Monday, March 18, 2024

एक लघुकथा का फ़िल्म बन जाना.

सोशल मीडिया, इंटरनेट तक आसान पहुंच और मोबाइल ने आज फ़िल्म मेकर्स के लिए फ़िल्म बनाना आसान कर दिया है, अगर कंटेंट में दम हो तो उसे दर्शक मिल ही जाते हैं. मध्य प्रदेश के डिजिटल क्रेटर पलाश ने लेखक अनुराग शर्मा की लघुकथा 'पागल' को एक शॉर्ट फिल्म का रूप दे दिया है. फ़िल्म की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ छह लोगों को अभिनय करते दिखाते मोबाइल से ही रिकॉर्ड किया गया है.

https://www.youtube.com/watch?v=v4nq_lHDx88

सबसे पहले अनुराग शर्मा की वो कहानी, जिससे निर्देशक ने शॉर्ट फिल्म बना दी.

पुरुष: “तुम साथ होती हो तो शाम बहुत सुन्दर हो जाती है.”

स्त्री: “जब मैं ध्यान करती हूँ तो क्षण भर में उड़कर दूसरे लोकों में पहुँच जाती हूँ.”

पुरुष: “इसे ध्यान नहीं ख्याली पुलाव कहूंगा मैं। आँखें बंद करते ही बेतुके सपने देखने लगती हो तुम.”

स्त्री: “नहीं! मेरा विश्वास करो, साधना से सब कुछ संभव है. मुझे देखो, मैं यहाँ हूँ, तुम्हारे सामने और इसी समय अपनी साधना के बल पर मैं हरिद्वार के आश्रम में भी उपस्थित हूँ स्वामी जी के चरणों में.”

पुरुष: “उस बुड्ढे की तो...”

स्त्री: “तुम्हें ईर्ष्या हो रही है स्वामी जी से?”

पुरुष: “मुझे ईर्ष्या क्यों कर होने लगी?”

स्त्री: “क्योंकि तुम मर्द बड़े शक़्क़ी होते हो. याद रहे, शक़ का इलाज़ तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं है.”

पुरुष: “ऐसा क्या कह दिया मैंने?”

स्त्री: “इतना कुछ तो कहते रहते हो हर समय. मैं अपना भला-बुरा नहीं समझती. मेरी साधना झूठी है. योग, ध्यान सब बेमतलब की बातें हैं. स्वामीजी लम्पट हैं.”

पुरुष: “सच है इसलिये कहता हूँ. तुम यहाँ साधना के बल पर नहीं हो. तुम यहाँ हो, क्योंकि हम दोनों ने दूतावास जाकर वीसा लिया था. फिर मैंने यहाँ से तुम्हारे लिए टिकट खरीदकर भेजा था और उसके बाद हवाई अड्डे पर तुम्हें लेने आया था. कल्पना और वास्तविकता में अंतर तो समझना पड़ेगा न.”

स्त्री: “हाँ, सारी समझ तो जैसे भगवान ने तुम्हें ही दे दी है. यह संसार एक सपना है. पता है?”

पुरुष: “सब पता है मुझे. पागल हो गई हो तुम.”

बालक: “यह आदमी कौन है?”

बालिका: “पता नहीं! रोज़ शाम को इस पार्क में सैर को आता है. हमेशा अपने आप से बातें करता रहता है. पागल है शायद.”
 
लघुकथा के संवाद वैसे ही और निर्देशक ने फ़िल्म बना दी.

अनुराग शर्मा की इस कहानी में मात्र चार लोग हैं पर निर्देशक ने फ़िल्म में छह लोगों को अभिनय का मौका दिया है. कहानी में सभी घटनाएं एक पार्क में है पर शॉर्ट फिल्म में यह एक नदी के किनारे फिल्माई गई हैं.

जिस तरह फ़िल्म में दो मुख्य किरदारों के हाथों का स्पर्श होता है, उससे पता लगता है कि निर्देशक ने फ़िल्म में स्पर्श की शक्ति का बखूबी इस्तेमाल किया है.
कहानी में पुरुष और स्त्री के मध्य की बातचीत बड़ी प्रभावी है और यही फ़िल्म का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है. कहानी के शब्दों को ही निर्देशक ने संवादों के रूप ढाल दिया है, जैसे स्त्री और पुरुष के बीच यह बातचीत मीठी सी खींचतान वाली लगती है-
स्त्री: “तुम्हें ईर्ष्या हो रही है स्वामी जी से?”
पुरुष: “मुझे ईर्ष्या क्यों कर होने लगी?”
स्त्री: “क्योंकि तुम मर्द बड़े शक़्क़ी होते हो. याद रहे, शक़ का इलाज़ तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं है.”

इंसान की मान्यताओं और आस्थाओं पर कुठाराघात की तरह इस शॉर्ट फिल्म को पटकथा लेखन ने खास बना दिया.

शुरुआती दृश्यों से ही यह फ़िल्म इंसान की मान्यताओं, आस्थाओं पर कुठाराघात की तरह है. फ़िल्म के पटकथा लेखन में कुछ दृश्य कहानी से अलग जोड़ दिए गए हैं, जो इसको थोड़ा सा और रोचक बना देते हैं. दो लोगों द्वारा पुल में सिक्के फेंकने वाला दृश्य संवाद रहित है पर काफी कुछ कह जाता है. कहानी के पार्क की जगह जिस नदी किनारे, पुलों, रेल को चुना गया है, यह सब दर्शकों को शॉर्ट फिल्म में डुबाने में सफलता दिलाता है. जोड़े का साथ बैठकर सामने कहीं दूर देखना और इस दृश्य को पीछे से फिल्माना एक सुखद अनुभूति देता है. फ़िल्म का क्लाइमेक्स वाला दृश्य जिस तरह तैयार किया गया है, कहानी पढ़ते यह दर्शकों को इस तरह चौंकाता नही है और पटकथा लेखन में की गई यह मेहनत कहानी पढ़ चुके पाठकों को साफ समझ आती है.

'सच है इसलिये कहता हूँ. तुम यहाँ साधना के बल पर नहीं हो. तुम यहाँ हो, क्योंकि हम दोनों ने दूतावास जाकर वीसा लिया था. फिर मैंने यहाँ से तुम्हारे लिए टिकट खरीदकर भेजा था और उसके बाद हवाई अड्डे पर तुम्हें लेने आया था. कल्पना और वास्तविकता में अंतर तो समझना पड़ेगा न.' संवाद से पुरुष अपनी साथी स्त्री की मान्यता को झकझोर देता है. दर्शक भी इन पंक्तियों को सुनकर कहीं न कहीं खुद को इससे जुड़ा हुआ पाते हैं, जहां वास्तविकता में भी कर्म पर विश्वास कम होता जा रहा है.

मोबाइल से रिकॉर्डिंग के बावजूद प्रभावित करता छायांकन और बैकग्राउंड स्कोर.

फ़िल्म को एक मोबाइल के जरिए ही शूट किया गया है और इसकी लोकेशन में हरे भरे पेड़- पौधे, नदी, बादलों से घिरा आसमान शामिल है. यह सब एक मोबाइल से अच्छी तरह शूट किया गया है, प्रेमियों के मध्य बातचीत को बड़ी ही खूबसूरती के साथ फिल्माया गया है. नदी का किनारा भी खूबसूरत लगा है.
बैकग्राउंड स्कोर ने कहानी में जान फूंकने में कोई कसर नही छोड़ी है, दौड़ते बच्चों के कदमों की आवाज, चिड़ियों का चहचहाना, ट्रेन की आवाज फ़िल्म का रोमांच बढ़ाती हैं तो प्रेमियों की बातचीत के दौरान बज रहा बैकग्राउंड स्कोर भी सही वक्त पर इस्तेमाल किया गया है.

परिधानों, मेकअप के साथ कलाकार भी हैं काम के.

फ़िल्म में काम कर रहे दोनों बच्चे एक दृश्य में दौड़ते हैं और तब एक बच्चे की पैंट एक पैर में फोल्ड होती है और एक में पूरी खुली होती है, इस तरह इन कपड़ों से निर्देशक ने बच्चों की बेफिक्री भरी जिंदगी दिखाने में कामयाबी पाई है. मुख्य भूमिका में रहे आर्यन पांडे की मूंछे और राशि वर्मा की सादगी भी कहानी का हिस्सा है.
प्रेम में डूबे युवा का किरदार निभाने में आर्यन ने कोई कमी नही छोड़ी है और कल्पना, वास्तविकता जैसे आम बोलचाल की भाषा से बाहर के शब्द उन्होंने बड़ी ही सफाई से बोले हैं.
राशि वर्मा ने भविष्य के लिए उम्मीदें भी दिखाई हैं, प्रेमी से सवाल पूछते और विचारों में डूबी राशि ने कुछ ही मिनटों की अपनी अदाकारी से प्रभावित किया है. 

हिमांशु जोशी, पायल गुप्ता.


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