Thursday, February 16, 2023

कपड़ों की मगजमारी

पीएचडी का प्रेज़ेन्टेशन फिर आ गया है, अभी से असमंजस में हूं कि कॉलेज के लड़के लड़कियों के सामने किस तरह की ड्रेस में जाऊं। (जे बात ऑफ रिकॉर्ड रखनी जरूरी है कि ये ड्रेस वाली असमंजस साड़ी, सूट, वेस्टर्न पहनी स्लिम ट्रिम, बड़ा सा टैब पकड़ी खुद से युवा दिखती प्रोफेसरों को देख कर और भी बढ़ जाती है। अब इसे असमंजस कहूं या नर्वसनेस शब्द का प्रयोग करूँ)
ड्रेस सिलेक्शन से वहां परिचय का बड़ा प्रभाव पड़ता है।
 तीस से ऊपर हो चला एक रिसर्च स्कॉलर वाला गम्भीर परिचय जैसे ब्लेज़र, प्रेस की हुई पेंट, लेदर शूज़ या एक दशक पहले बीत चुके अपने कॉलेज टाइम की तरह भीड़ से अलग दिखने की कोशिश। आजकल ये कोशिश न जाने कैसे पूरी होती है। जूते से एक बिलाल ऊपर ठहर गई जीन्स पहनकर तो खुद महसूस होता है कि कहीं अलमारी से कक्षा आठ वाली जीन्स तो नही निकल गई, लेकिन लगभग हमउम्र विराट कोहली को भी ऐसी जीन्स पहना देख दुविधा हो जाती है कि क्या पता ये आजकल के फैशन में भी होगा।
 (एक दशक पहले ये सबसे अलग दिखने की कोशिश अक्सर बिना ब्रांड वाली फुल बाजू वाली शर्ट, लूज़ चौड़ी मोहरी वाली जीन्स और मोटी सोल वाले जूतों से पूरी होती थी।)

दो दशक बीत गए जब हम स्कूल टाइम में चौड़ी मोहरी वाली पैंट और साइड से मांग वाले बाल बनाकर स्कूल जाया करते थे। लड़कियों की दो चुटिया और चौड़ा पजामा अनिवार्य था।
 अब कोई लड़का लड़की तब की तरह स्कूल चले जाए तो उसका फोटो स्कूल के बच्चों के फोन पर वायरल हो जाएगा।

खैर ,आखिर में मैंने रीबॉक के स्पोर्ट्स शूज़ और उस तक पहुंच बनाई हुई प्रोवोग जीन्स ले ली है। ऊपर पहने पीटर इंग्लैंड के ब्लेज़र से जब भी नज़रें नीचे जा रही हैं तो सोच रहा हूँ कि क्या रेड चीफ के लेदर शूज़ अब भी चलते होंगे।

ओह, आखिर में ये तो पीएचडी प्रेजेंटेशन था!

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