इस किताब में बहुत सी कहानियों के साथ कुछ कविताएं भी हैं।
किताब में लिखी हर कहानी का अंत एक सवाल भी है और एक जवाब भी। ये किताब एक पहेली सी है और किताब पढ़ने से पहले एक बिन पूछी राय यह कि 'उर्दू से प्यार न करने वाले अहमक़ तो इसे देखें भी न'।
किताब का पीले और लाल रंग का आवरण चित्र पाठकों को अपनी तरफ आकर्षित करता है, इसे देख ऐसा लगता है मानो यह आवरण चित्र कुछ कहना चाह रहा है लेकिन आप उस संदेश को समझ नही पा रहे हैं।
पिछले आवरण में लिखा है कि लेखक साहित्य की विधागत तोड़फोड़ एवं नव निर्माण में रचनारत हैं और और किताब खत्म करते-करते आप शायद इस वाक्य को अपनी सहमति भी प्रदान कर दें।
इससे पहले लेखक की किताब 'गहन है यह अन्धकारा' पाठकों के बीच बहुत ऊंचे मानक स्थापित कर गई थी और अब 'कोतवाल का हुक्का' से लेखक के सामने यह साबित करने की चुनौती है कि 'गहन है यह अन्धकारा' की लेखनी लेखक के लिए तुक्का मात्र नही थी।
कहीं उर्दू कहीं हिंदी के साथ यह किताब शुरू होती है और किताब पढ़ते पाठकों को उर्दू की खूबसूरती समझ में आती है।
उर्दू पर हो-हल्ला मचाने वाली जमात वही है ,जो कभी कुछ नया नही समझना चाहती या उन्हें नया समझ में ही नही आता।
'इब्तिदाईया' (शुरुआत) में लेखक नए तरीके से लिखने की बात करते हैं और यह ठीक भी है, क्योंकि वह नयापन खोजने की चाह ही तो है जिससे यह साहित्य विकास करता है।
यहां पर लेखक किताब से जुड़ी कुछ जरूरी जानकारी भी साझा करते हैं जो किताब पढ़ने की शुरुआत करने से पहले जरूरी हैं।
'चाकरी चतुरंग' जैसी मशहूर किताब लिख चुके हिंदी लेखक ललित मोहन रयाल ने किताब का त'आरुफ़ (परिचय) लिखा है, इसकी भाषा सरल है।
पुलिस पर लिखी पंक्ति 'आधुनिकीकरण सुधार हुआ है लेकिन कॉस्मेटिक सा' के ज़रिए ललित पाठकों को किताब का हल्का स्वाद देने में कामयाब हुए हैं।
अनुक्रम से पता चलता है कि लेखक ने किताब को 'तहरीर', 'रोजनामचा', 'शहादत' व 'फैसला' जैसे पुलिसिया शब्दों का प्रयोग करते चार भागों में बांटा है और इन्हीं चार हिस्सों से आपको कई सारी कहानियां पढ़ने के लिए मिलेंगी।
'कोतवाल का हुक्का' कहानी से किताब की शुरुआत हुई है, कहानी आसान हिंदी भाषा में है। फ़क़ीर की वेशभूषा पढ़ते पाठकों को यह अंदाजा ही नही होगा कि वह कब किताब में रम गए। एक ही कहानी की शुरुआत कई तरह से कर लेखक ने किताब को अपनी तरह से नया स्वरूप दिया है, उन्हें इसकी परवाह नही है कि बाकी लेखक अपनी किताब को किस तरह का स्वरूप देते आए हैं।
उत्तराखंड के बैकग्राउंड पर लिखी इस कहानी को पढ़ने के लिए आपका एकाग्रचित्त होना आवश्यक है।
रामबदन की लिखावट से जुड़ी यह पंक्ति 'म' और 'द' अक्षर घिसट जाते थे और हस्ताक्षर 'न' पर समाप्त होता था। पाठकों से भी प्रैक्टिकल करवा सकती है।
सरकार की नीतियों, पत्रकारिता-पुलिस के गठजोड़ और विकास के नुकसान पर चर्चा करती यह कहानी एक फ़िल्म देखने सा अहसास कराती है और कहानी का अंत पाठकों को कुछ देर के लिए शून्य कर देता है।
लेखक हर कहानी की शुरुआत में ही पाठकों को किताब से जकड़ सा लेते हैं, जैसे 'कॉज़ ऑफ डेथ' कहानी की पहली पंक्ति 'पैंट के पांयचे घुटनों तक लाल हो चुके थे'। यहां पांयचे का मतलब न समझने के बावजूद पाठक कहानी को पढ़ते ही जाएंगे।
इस किताब को पढ़ते सिर्फ पुलिस ही नही, आम जनता और नेताओं को भी यह पता चलता है कि पुलिस क्या है और इस पर कौन-कौन से बाहरी दबाव रहते हैं।
'गोश्वारा' सिर्फ सात पंक्तियों की कहानी है पर लेखक के मन में गरीबों के लिए जो चुलबुलाहट है यह कहानी उसका आईना बन कर सामने आती है।
लेखक ने एक कहानी में पंक्ति लिखी है 'दरअसल गदराया हुआ शरीर खराब सेहत का घोषणापत्र है, वैसे ये व्यक्ति का अपना चुनाव भी है' यह देश के अधिकतर पुलिसकर्मियों का हाल बताने के लिए काफी है।
आगे पढ़ते हुए पाठकों को किताब की हर कहानी के अंत में ट्विस्ट देखने को मिलता है, साथ ही समाज की दुर्भावना पर भी व्यंग्य कसा गया है। इंसान कितना स्वार्थी है, यह बताने के लिए लेखक की यह पंक्ति ही काफी है ' सड़ी हुई लाश को उलटने पलटने से भभका सा उठता, उबकाई आ जाती फिर गली में थूकते हुए लौट जाते थे'।
'शहादत' हिस्सा शुरू होने पर किताब में एक स्केच और कुछ पंक्तियां हैं, जो किताब की आने वाली कहानियों को लेकर मन में जिज्ञासा उत्पन्न कर देते हैं और पाठकों को किताब के पन्ने बंद करने का बिल्कुल भी मन नहीं करता।
'उन दिनों सिपाही के लिए सम्मान सूचक नाम दीवान जी और घृणा के लिए हरामी इस्तेमाल होते थे' पंक्ति से लेखक ने बड़ी ही खूबी के साथ ही पुलिस के सिपाही की सामाजिक छवि पर एक चर्चा शुरू करवाने की कोशिश की है।
पृष्ठ 97 में लेखक पेलूराम के शरीर का वर्णन करते खुद उलझते नज़र आते हैं और किताब में यह पहली और अंतिम कमी लगती है।
'खुदमहदूद' जैसे शब्द पढ़ने में सही लगते हैं पर इन्हें समझने के लिए पाठकों को गूगल की मदद लेनी पड़ सकती है।
पेलूराम द्वारा आदमी का पीछा करना इस तरह वर्णित हुआ है मानो आप किसी दृश्य को अपने सामने घटित होते देख रहे हों।
किताब के आखिरी भाग में स्केच और उर्दू का तगड़ा कॉम्बिनेशन देखने को मिला है।
'इट्स ऑल ग्रीक टू मी' कहानी में पात्रों के 'क' 'ख' 'ग' नाम नए से हैं।
कहानी के बहाने लेखक ने पुलिस पर राजनीतिक प्रभावों के विषय को भी उठाया है।
'दिन के अंधेरे में' शीर्षक ही प्रयोगधर्मी है, इस कहानी और कविता के मिश्रण ने किताब की बाकी कहानियों की महफ़िल लूट ली है। हिंदी साहित्य के इस नए प्रयोग को पढ़ने के लिए यह किताब बेझिझक खरीदी जा सकती है।
'वहां तुम्हारा चेहरा बना देता और ये काले बादल बिलकुल तुम्हारे बालों की तरह' कविता की इन पंक्तियों से पाठकों के दिल की धड़कन बढ़ जाएंगी।
लेखक ने किताब के ज़रिए कुछ ऐसे विचार भी साझा किए हैं, जिसके बाद उनकी गिनती ऐसे लेखकों में होने लगेगी जो समाज पर गहरा असर रखते हैं। इसका प्रमाण 'वैसे न मानना दोनों तरफ से हो सकता था, समझ पर सामूहिकता हावी रही' पंक्ति में लेखक के द्वारा आगे पीछे लिखे विचार हैं।
प्रकाशक- काव्यांश प्रकाशन
मूल्य- 200

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