30 मई 1826 को हिंदी भाषा में पहला समाचार पत्र 'उदन्त मार्तण्ड' निकलने के बाद से भारत में सैंकड़ों समाचार पत्र आए हैं और इंटरनेट आने के बाद से समाचार वेब पोर्टलों की भरमार के बाद भी समाचार पत्रों की यह यात्रा जारी है. इन समाचार पत्रों ने हमारे समाज की दिशा दशा बदलने में अहम भूमिका निभाई है.
वर्ष 1937 में शुरू हुआ 'कर्मभूमि' गढ़वाल और रियासत टिहरी के भारत में विलय होने तक आन्दोलनकारियों का मुखपत्र बना रहा. कर्मभूमि के सम्पादक पण्डित भैरव दत्त धूलिया की याद में पण्डित भैरव दत्त धूलिया द्वितीय पत्रकार पुरस्कार इस बार 'नैनीताल समाचार' के सम्पादक राजीव लोचन साह को दिया गया. यह पुरस्कार समारोह 19 मई को उत्तराखंड के लैंसडाउन में आयोजित हुआ, रोचक बात यह है कि राजीव ने अपने युवावस्था के साथी जाने माने इतिहासकार प्रोफेसर शेखर पाठक से यह पुरस्कार ग्रहण किया.
पण्डित भैरव दत्त धूलिया पत्रकार पुरस्कार की शुरुआत.
धूलिया परिवार ने पण्डित भैरव दत्त धूलिया के विचारों को जीवित रखने और उत्तराखंड में शिक्षा के स्तर को आगे लेकर जाने के लिए साल 2023 में कर्मभूमि फाउंडेशन उत्तराखंड शुरू की, इसमें धूलिया परिवार के लोग ही शामिल हैं. फाउंडेशन के हिमांशु धूलिया कहते हैं कि उनके मन में यह विचार पहले से था कि दादा और पिता के विचारों को जीवित रखने के लिए कुछ किया जाएगा, नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने इस पर गम्भीरता से विचार किया और अपने परिवार के साथ बातचीत की. इसके बाद साल 2023 में पहली बार मई में दादा भैरव दत्त धूलिया के नाम पर पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष कार्य करने वाले लोगों को पुरस्कार देने की शुरुआत की गई और पहली बार यह पुरस्कार जय सिंह रावत को दिया गया, पुरस्कार में एक लाख रुपए की धनराशि, प्रशस्ति पत्र एवं शॉल भेंट किए जाते हैं.
हिमांशु आगे कहते हैं कि साल का दूसरा कार्यक्रम पिछले साल के अंत में आयोजित किया गया था, यह कार्यक्रम उनके पिता जस्टिस केसी धूलिया की स्मृति में शुरू किया गया है.
कार्यक्रम में विधि और संविधान के विषय पर वाद-विवाद और निबंध प्रतियोगिताएं आयोजित कराई गईं और इसमें मुख्य अतिथि के रूप में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ शामिल हुए थे.
राजीव लोचन साह को इसलिए मिला यह पुरस्कार.
नैनीताल के रहने वाले राजीव लोचन साह बचपन से ही पढ़ने- लिखने के शौकीन थे, कॉलेज के दिनों में उस समय की लोकप्रिय पत्रिका ‘नई कहानियां’ में उनकी दो कहानियां प्रकाशित हुई थी. साल 1971 में ‘पहल’ के सम्पादक ज्ञानरंजन नैनीताल आए तो राजीव की उनके साथ मुलाकात हुई. ज्ञानरंजन द्वारा प्रकाशन के क्षेत्र में जाने के सुझाव मिलने के बाद राजीव ‘प्रेस’ की एबीसीडी सीखने इलाहाबाद चले गए, वहां अपने रिश्तेदार मनोहर लाल जगाती के घर रहते हुए उनका सम्पर्क रामाप्रसाद घिडियाल से हुआ और उनसे राजीव को प्रेस के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला. इलाहाबाद से वापस आकर उन्होंने साल 1973 में राजहंस प्रेस खोला, इस बीच देश में इमरजेंसी लग गई.
साल 1977 में इमरजेंसी हटने के बाद ‘नवनीत’ पत्रिका से प्रभावित राजीव लोचन साह ने अपने साथ नैनीताल के दो युवाओं हरीश पन्त और पवन राकेश को भी जोड़ा और 1977 के स्वतंत्रता दिवस को ‘नैनीताल समाचार’ की शुरुआत करने के लिए चुना.
पत्रकार से आंदोलनकारी बने राजीव लोचन साह और जनांदोलनों का अखबार बना नैनीताल समाचार.
राजीव कहते हैं कि 6 अगस्त 1977 को विनोद पांडे के साथ वह नैनीताल में वनों की नीलामी पर ख़बर करने गए थे पर वहां स्थिति ऐसी बनी कि मैं वहां गया तो एक पत्रकार के तौर पर था पर जब बाहर आया तो एक आंदोलनकारी बन चुका था, इसके बाद प्रदेश में होने वाले हर प्रकार के जनांदोलनों की यह समाचार पत्र आवाज़ बनते गया.
वर्ष 1984 में प्रदेश के अंदर शराब विरोध में चल रहे आंदोलन की ख़बर को समाचार पत्र ने ‘नशा नही रोज़गार दो’ शीर्षक से छापा. ‘अल्मोड़ा मैग्नेसाइट लिमिटेड’ को लेकर यह कहा जाता था कि उसकी वज़ह से स्थानीय लोगों को नुक़सान और उद्योगपतियों को फ़ायदा हो रहा है तो वर्ष 1988 में अख़बार ने एक आलेख छापा जिसका शीर्षक था ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी उत्तराखंड में उग गई है’.
वर्ष 1994 में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के बीच हुए मसूरी हत्याकांड पर अख़बार ने ख़बर छापी ‘मसूरी : लाशों को बो कर उत्तराखंड के फूल उगाओ’. नया राज्य बनने के बाद भी नैनीताल समाचार ने जन की ख़बरों को छापना नही छोड़ा और समाचार पत्र जन की आवाज़ बना रहा. अगस्त 2011 में प्रदेश में बन रहे बांधों से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान पर ‘बांध के लिए वन कानून आड़े नही आते’ नाम से ख़बर छपी.
अख़बार सिर्फ़ उत्तराखंड ही नही राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण घटनाओं पर भी अपनी राय मज़बूती के साथ रखता रहा है.
शेखर पाठक कहते हैं कि नैनीताल समाचार की यह विशेषता रही है कि उसके सदस्यों में अधिकतर सदस्यों के आंदोलनकारी होने बावजूद उसने दूसरा पक्ष भी अपने पाठकों के सामने अच्छे तरीके से रखा.
प्रयोगों के लिए जाना जाता है नैनीताल समाचार.
साल 1994 के राज्य आन्दोलन के दौरान नैनीताल समाचार का ‘सांध्यकालीन उत्तराखंड बुलेटिन’ बेहद लोकप्रिय हुआ. 3 सितंबर से 25 अक्टूबर तक नैनीताल के दो स्थानों पर रेडियो बुलेटिन की तर्ज़ पर बुलेटिन पढ़ा गया, जिसका प्रयोग बाद में देश के अन्य हिस्सों दिल्ली के जंतरमंतर, उत्तराखंड के गोपेश्वर और उत्तरकाशी में भी किया गया. अंटार्कटिक की धरती पर पहली बार गए पत्रकार गोविंद पन्त राजू की डायरी भी बहुत लोकप्रिय हुई.
अलग अलग जिलों में नैनीताल समाचार के प्रतिनिधि खबर भेजते, जिससे समाचार में अलग अलग जिलों की खबर भी प्रकाशित होती रही, चमोली, उत्तरकाशी, पौढ़ी से खबर आती थी और यह उत्तराखंड गठन से बहुत पहले ही कुमाऊं, गढ़वाल को एकजुट रखने का सराहनीय प्रयास था.
समाचार पत्र में चिट्ठी पत्र, सौल कठौल, छ्व्वीं बथ
और आशल कुशल भाग अपने आप में अनोखे हैं. ‘आशल कुशल’ उत्तराखंड की जिलावार ख़बरों से एकसाथ रूबरू करवाता है. साहित्य अंक, पर्यावरण अंक, होली अंक, हरेला अंक एक नया प्रयोग थे. होली अंक में होली के गीत रंगीन पृष्ठों पर प्रकाशित होने के बाद उत्तराखंड की होली का अहसास कराते अलग ही आनन्द देते हैं.
उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला के लिए हर साल एक विशेष हरेला अंक आता है, अंक के साथ पाठकों के लिए हरेले का तिनका भी भेजा जाता है. होली अंक और हरेला अंक के यह प्रयोग भारत या विश्व के किसी समाचार पत्र में शायद ही देखने को मिले.
नैनीताल समाचार साल 2027 में अपने पचासवें वर्ष में पहुंचने वाला है और अब भी लगातार यह प्रिंट और डिजिटल में प्रकाशित होता है. हाल ही में उत्तराखंड में पर्यटकों की उमड़ी भीड़ पर नैनीताल समाचार ने 'केदारनाथ जैसे अतिसंवेदनशील जगहों को भीड़ और शोरगुल से बचाना होगा' आलेख प्रकाशित किया है और यह इसका उदाहरण है कि नैनीताल समाचार अब भी जल, जंगल, जमीन के मुद्दों को बेबाकी के साथ उठा रहा है.
हिमांशु जोशी.
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