के संदर्भ में शोधपत्र में कहा गया है कि इस आपदा को वैज्ञानिकों ने अनियंत्रित जलविद्युत विकास और अत्यधिक सुरंग निर्माण से पर्वतीय ढलानों के कमजोर होने से जोड़ा है. शोधपत्र यह भी बताता है कि पर्यावरणीय संकट का असर केवल प्रकृति तक सीमित नहीं है. इससे विस्थापन, आजीविका का संकट, महिलाओं पर बढ़ता बोझ और सांस्कृतिक तथा धार्मिक परिदृश्य में बदलाव जैसी सामाजिक चुनौतियां भी सामने आ रही हैं.
*पर्यटन पर वहन क्षमता आधारित प्रबंधन लागू हो*
शोधपत्र उत्तराखंड के लिए ऐसे विकास मॉडल की सिफारिश करता है जो पर्यावरणीय स्थिरता और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन स्थापित कर सके. इसमें जोशीमठ, केदारनाथ और चमोली जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में इको-सेंसिटिव जोन के अनुरूप निर्माण नियंत्रण, भूकंपरोधी और पर्यावरण अनुकूल भवनों को बढ़ावा देने के साथ तीर्थ और ईको-पर्यटन स्थलों के लिए वहन क्षमता आधारित प्रबंधन लागू करने की बात कही गई है. अध्ययन में बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले उनके समग्र पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करने की सिफारिश की गई है. बड़े बांधों के बजाय रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं को बढ़ावा देने की बात कही गई है. साथ ही सौर और पवन ऊर्जा जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है. शोधपत्र ग्राम सभाओं की भागीदारी बढ़ाने, नौले और धारों जैसी पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को संरक्षित करने तथा बाढ़, ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) और भूस्खलन जैसी आपदाओं के लिए पूर्व चेतावनी प्रणाली मजबूत करने की भी सिफारिश करता है. शोधकर्ताओं का मानना है कि उत्तराखंड जैसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील राज्य में विकास का आकलन आर्थिक लाभ के आधार पर ही नहीं होना चाहिए. उसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को भी बराबर महत्व दिया जाना चाहिए.
*स्पष्ट और वैज्ञानिक विकास मॉडल कहीं दिखाई नहीं देता*
उत्तराखंड में वैज्ञानिक विकास मॉडल पर काम होने के सवाल पर हल्द्वानी में रहने वाले भूगोल के प्रोफेसर बी. आर. पंत मानते हैं कि उत्तराखंड में अभी तक स्पष्ट और वैज्ञानिक विकास मॉडल दिखाई नहीं देता. उनके अनुसार भवन निर्माण और सड़क निर्माण के दौरान स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों और वैज्ञानिक मानकों का पर्याप्त पालन नहीं किया जाता. प्रो. पंत कहते हैं कि पिछले वर्ष माणा क्षेत्र में आया हिमस्खलन और वर्ष 1970 की अलकनंदा बाढ़ जैसी घटनाएं याद दिलाती हैं कि हिमालय की संवेदनशीलता को नजरअंदाज करने की कीमत कितनी भारी पड़ सकती है. उनका कहना है कि हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास परियोजनाओं की योजना वैज्ञानिक अध्ययन और क्षेत्र की पारिस्थितिक वहन क्षमता को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए.
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