*नैनीताल को मिला 'Extreme' क्लाइमेट स्कोर, लेकिन कितना भरोसेमंद है यह दावा? विशेषज्ञों से समझिए सच्चाई*
नैनीताल जलवायु परिवर्तन के लिहाज से अब 'एक्सट्रीम' श्रेणी में पहुंच चुका है. AQI.in नाम के एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने अपने City-Level Climate Change Severity Analysis में नैनीताल को 100 में से 81 अंक देते हुए Extreme श्रेणी में रखा है. वेबसाइट के अनुसार पिछले 16 वर्षों में नैनीताल का Climate Change Severity Score 41.3 प्रतिशत worsening दर्ज किया गया है. वेबसाइट के विश्लेषण में तापमान, वर्षा, आर्द्रता, हवा की गति, PM₂.₅ और अन्य पर्यावरणीय संकेतकों से जुड़े बदलाव भी दिखाए गए हैं.
इस नए इंडेक्स की उपयोगिता और इसके निष्कर्षों को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी जलवायु सूचकांक को स्वीकार करने से पहले उसकी कार्यप्रणाली, डेटा स्रोत और वैज्ञानिक सत्यापन को समझना जरूरी है.
*क्या है AQI.in?*
AQI.in खुद को एक ओपन-सोर्स एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म बताता है. वेबसाइट के अनुसार इसे इस उद्देश्य से बनाया गया है कि लोग यह जान सकें कि वे जिस हवा में सांस ले रहे हैं, उसकी गुणवत्ता कैसी है. प्लेटफॉर्म अलग-अलग स्थानों की रियल टाइम वायु गुणवत्ता की जानकारी उपलब्ध कराता है. वेबसाइट का कहना है कि वह वायु गुणवत्ता के आंकड़ों के साथ लोगों को वायु प्रदूषण से बचाव के उपाय और स्वास्थ्य संबंधी सुझाव भी उपलब्ध कराती है.
वेबसाइट के "About Us" पेज के मुताबिक AQI.in, Prana Air Pvt. Ltd. के अंतर्गत संचालित होता है. कंपनी का कहना है कि उसका उद्देश्य लोगों को वायु गुणवत्ता से जुड़ी जानकारी और समाधान उपलब्ध कराना है. इसके अलावा कंपनी एयर क्वालिटी मॉनिटर, एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम और वायु गुणवत्ता से जुड़े अन्य उत्पाद एवं समाधान भी विकसित करती है.
*नैनीताल के बारे में वेबसाइट के चौंकाने वाले आंकड़े*
AQI.in के Climate Change Severity Analysis के अनुसार नैनीताल का Climate Change Severity Score 81/100 है, जिसे Extreme श्रेणी में रखा गया है. वेबसाइट के मुताबिक पिछले 16 वर्षों के उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह स्कोर तैयार किया गया है. वेबसाइट में नैनीताल के तापमान में 5.27 डिग्री सेल्सियस का परिवर्तन, वर्षा, PM₂.₅, आर्द्रता, हवा की गति और अन्य पर्यावरणीय संकेतकों से जुड़े बदलाव भी प्रदर्शित किए गए हैं.
*विशेषज्ञ क्या कहते हैं?*
बरेली कॉलेज, बरेली के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. जसपाल सिंह कहते हैं कि AQI.in का Climate Change Severity Score जलवायु परिवर्तन का एक उपयोगी संकेतक हो सकता है, लेकिन इसे आधिकारिक या मानक वैज्ञानिक सूचकांक नहीं माना जा सकता. इसे IPCC, IMD या WMO जैसी संस्थाओं ने आधिकारिक जलवायु परिवर्तन सूचकांक के रूप में स्वीकार नहीं किया है.
उनका कहना है कि वेबसाइट अपनी कार्यप्रणाली का विवरण देती है, लेकिन अलग-अलग संकेतकों को कितना भार (Weight) दिया गया और इस पद्धति का स्वतंत्र वैज्ञानिक सत्यापन किसी समीक्षित (Peer-reviewed) वैज्ञानिक प्रकाशन में उपलब्ध है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है.
डॉ. सिंह बताते हैं कि वेबसाइट के विश्लेषण में PM₂.₅ यानी वायु प्रदूषण को भी शामिल किया गया है. वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन एक-दूसरे से जुड़े जरूर हैं, फिर भी ये एक जैसी चीज नहीं हैं. किसी शहर का AQI खराब होने का अर्थ यह नहीं कि वहां जलवायु परिवर्तन भी उसी अनुपात में गंभीर है.
वे कहते हैं कि यदि वेबसाइट में दिखाया गया 5.27 डिग्री सेल्सियस का तापमान परिवर्तन औसत वार्षिक तापमान में वृद्धि को दर्शाता है, तो यह असाधारण होगा. भारत के उपलब्ध दीर्घकालिक जलवायु आकलनों में इस स्तर की वृद्धि नहीं दिखाई गई है. IMD के अध्ययन तापमान और हीटवेव के बढ़ते रुझान की पुष्टि करते हैं पर किसी पर्वतीय शहर के औसत तापमान में 16 वर्षों के भीतर 5 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि का समर्थन नहीं करते.
उनके अनुसार किसी शहर में जलवायु परिवर्तन का वैज्ञानिक आकलन करने के लिए सामान्यतः 30 वर्ष या उससे अधिक के तापमान, वर्षा के रिकॉर्ड, हीटवेव एवं अन्य चरम मौसमीय घटनाओं, भूमि उपयोग और वनस्पति में बदलाव, जल संसाधनों की स्थिति तथा IMD, WMO, IPCC, ERA5 और CRU जैसे विश्वसनीय स्रोतों के दीर्घकालिक आंकड़ों का उपयोग किया जाता है.
उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के वानिकी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग की प्रोफेसर डॉ. खष्टि डसीला भी मानती हैं कि ऐसे किसी भी जलवायु सूचकांक पर भरोसा करने से पहले उसकी कार्यप्रणाली को समझना जरूरी है.
डॉ. डसीला कहती हैं कि किसी भी आंकड़े या इंडेक्स पर भरोसा करने से पहले यह देखना जरूरी है कि आंकड़े किस स्रोत से लिए गए हैं, कितने वर्षों के हैं और उनका विश्लेषण किस वैज्ञानिक पद्धति से किया गया है. किसी भी निष्कर्ष की विश्वसनीयता उसकी कार्यप्रणाली पर निर्भर करती है.
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