अपनी पहली किताब पढ़ने से हर किसी की कोई न कोई याद जुड़ी होती है।
मेरा किताबों को पढ़ने का शौक जब शुरू हुआ तो मेरी पहली किताब बचपन से सुनते आ रहे गांधी नाम पर लिखी किताब 'उसने गांधी को क्यों मारा' थी.
कैसे पड़ी किताब खरीदने की आदत।
एनडीटीवी, क्विंट में आज मेरी तीस से चालीस पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित हैं पर मैं हमेशा से ऐसा नही था। याद आता है कि हिंदी अच्छी होने के कारण आर्मी पब्लिक स्कूल मेरठ में मुझे हिंदी पढ़ाने वाली मोनिका मैडम ने अपने पीरियड में मुझे मॉनिटर नियुक्त कर दिया था। तब मुझे कछुए- खरगोश और प्रेमचंद की कहानी बहुत अच्छी लगती थी पर एक पूरी किताब पढ़ने के बारे में कभी सोचा भी नही। हमारे भारतीय परिवारों में माता- पिता घर गृहस्थी में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें पढ़ने का होश ही नही रहता, बच्चे स्कूल के बाद घर जाएं तो इसका बड़ा प्रभाव पड़ता है। वह अपने कोर्स की किताबों के सिवाय किसी और किताब में हाथ लगाने के बारे में सोचते भी नही। मैं मानता हूं मेरे बचपन का दौर गुजर जाने के बीस- पच्चीस सालों बाद आज स्थिति और भी बुरी हो गई है, माता पिता अब फोन में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अब उनका ध्यान इस पर भी नही है कि उनका बच्चा कोर्स की किताबें पढ़ रहा है या नही, साहित्यिक क़िताबों को तो छोड़ ही दीजिए।
फिर से मेरी पहली किताब पर आएं तो सातवीं कक्षा में आते-आते स्कूल में निबंध लेखन और हिंदी के पाठों को पढ़ना मेरे लिए रोज़ के आम काम जैसा हो गया था लेकिन अब भी कोई साहितियक किताब नही पढ़ी थी। इस बीच ही कहीं से मिली एडोल्फ हिटलर की जीवनी और विज्ञान पर एक किताब तो थी पर उन्हें पढ़ने में इतनी गम्भीरता नही रही। यही सिलसिला कॉलेज के दिनों में भी जारी रहा, कोर्स की किताबें ही जरूरी बनी रही।
कोरोना काल के दौरान नैनीताल में रहते 'नैनीताल समाचार' के सम्पादक राजीव लोचन साह से मुलाकात हुई, उनसे मुलाकात की वजह थी एक डायरी। वह डायरी जो मैंने पत्रकारिता से मास्टर्स करने के दौरान बनाई थी और उस डायरी में राजीव लोचन साह का नाम एक दिन मैंने हमारी क्लास में उनके आने पर लिख लिया था।
राजीव लोचन साह ने मुझे लिखने के लिए बस एक सलाह दी कि पढ़ो। इसी को याद रखते मैंने गूगल से फ्री पीडीएफ खोजते 'उसने गांधी को क्यों मारा' डाउनलोड कर ली और पढ़ते हुए इस किताब पर अपनी टिप्पणी भी लिख ली।
यह टिप्पणी एक बड़े समाचार न्यूज़ पोर्टल 'सत्य हिंदी' में प्रकाशित हुई। जब किताब के लेखक अशोक कुमार पाण्डे को मैंने किताब पर यह टिप्पणी भेजने के साथ बताया कि यह फ्री में डाउनलोड कर पढ़ी थी तो उन्होंने मुझे जीवन की नई सीख दी। यह सीख थी कि किताब खरीद कर पढ़नी चाहिए क्योंकि लेखक के लिए यही एक आमदनी का जरिया होता है और रॉयल्टी से ही उसकी मेहनत का फल उसे मिलता है। अगर पेट की भूख न मिटे तो कोई कैसे मुफ्त में लिखता रह सकता है, वो दिन और आज का दिन। मेरी एक किताबों की अलमारी खरीदी हुई किताबों से भरी पड़ी है।
इन किताबों को पढ़ते देश, दुनिया, समाज के बारे में जो जानकारी मिलती है, वह शायद ही मैं कभी जान पाता और इन्हें पढ़े बिना मैं भी इंस्टाग्राम, फेसबुक रील स्क्रॉल करते दिन में अपने आठ- नौ बहुमूल्य घण्टे बर्बाद कर देता।
मेरी पहली किताब पर लिखी वह टिप्पणी भी मैं यहां शामिल करना चाहता हूं।
कश्मीर के इतिहास और समकाल के विशेषज्ञ के रुप में सशक्त पहचान बना चुके और 'कश्मीरनामा' के लेखक अशोक कुमार पांडेय की यह किताब गांधी को मारने के लिए बीच में आए साजिश और स्रोतों की पड़ताल करती है।
पुस्तक तीन खंडों में लिखी गई है। पहले खण्ड में हत्यारों से परिचय कराते हुए लेखक दूसरे खण्ड में उन परिस्थितियों से अवगत कराते हैं जिनमें गांधी हत्या की पटकथा लिखी गई, अंतिम खण्ड में अदालती कार्रवाई के बारे में लिखा गया है।
किताब की शुरुआत उस गांधी के बारे में बात करते हुए होती है जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के ऊपर हो रहे अत्याचारों को रोकने की कोशिश करने वहां जाना चाहता था।
पहले खण्ड में हत्यारों के जीवन के बारे में ऐसे खुलासे किए जाते हैं जिससे उनके अतीत की पृष्ठभूमि में हत्यारों का पनपना साफ़ दिखाई देता है।
लेखक ने तब की मीडिया को लेकर जो खुलासे किए हैं उन्हें देख यह लगता है कि मीडिया आज भी उस स्थिति से बाहर नही निकली है, वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए इतिहास से उठाए गए तथ्यों की वज़ह से ही यह किताब आज पढ़ने योग्य बन जाती है।
गांधी हत्या पर तब के तंत्र पर यह सवाल उठते हैं कि उन्होंने जानकारी होते हुए भी हत्या रोकने के लिए आवश्यक कदम नही उठाए।
खण्ड की यह बात कि नफ़रत की विचारधारा सभी धर्मों के ऐसे अनेक उत्साही और आदर्शवादी युवाओं को आज भी हत्यारों में बदल रही है वर्तमान परिदृश्य में सही साबित होती है।
दूसरे खण्ड मेंं गांधी हत्या के समय घटित हो रही अन्य घटनाओं को क्रमवार बताया गया है, यह वह घटनाएं थी जिनका परिणाम गांधी हत्या के रूप में सामने आने वाला था।
चुन्नीबाई वैद्य का यह कथन कि 'गांधी जी कट्टरपंथी हिंदुओं की राह के कांटे बन चुके थे', सारी कहानी बयां करता है।
लेखक ने गांधी के दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह वाले किस्से को गांधी के अहिंसा पर चलने वाले रास्ते की शुरुआत बताते हुए उनके और मीर आलम के बीच घटी घटना का जिक्र भी किया है।
गांधी ने अपने हमलावर मीर आलम के लिए अटार्नी जनरल से माफी की मांग करी और बाद में उनसे प्रभावित हो वही मीर आलम गांधी की रक्षा के लिए एक जगह कटार लिए खड़ा था।
किताब में हम यह पढ़ सकते हैं कि कैसे पहले गांधी के विचार अंग्रेज़ों के प्रति न्यायपूर्ण राज्य वाले थे जो बाद में बदलकर अन्यायपूर्ण राज्य वाले बन गए थे।
लेखक गांधी के विचार जानने के लिए 'द रिमूवल ऑफ अंटचेबिलिटी' जैसी किताबें पढ़ने के लिए भी कहते हैं।
पुस्तक हमें यह बताती है कि गांधी का संघर्ष जातिवाद विरोध कर एक समरस समाज बनाने के लिए था तो सावरकर अन्य धर्मों के खिलाफ़ खड़े होने के लिए हिन्दू एकता बढ़ाना चाहते थे। सावरकर के खत उनके अंग्रेजी शासन के साथ क़रीबी का वर्णन करते हैं।
लेखक अपनी किताब से गांधी के विभाजन के प्रति जिम्मेदार होने वाले तथ्य को भी तोड़ते हैं। पुस्तक गांधी के आज़ादी के बाद के चिंतन पर भी प्रकाश डालती है। गांधी के लिए कांग्रेस सत्ता प्राप्ति का जरिया नही थी, उनके लिए यह स्वराज़ के सपने को पूरा करने वाली संस्था थी और गांधी का स्वराज़ केवल 'आज़ाद' भारत नही था।
नोआखली की घटना, दंगो की शांति के लिए गांधी के प्रयासों के साथ-साथ उनके हत्यारों के निजी जीवन में चल रही उथल-पुथल पर चर्चा करती किताब आगे बढ़ती है।
लेखक गांधी के जीवन में कला और संगीत के अभाव की बात करने वालों के लिए भी तथ्य सामने रखते हैं।
गांधी के हत्यारों की वास्तविकता दिखाने के लिए कपूर आयोग की रिपोर्ट्स का हवाला दिया गया है। गांधी हत्या के बाद पटेल और नेहरू के बारे में कहा गया है कि पटेल हत्यारों को फांसी दिलाना चाहते थे तो नेहरू ने इस पर कोई हस्तक्षेप नही किया था।
तीसरा खण्ड तुम अदालत में झूठ बोले गोडसे में लेखक गोडसे के खुद को सही और महान बनाने की कोशिश करने वाले बयानों को अपने तर्कों से झूठा साबित कर देते हैं।
लेखक समझाते हैं कि आम भारतीयों के घर में जिन स्थितियों के बाद विभाजन होता है उन्हीं स्थितियों में ही भारत-पाक विभाजन हुआ था जिसका जिम्मेदार गांधी को ठहराना गलत है, लेखक इस विचार को मजबूती के साथ रखते हैं कि गांधी तो बंटवारे के बाद भी दोनों को एक करना चाहते थे।
किताब भगत सिंह पर भी गांधी की स्थिति स्पष्ट करती है।
अंत में लेखक बहुत सी किताबों व अन्य सबूतों को आधार बनाते हुए यह साबित करने में कामयाब होते हैं कि गोडसे भी उसी मानसिक विकृति का शिकार थे, जिस धार्मिक कट्टरता की वज़ह से आज देश में समय समय पर दंगे होते हैं।
हिमांशु जोशी।
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