Saturday, July 11, 2026

पहाड़ ने बारिश को रोकना सीख लिया. अब सूखे नौलों में फिर लौट रहा है पानी

पहाड़ ने बारिश को रोकना सीख लिया. अब सूखे नौलों में फिर लौट रहा है पानी

उत्तराखंड में मोहन चंद्र कांडपाल की पहल ने जल संरक्षण को जन आंदोलन का रूप दिया. हजारों खाव, पुनर्जीवित जल स्रोत और बदलती रिस्कन नदी बता रही है कि बारिश की हर बूंद भविष्य का पानी बन सकती है.

उत्तराखंड की पहचान हिमालय, नदियों और प्राकृतिक जल स्रोतों से जुड़ी रही है. गंगा और यमुना जैसी नदियों का उद्गम इसी राज्य में है, फिर भी पहाड़ के हजारों गांव हर गर्मी में पानी की कमी झेलते हैं. कई नौले और धारे, जो कभी पूरे साल बहते थे, अब गर्मियों में सूख जाते हैं. महिलाओं को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और खेती भी इससे प्रभावित होती है. बदलती जलवायु, अनियमित वर्षा, जंगलों की बदलती बनावट और जमीन में घटते भूजल ने इस संकट को और गहरा किया है. इसी बीच उत्तराखंड के कुछ गांवों से एक ऐसी पहल सामने आई, जिसने पानी को देखने का नजरिया बदल दिया. इस पहल का नाम है "पानी बोओ, पानी उगाओ". सुनने में यह एक नारा लगता है, लेकिन पहाड़ के लोगों के लिए यह भविष्य बचाने का तरीका बन चुका है.

जहां बारिश बहती थी, वहीं उसे रोकने की शुरुआत हुई

करीब दो दशक पहले पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षक मोहन चंद्र कांडपाल उत्तराखंड के गांवों में लगातार सूखते जल स्रोतों को लेकर चिंतित थे. गांवों में पानी की समस्या पर बातचीत के दौरान एक बुजुर्ग महिला ने उनसे कहा कि "जब पानी बोओगे नहीं तो उगेगा कहां से." यही बात उनके मन में घर कर गई. उन्होंने समझना शुरू किया कि आखिर पहाड़ का पानी गायब कहां हो रहा है.

जवाब पहाड़ की ढलानों में छिपा था. पहले बारिश का पानी खेतों, जंगलों और घास के मैदानों में रुकता था. धीरे धीरे वह मिट्टी के भीतर उतरता और महीनों बाद नौलों तथा धारों के रूप में बाहर निकलता था. समय के साथ खेती कम हुई, जंगलों की प्रकृति बदली और बारिश का पानी सीधे ढलानों से बहकर नदियों में जाने लगा. जमीन के भीतर पहुंचने वाला पानी लगातार घटता गया.

मोहन चंद्र कांडपाल ने इसी समस्या का समाधान खोजने की कोशिश शुरू की. उन्होंने गांव वालों से कहा कि अगर बारिश की हर बूंद को कुछ देर के लिए भी पहाड़ पर रोक लिया जाए तो वही पानी भविष्य में जल स्रोत बनकर लौट सकता है. इसी सोच के साथ "पानी बोओ, पानी उगाओ" अभियान शुरू हुआ. शुरुआत कुछ गांवों से हुई, लेकिन धीरे धीरे यह अल्मोड़ा, बागेश्वर और आसपास के इलाकों तक फैलने लगा.

इस अभियान की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें लोगों को किसी बड़ी परियोजना का इंतजार नहीं करना पड़ा. गांव के लोग खुद कुदाल और फावड़ा लेकर निकल पड़े. उन्होंने बारिश के पानी को रोकने के लिए पहाड़ियों पर छोटे छोटे गड्ढे बनाने शुरू किए. उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यही छोटे प्रयास आगे चलकर सूखते जल स्रोतों को फिर से जीवन देने की एक बड़ी कहानी बन जाएंगे.


खाव, चाल खाल और बांज के जंगल. पहाड़ ने अपने पुराने गुर फिर याद किए

"पानी बोओ, पानी उगाओ" सुनने में जितना सरल लगता है, इसके पीछे उतनी ही गहरी वैज्ञानिक समझ है. पहाड़ में बारिश की कमी हमेशा सबसे बड़ी समस्या नहीं रही. बड़ी समस्या यह रही कि बारिश का पानी जमीन में उतरने के बजाय तेजी से ढलानों से बहकर नदियों में चला जाता है. कुछ घंटों की बारिश के बाद पहाड़ सूखने लगता है, क्योंकि पानी को मिट्टी के भीतर पहुंचने का मौका ही नहीं मिलता. इस अभियान ने इसी कड़ी को बदलने की कोशिश की.

अभियान के तहत सबसे पहले पहाड़ियों पर खाव बनाए गए. खाव ऐसे छोटे गड्ढे हैं, जो वर्षा जल को कुछ समय के लिए रोक लेते हैं. इनके साथ समोच्च रेखाओं के अनुसार लंबी खंतियां भी खोदी जाती हैं. बारिश का पानी इनमें भरता है और धीरे धीरे मिट्टी में समा जाता है. इससे एक तरफ मिट्टी का कटाव कम होता है तो दूसरी तरफ भूजल का भंडार बढ़ने लगता है. यह तरीका किसी बड़ी मशीन या महंगी तकनीक पर नहीं, बल्कि पहाड़ की भौगोलिक बनावट को समझने पर आधारित है.

इसी के साथ पुराने चाल खाल भी फिर चर्चा में आए. कभी उत्तराखंड के गांवों में ऊंचाई वाले स्थानों पर छोटे तालाब बनाए जाते थे, जिनमें बरसात का पानी जमा रहता था. इनका उपयोग सिर्फ पानी संग्रह के लिए नहीं, बल्कि जमीन को लगातार नमी देने के लिए भी होता था. समय के साथ इनकी देखभाल कम होती गई और कई चाल खाल मिट्टी से भर गए. इस अभियान में उनकी सफाई की गई, नई चाल खाल बनाई गईं और उन्हें फिर से जल संरक्षण का हिस्सा बनाया गया.

मोहन चंद्र कांडपाल का मानना है कि जल संरक्षण की बात जंगलों के बिना पूरी नहीं हो सकती. इसलिए अभियान में बांज और दूसरी चौड़ी पत्ती वाली स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाने पर विशेष जोर दिया गया. पहाड़ के लोग लंबे समय से कहते आए हैं कि जहां बांज का जंगल होगा, वहां पानी भी होगा. इसकी वजह यह है कि बांज की जड़ें मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद करती हैं और जंगल की पत्तियां प्राकृतिक स्पंज की तरह वर्षा जल को धीरे धीरे जमीन में पहुंचाती हैं. इसके विपरीत चीड़ के जंगलों में पानी जल्दी बह जाता है और जमीन अपेक्षाकृत जल्दी सूख जाती है.

कई स्थानों पर बरसाती गधेरों में स्थानीय पत्थरों से छोटे अवरोध भी बनाए गए, ताकि पानी का वेग कम हो और वह कुछ देर रुककर जमीन में समा सके. इन सभी उपायों का उद्देश्य एक ही था. बारिश की हर बूंद को जितना संभव हो सके, पहाड़ के भीतर उतारना. यही पानी कुछ महीनों बाद किसी नौले, धारे या छोटी नदी के रूप में फिर दिखाई देता है.



सरकार नहीं, गांव आगे आए. पानी बचाना बना सामाजिक संस्कार

किसी भी पर्यावरणीय पहल की असली परीक्षा तब होती है, जब वह सरकारी योजना से आगे बढ़कर लोगों की अपनी जिम्मेदारी बन जाए. "पानी बोओ, पानी उगाओ" अभियान के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. शुरुआत में यह मोहन चंद्र कांडपाल और उनके साथियों का प्रयास था, लेकिन धीरे धीरे गांवों ने इसे अपना अभियान बना लिया. लोगों ने महसूस किया कि अगर जल स्रोत बचाने हैं तो इंतजार किसी योजना का नहीं, बल्कि खुद पहल करने का है.

इस मुहिम में सबसे बड़ी भूमिका गांवों के सामूहिक श्रमदान ने निभाई. छुट्टी के दिन लोग फावड़ा और कुदाल लेकर जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं. कोई खाव खोदता है, कोई चाल खाल की सफाई करता है, तो कोई पौधे लगाने का काम करता है. कई गांवों में महिला मंगल दलों ने इसकी जिम्मेदारी अपने हाथ में ली. महिलाओं ने न सिर्फ श्रमदान किया, बल्कि लोगों को जल संरक्षण के लिए प्रेरित भी किया. स्कूलों के बच्चे भी नियमित रूप से इन अभियानों में शामिल होने लगे. उनके लिए यह किताबों का विषय नहीं, बल्कि अपने गांव का भविष्य बचाने का काम बन गया.

इस पहल की एक अनोखी बात यह भी है कि जल संरक्षण को लोगों ने अपने सामाजिक जीवन का हिस्सा बना लिया. कई गांवों में बच्चे के जन्म, जन्मदिन, शादी, नई नौकरी या किसी प्रियजन की स्मृति में पौधे लगाए जाते हैं और खाव खोदे जाते हैं. पहले लोग इन अवसरों पर सिर्फ पौधारोपण करते थे, अब उसके साथ वर्षा जल संरक्षण के काम भी जुड़ने लगे हैं. इससे पर्यावरण संरक्षण किसी औपचारिक कार्यक्रम की जगह एक सामाजिक परंपरा का रूप लेने लगा है.

अभियान को आगे बढ़ाने में आर्थिक सहयोग भी गांवों से ही आया. किसी ने पौधे उपलब्ध कराए, किसी ने औजार दिए, किसी ने भोजन की व्यवस्था की और किसी ने श्रमदान किया. छोटे छोटे सहयोग मिलकर बड़े काम में बदलते गए. यही वजह है कि इस अभियान की पहचान किसी सरकारी परियोजना से ज्यादा एक जन आंदोलन के रूप में बनी.

मोहन चंद्र कांडपाल अक्सर कहते हैं कि पानी का संकट किसी एक विभाग का विषय नहीं है. यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है. शायद यही सोच इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत भी है. जब गांव के लोग खुद अपने जंगल, अपने जल स्रोत और अपनी पहाड़ियों की जिम्मेदारी लेने लगते हैं, तब जल संरक्षण एक परियोजना नहीं, बल्कि जीवन शैली बन जाता है.


सूखे नौलों से बहती धारा तक. जब पहाड़ ने खुद अपने बदलाव को देखा

किसी भी अभियान की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना उसके धरातल पर दिखाई देने वाले परिणाम होते हैं. "पानी बोओ, पानी उगाओ" अभियान की चर्चा भी इसलिए बढ़ी, क्योंकि इसका असर धीरे धीरे गांवों के जल स्रोतों में दिखाई देने लगा. जिन इलाकों में वर्षों से नौलों का जलस्तर घट रहा था, वहां पानी फिर लौटने लगा. कई सूखे धारे दोबारा बहने लगे और ग्रामीणों को इसका सबसे पहला लाभ अपने रोजमर्रा के जीवन में महसूस हुआ.

इस पहल की सबसे अधिक चर्चा रिस्कन नदी के पुनर्जीवन को लेकर हुई. अल्मोड़ा और बागेश्वर के बीच बहने वाली इस नदी का प्रवाह वर्षों में कमजोर पड़ता गया था. गर्मियों के दौरान कई हिस्सों में पानी बेहद कम रह जाता था. अभियान के तहत नदी के पूरे जलागम क्षेत्र में हजारों खाव बनाए गए, चाल खालों का पुनरुद्धार किया गया और बांज सहित स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाए गए. बारिश का पानी पहले की तुलना में अधिक मात्रा में जमीन में उतरने लगा. इसका असर धीरे धीरे नदी के प्रवाह पर भी दिखाई देने लगा. इसी काम ने राष्ट्रीय स्तर पर भी इस पहल की ओर ध्यान खींचा.

जल स्रोतों के लौटने का असर खेती पर भी पड़ा. जिन खेतों में सिंचाई की समस्या के कारण खेती छोड़ दी गई थी, वहां फिर खेती शुरू होने लगी. कई किसानों ने पारंपरिक फसलों के साथ सब्जियां और बागवानी अपनाई. इससे ग्रामीणों की आय बढ़ाने के नए अवसर भी बने. जिन गांवों में महिलाओं को पहले कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता था, वहां उनकी यह दूरी कम हुई. पशुपालन करने वाले परिवारों को भी राहत मिली, क्योंकि पानी की उपलब्धता बढ़ने से पशुओं के लिए भी संकट कुछ कम हुआ.

इस अभियान ने पलायन के सवाल को भी नए नजरिए से देखने का अवसर दिया. पहाड़ से होने वाला पलायन सिर्फ रोजगार का विषय नहीं है. पानी, खेती और बुनियादी सुविधाएं भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं. जिन गांवों में पानी की स्थिति बेहतर हुई, वहां लोगों का अपनी जमीन से जुड़ाव भी मजबूत हुआ. स्थानीय लोग मानते हैं कि अगर गांव में पानी रहेगा तो खेती बचेगी, जंगल बचेंगे और गांव में रहने की वजह भी बनी रहेगी.

आज "पानी बोओ, पानी उगाओ" उत्तराखंड के कुछ गांवों तक सीमित पहल नहीं रह गई है. जल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले कई विशेषज्ञ इसे हिमालयी क्षेत्रों के लिए एक प्रभावी सामुदायिक मॉडल मानते हैं. यह अभियान दिखाता है कि छोटे छोटे स्थानीय प्रयास मिलकर बड़े बदलाव ला सकते हैं. पहाड़ की ढलानों पर खोदे गए वे छोटे खाव सिर्फ वर्षा जल नहीं रोकते, वे उस भरोसे को भी संभालकर रखते हैं कि प्रकृति के साथ मिलकर काम किया जाए तो सूखते जल स्रोतों में भी फिर से जीवन लौट सकता है.



बदलते हिमालय में क्यों बढ़ रही है इस मॉडल की अहमियत

हिमालय उन क्षेत्रों में है जहां जलवायु परिवर्तन का असर सबसे तेजी से महसूस किया जा रहा है. वैज्ञानिक अध्ययन लगातार बता रहे हैं कि बारिश का स्वरूप बदल रहा है. पहले जहां कई दिनों तक हल्की बारिश होती थी, वहीं अब कम समय में बहुत अधिक वर्षा हो रही है. इससे पानी का बड़ा हिस्सा ढलानों से बहकर नदियों में चला जाता है. भूजल का पुनर्भरण कम होता है और गर्मियों में जल स्रोत तेजी से कमजोर पड़ने लगते हैं. ऐसे हालात में वर्षा जल को रोकने और जमीन के भीतर पहुंचाने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है.

इसी वजह से "पानी बोओ, पानी उगाओ" को सिर्फ एक स्थानीय अभियान नहीं माना जा रहा. जल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञ इसे हिमालयी क्षेत्रों के लिए सामुदायिक भागीदारी का प्रभावी मॉडल मानते हैं. इसकी खासियत यह है कि इसमें बड़े बांध, भारी मशीनें या करोड़ों रुपये की परियोजनाएं नहीं हैं. गांव के लोग अपनी जरूरत, अपने श्रम और अपने अनुभव के आधार पर जल संरक्षण की संरचनाएं तैयार करते हैं. यही कारण है कि यह पहल लंबे समय तक टिकाऊ भी मानी जाती है.

इस अभियान ने एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने रखा है. क्या जल संकट का समाधान सिर्फ नई पेयजल योजनाएं और पाइपलाइनें हैं, या फिर उन जल स्रोतों को बचाना भी उतना ही जरूरी है जहां से पानी पैदा होता है. पहाड़ के गांवों में रहने वाले लोग जानते हैं कि अगर जंगल स्वस्थ रहेंगे, बारिश की बूंदें जमीन में उतरेंगी और जलागम क्षेत्र सुरक्षित रहेगा तो नौले, धारे और छोटी नदियां भी जीवित रहेंगी. इस सोच ने लोगों का ध्यान पानी के उपयोग से आगे बढ़ाकर उसके संरक्षण की ओर भी खींचा है.

आज उत्तराखंड के कई हिस्सों में यह अभियान स्कूलों, स्वयंसेवी संगठनों और स्थानीय समुदायों के सहयोग से आगे बढ़ रहा है. कई जगह लोग अपने गांव के सूखते जल स्रोतों का नक्शा तैयार कर रहे हैं, उनके जलागम क्षेत्र की पहचान कर रहे हैं और वहां श्रमदान के जरिए खाव, चाल खाल और पौधारोपण का काम कर रहे हैं. यह प्रक्रिया धीमी जरूर है, लेकिन इसके परिणाम वर्षों तक दिखाई दे सकते हैं.

अल्मोड़ा की उस पहाड़ी पर शाम उतरने लगी है, जहां सुबह से लोग खाव खोद रहे थे. बच्चे अब भी मिट्टी समतल कर रहे हैं. कुछ महिलाएं बांज के पौधों को पानी दे रही हैं. सामने बादल घिरने लगे हैं. गांव के एक बुजुर्ग मुस्कुराते हुए कहते हैं, "बारिश तो हर साल होती है, फर्क इस बात से पड़ता है कि हम उसे रोक पाते हैं या नहीं." पहाड़ में "पानी बोओ, पानी उगाओ" शायद इसी सोच का दूसरा नाम है.






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