Wednesday, April 17, 2024

किताबों से दूर मोबाइल के पास टीनएजर्स।

टीनएजर्स के पास अब मोबाइल आसानी से उपलब्ध है। सोशल मीडिया का इन बच्चों पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ रहा है, जिससे उनकी पढ़ाई लिखाई प्रभावित जो रही है। माता पिता को अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के सामने खड़ी इस चुनौती से पार पाने के लिए समझदारी से काम लेना होगा।

सोशल मीडिया के इस दौर में अब हर कोई किताबों से दूर हो रहा है और कोरोना काल में ऑनलाइन क्लास की वजह से मोबाइल का ज्यादा प्रयोग करते टीनएज बच्चे सबसे ज्यादा किताबों से दूर हुए हैं।

मोबाइल और उसमें सोशल मीडिया का बढ़ता प्रयोग इन बच्चों के लिए खतरनाक साबित हो रहा है, इन टीनएज बच्चों, खासतौर पर लड़कियों के लिए सोशल मीडिया ज्यादा खतरनाक है।

हाल ही में चंडीगढ़ के स्कूल की एक चौंकाने वाली घटना हमारे सामने आई थी, जहां स्कूल के ही नाबालिग छात्र द्वारा अपने स्कूल की लगभग पचास छात्राओं की अश्लील तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड कर दी गई थी। इसके लिए इन नाबालिग छात्राओं की तस्वीरों को स्कूल की ऑफिशियल वेबसाइट से डाउनलोड किया गया और उसके बाद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए उन्हें आपत्तिजनक बना दिया गया।

ऐसे ही कुछ समय पहले गाजियाबाद में सामने आई एक घटना ने बच्चों द्वारा सोशल मीडिया, मोबाइल के प्रयोग पर सवाल खड़े कर दिए थे। एक दस साल के बच्चे ने अपने ही परिवार से ईमेल के जरिए दस करोड़ रुपये तक की मांग की और उसने पैसे नहीं देने पर परिवार के चारों सदस्यों की गला काटकर हत्या करने की धमकी भी दी।


टीनएजर्स के लिए रील और रीयल लाइफ में फर्क समझना जरूरी।

बीते कुछ सालों से देखने में आया है कि अब बच्चे समय से पहले वयस्क हो रहे हैं, जो सामान इनकी उम्र में हमारे लिए बहुत कीमती हुआ करता था वो अब इनको आसानी से उपलब्ध है। जैसे मोबाइल फोन, मोबाइल पहले बहुत कम लोगों के पास होता था और अब यह बच्चों के पास भी रहता है।
 टीनएजर्स हमें ज्यादातर स्कूल और कॉलेज के शुरुआती सालों में मिलते हैं, अब टीनएजर्स ऑनलाइन डेटिंग वेबसाइट्स के जरिए डेटिंग जाना चाहते हैं और अपने दोस्तों के साथ रात में घर से बाहर रहना चाहते हैं। इसका असर खासतौर पर लड़कियों में ज्यादा देखने को मिलता है, जो अपने दोस्तों को रोज़ कॉफी पीते सोशल मीडिया पर रील्स पोस्ट करते देखने के बाद अपने माता पिता से उनकी तरह ही जीने के लिए जिद करने लगती हैं, उन्हें इस बात से मतलब नही होता कि उनकी दोस्त एक ही रील को रोज़ अपलोड भी कर सकती हैं।

सोशल मीडिया भी वक्त के साथ बदल रहा है, अपने दोस्तों से जुड़े रहने की पहल के साथ शुरू हुआ सोशल मीडिया अब फॉलोवर्स पाने का एक खेल भर बन कर रह गया है, कंटेंट बनाना अब एक फुल टाइम जॉब है। अगर आप टैलेंटेड नही हैं तो फॉलोवर्स बढ़ाने के लिए आप गलत रास्ता अपनाने लगेंगे।

बच्चों को उनके माता पिता ने घर में थोड़ा खुला माहौल देना चाहिए, उनकी जिज्ञासा को शांत करना चाहिए। घर में ऐसा माहौल नही बना देना चाहिए कि बच्चे का दम घुटने लगे, वह अपनी बात किसी से न कह पाए।

 टीनएजर्स अब बस ट्यूशन और स्कूल में ही किसी के साथ रिश्ते में नही आ सकते। उनके पास सोशल मीडिया की दुनिया है, जहां वह किसी से भी मिल सकते हैं। टीनएजर्स को इस बारे में सही गलत बताना बहुत जरूरी है। सोशल मीडिया एक फेक वर्ल्ड है, इन बच्चों को रील और रीयल लाइफ में फर्क समझना चाहिए।

माता- पिता की बच्चों से दोस्ती एक हद तक ही ठीक है।

कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई की वजह से सभी बच्चों के पास मोबाइल था, अमीर हो या गरीब सभी अभिभावकों के लिए अपने बच्चों के लिए मोबाइल खरीदना मजबूरी बन गया था। उनके सामने यह डर था कि इतने लंबे समय तक स्कूल में पढ़ाई न होने की वजह से उनका बच्चा पढ़ाई लिखाई से विमुख न हो जाए।
बच्चे आजकल वक्त से पहले बड़े हो रहे हैं, तेरह चौदह साल के बच्चे मोबाइल में तरह तरह के कंटेट देख सत्रह अट्ठारह साल जैसों की तरह सोचने लगे हैं। आजकल टीवी में हम एक एड देखते हैं जहां खाना खाते हुए एक छोटी बच्ची टेलीविजन पर आने वाले नाटक की नकल करते बड़ों जैसी बात करती है। वही हाल सोशल मीडिया ने भी आजकल के टीनएजर्स का किया है, उन्हें अपने से ज्यादा उम्र के लोगों के लिए बना हुआ कंटेंट सोशल मीडिया पर नज़र आते रहता है। इसके लिए पेरेंटल कंट्रोल के नियमों को सख्त करना होगा और साथ ही बच्चों के माता पिता को भी इसकी जानकारी होनी जरूरी है, जिससे वह अपने बच्चों द्वारा देखी जा रही सामग्री पर नियंत्रण रख सकें।
 हमें बच्चों को शुरुआत से ही मोबाइल की जगह कोई खिलौना देना चाहिए, हमें बच्चों को ड्राइंग बनाने के लिए देनी चाहिए, इन सब से वह व्यस्त रहेगा और मोबाइल की तरफ उसका ध्यान नही जाएगा।
माता पिता की अपने बच्चों के साथ दोस्ती होनी चाहिए पर इतनी भी नही कि वह उनके साथ बैठकर शराब पीने लगें।

सोशल मीडिया पर वक्त ज्यादा गुजारने की वजह से टीनएजर्स में सबसे ज्यादा फर्क लड़कियों पर इसलिए पड़ा है क्योंकि इसकी वजह से वे अब अपने माता पिता से दूर हो रही हैं। सोशल मीडिया पर उनके दोस्त तो हैं पर उनसे यह लड़कियां वो बात नही कर सकती जो अपने माता पिता के साथ कर सकती हैं। अपने शरीर में आ रहे बदलाव ये टीनएजर्स लड़कियां माता पिता से नही कह पाती और डिप्रेशन जैसी समस्याओं से जूझने लगती हैं।

 अभिभावक उस माली की तरह हैं जो बच्चों को पौधें की तरह सींचते हैं। बच्चों का सही विकास सबसे पहले उनके अभिभावकों के नियंत्रण में ही है। अब पुराने समय की तरह संयुक्त परिवार नही हैं, जिस वजह से बच्चों के पास अपने माता पिता के सिवाय अपनी बात साझा करने के लिए कोई नही होता। अभिभावकों को अपने 'मी टाइम' जैसे कॉन्सेप्ट की शुरुआत करनी चाहिए और उन्हें अपने बच्चों को भी इस बारे में बताना चाहिए। मी टाइम से अर्थ है कि पापा- मम्मी, मां- बेटे और मां- बेटी का अपना- अपना मी टाइम हो और उस वक्त में कोई तीसरा व्यक्ति उनके बीच में न आए।

स्कूल के शिक्षकों का यह दायित्व बन जाता है कि वह बच्चों से सोशल मीडिया पर खुलकर बात करें, वह सोशल मीडिया के फायदे नुकसान से बच्चों को अवगत कराएं। शिक्षकों को समय समय पर छात्र छात्राओं के अभिभावकों से भी टीनएजर्स पर सोशल मीडिया के इस्तेमाल और उसके असर पर बातचीत करते रहनी चाहिए। दिल्ली के स्कूलों में इस विषय पर प्रोग्राम चलाए जाते हैं, वहां बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को सही बनाए रखने के लिए काउंसलर्स रखे जाते हैं। 
छोटे शहरों में जहां अभी हम टीनएजर्स पर सोशल मीडिया का ज्यादा असर नही देख रहे हैं, वहां भी बात बिगड़ने से पहले स्कूलों में ऐसे प्रोग्राम शुरू किए जाने चाहिए।

पायल गुप्ता।

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