Sunday, February 25, 2024

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RECOMMENDATION- KARMABHOOMI FOUNDATION UTTARAKHAND - PANDIT BHAIRAV DUTT DHULIYA PATRAKAAR PURASKAAR SAMAROH'- 19th MAY 2024

1. Name Of the Journalist -
2. Date of Birth-
3. Residential/Correspondence Address -
4. Permanent Address-
5. Email address-
6. Mobile/Whatsapp Number-
7. Educational / Professional Qualification-
8. Career Profile/details-
9. Achievements/Details regarding work done, research work, books written etc-(not more than 10 articles /reports in zip format and links) 
10. Details of Awards won.
11.Citation in 500 words giving reasons for recommendation etc- 
12. Any other information -
13. Signature of applicant or person recommending the candidate- 
14. Name/address/email/phone number of the person/organization recommending the candidate-




वर्ष था 1977, जब उत्तराखंड में नैनीताल की खूबसूरत वादियों के बीच नैनीताल समाचार की शुरुआत हुई. 
नैनीताल समाचार ने इमरजेंसी के बाद बने मुश्किल हालातों के बीच अपने लिए एक अलग राह चुनी, यह वह राह थी जो पथरीली थी और जिस पर आजकल के समाचार पत्र चलने से कतराते हैं. यह राह थी सच्ची पत्रकारिता की जिसमें पैसा नहीं था पर आत्मसंतुष्टि थी, दुनिया बदलने की. चाटुकारिता पत्रकारिता के बीच नैनीताल समाचार की सच्ची पत्रकारिता आज भी जीवित है, ठीक वैसे ही जैसे उसे गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ और सुंदरलाल बहुगुणा छोड़ गए हैं. 
आजादी के वक्त, उससे पहले और उसके कुछ दशकों बाद पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य जनता की आवाज़ उठाना ही था, नैनीताल समाचार आज भी वही काम जारी रखे हुए है.

नैनीताल के राजीव लोचन साह बचपन से ही लिखने पढ़ने के शौकीन थे, कॉलेज जाते ही उनका यह शौक परवान चढ़ा और उस समय की लोकप्रिय पत्रिका ‘नई कहानियां’ में उनकी दो कहानियां प्रकाशित भी हो गई. वर्ष 1971 में ‘पहल’ के सम्पादक ज्ञानरंजन का नैनीताल आना हुआ तो राजीव की उनके साथ जमकर घुमक्कड़ी हुई, हिंदी को लेकर अपने अंदर उथल-पुथल मचा रहे विभिन्न प्रश्नों के बारे में राजीव ने ज्ञानरंजन से बातचीत करी.

ज्ञानरंजन द्वारा प्रेस खोल प्रकाशन के क्षेत्र में जाने के सुझाव को दिल से लगा राजीव अपने परिवार से बातचीत करने के बाद ‘प्रेस’ की एबीसीडी सीखने इलाहाबाद चले गए. वहां अपने रिश्तेदार मनोहर लाल जगाती के घर रहते हुए उनका सम्पर्क रामाप्रसाद घिडियाल से हुआ और उनसे राजीव को प्रेस के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला. इलाहाबाद से वापस आ उन्होंने वर्ष 1973 में राजहंस प्रेस खोला पर जब तक वह जमा तब तक देश में इमरजेंसी का साइरन बज गया और समाचार पत्र शुरू करने में देरी हुई.

वर्ष 1977 में इमरजेंसी समाप्त होने के बाद ‘नवनीत’ पत्रिका से प्रभावित राजीव लोचन साह ने अपने साथ नैनीताल के दो युवाओं हरीश पन्त और पवन राकेश को भी जोड़ा और लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को मजबूत करने के लिए वर्ष 1977 के स्वतंत्रता दिवस को ‘नैनीताल समाचार’ की शुरुआत करने के लिए चुना.

6 अगस्त 1977 को नैनीताल में वनों की नीलामी पर ख़बर करने राजीव अपने मित्र विनोद पांडे के साथ गए थे पर वहां स्थिति ऐसी बनी कि उसको लेकर राजीव लोचन साह कहते हैं कि “मैं वहां गया तो एक पत्रकार के तौर पर था पर जब बाहर आया तो एक आंदोलनकारी बन चुका था.” उसी साल नवंबर में वनों की नीलामी के विरोध में हुए प्रदर्शनों में गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ भी आंदोलनकारी बन गए और नैनीताल समाचार के साथ उनका अटूट सम्बन्ध शुरू हुआ.

उत्तराखंड से उत्तरांचल और फिर उत्तराखंड बनने का पूरा सफ़र हम नैनीताल समाचार में पढ़ सकते हैं, यह यात्रा भी नैनीताल समाचार के साथ ही चलती प्रतीत होती है. प्रदेश में होने वाले हर प्रकार के जनांदोलनों की यह आवाज़ बनते गया. 

वर्ष 1984 में प्रदेश के अंदर शराब विरोध में चल रहे आंदोलन की ख़बर को समाचार पत्र ने ‘नशा नही रोज़गार दो’ शीर्षक से छापा और उसकी वज़ह से जन इस आंदोलन से जुड़ता चला गया. ‘अल्मोड़ा मैग्नेसाइट लिमिटेड’ को लेकर यह कहा जाता था कि उसकी वज़ह से स्थानीय लोगों को नुक़सान और उद्योगपतियों को फ़ायदा हो रहा है तो वर्ष 1988 में अख़बार ने जनता की आवाज़ बन एक आलेख छापा जिसका शीर्षक था ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तराखंड में उग गई है’.

वर्ष 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बीच हुए मसूरी हत्याकांड पर अख़बार ने ख़बर छापी ‘मसूरी : लाशों को बो कर उत्तराखंड के फूल उगाओ’. नया राज्य बनने के बाद भी नैनीताल समाचार ने जन की ख़बरों को छापना नही छोड़ा और अपना पत्रकारिता धर्म निभाते हुए समाचार पत्र जन की आवाज़ बना रहा. अगस्त 2011 में प्रदेश में बन रहे बांधों से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान पर ‘बांध के लिए वन कानून आड़े नही आते’ नाम से ख़बर छपी.

अख़बार सिर्फ़ उत्तराखंड ही नही राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी अपनी राय मज़बूती के साथ रखता रहा. शेखर पाठक के अनुसार नैनीताल समाचार की यह विशेषता रही है कि उसके सदस्यों में अधिकतर सदस्यों के आंदोलनकारी होने बावजूद उसने दूसरा पक्ष भी अपने पाठकों के सामने अच्छे तरीके से रखा.

साल 1994 के राज्य आन्दोलन के दौरान नैनीताल समाचार का ‘सांध्यकालीन उत्तराखंड बुलेटिन’ बेहद लोकप्रिय हुआ. 3 सितंबर से 25 अक्टूबर तक नैनीताल के दो स्थानों पर रेडियो बुलेटिन की तर्ज़ पर बुलेटिन पढ़ा गया. जिसका प्रयोग बाद में देश के अन्य हिस्सों दिल्ली के जंतरमंतर, उत्तराखंड के गोपेश्वर और उत्तरकाशी में भी किया गया. अंटार्कटिक की धरती पर पहली बार गए पत्रकार गोविंद पन्त राजू की डायरी भी बहुत लोकप्रिय हुई.
अलग अलग जिलों में नैनीताल समाचार के प्रतिनिधि खबर भेजते, जिससे समाचार में अलग अलग जिलों की खबर भी प्रकाशित होती रही.

समाचार पत्र में चिट्ठी पत्र, सौल कठौल और आशल कुशल भाग अपने आप में अनोखे हैं. ‘आशल कुशल’ उत्तराखंड की जिलावार ख़बरों से एकसाथ रूबरू करवाता है. साहित्य अंक, पर्यावरण अंक, होली अंक, हरेला अंक एक नया प्रयोग थे. होली अंक में होली के गीत रंगीन पृष्ठों पर प्रकाशित होने के बाद उत्तराखंड की होली का अहसास कराते अलग ही आनन्द देते हैं.

उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला के लिए हर साल एक विशेष हरेला अंक आता है, अंक के साथ पाठकों के लिए हरेले का तिनका भी भेजा जाता है. होली अंक और हरेला अंक के यह प्रयोग भारत या विश्व के किसी समाचार पत्र में शायद ही देखने को मिले.

कोरोना काल में लगभग सभी समाचार पत्र विज्ञापन न मिलने की वज़ह से बुरी स्थिति से गुज़र रहे थे, तब पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रहा नैनीताल समाचार भी इससे अछूता नही रहा पर फिर भी अपने पाठकों के सहयोग, राजीव लोचन साह की जमापूंजी से यह निरंतर प्रकाशित होता रहा.
आज भी राजीव लोचन साह के सम्पादक रहते नैनीताल समाचार उसी जज्बे के साथ प्रकाशित हो रहा है, जैसे 1977 में हो रहा था. नैनीताल समाचार आज भी उस जनता की आवाज है, जिनकी आवाज़ दबा दी जाती है. पत्रकारिता के वास्तविक उद्देश्य को पूरा करता नैनीताल समाचार साल 2027 में अपने पचासवें वर्ष में पहुंचने वाला है.

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