सुंदर चंद ठाकुर का 'काफल ट्री' में बद्रीदत्त कसनियाल पर लिखा आलेख पढ़ें तो उसमें एक जगह लिखा है 'मैं यहां यह भी स्वीकार करना चाहता हूं कि आज भले ही मैं एक बड़े ब्रैंड के अखबार के एडिशन का संपादक हूं, लेकिन जहां तक पत्रकारिता के बुनियादी हुनर और उसके प्रतिमानों पर खरा उतरने की बात है, तो मैं आज भी कसनियाल जी के चेले से ज्यादा कुछ नहीं हूं।' वरिष्ठ पत्रकार राजीव लोचन साह कहते हैं कि बद्रीदत्त के सिखाए न जाने कितने पत्रकार आगे चलकर बड़े संस्थानों के सम्पादक बने और अगर बद्रीदत्त ने पत्रकारिता के लिए पहाड़ छोड़कर दिल्ली को चुना होता तो दिल्ली की चमक धमक से आज उनका नाम देश के बड़े पत्रकारों के साथ लिया जाता। पहाड़ के लोगों की सेवा के लिए बद्रीदत्त ने अपना पूरा जीवन लगा दिया।
कविता से बना पत्रकारिता का रास्ता।
1972 में बद्रीदत्त कसनियाल ने बारहवीं की थी तब हरियाणा की सरकारी पत्रिका में बसंत ऋतु पर एक कविता प्रकाशित हुई, जिसके उन्हें तीस रुपए मिले।
इसके बाद उन्हें लिखने शौक चढ़ा, ग्रेजुएशन करने जब वह पिथौरागढ़ गए तो 'उत्तराखंड ज्योति' के लिए उन्होंने एक आर्टिकल लिखा, जिसकी लोगों ने खूब प्रशंसा की। अखबार के मालिक कैलाश चन्द्र जोशी ने बद्रीदत्त को बोला कि आप अखबार को लिखे लोगों के पत्रों को समाचार का रूप दें। यह पत्र चंपावत, धारचूला से आते थे, जिनमें बिजली, पानी की समस्याओं के साथ बाघ के आतंक की शिकायत होती थी। इसमें पटवारियों की शिकायत भी होती थी, इन अंकों को भी लोगों की प्रशंसा मिली। ढाई सौ रुपए वेतन में बद्रीदत्त वहां काम करने लगे और अब वह पत्रकार बन गए।
1974-75 में वह मान्यता प्राप्त पत्रकार भी बन गए थे। उस दौर की धर्मयुग, कादम्बिनी जैसी पत्रिकाओं को पढ़ते रहते थे।
खबर का असर
एक खबर के बारे में बात करते बद्रीदत्त कहते हैं कि 1976 में एक दिन पिथौरागढ़ में आग लगी तो एक छोटे टैंकर से वहां आग बुझाने की कोशिश की गई पर तब तक वहां सब जल कर खाक हो गया था, तब मैंने खबर लिखी कि पिथौरागढ़ में आग बुझाने के लिए वाटर टैंक न होने की वजह से नुकसान हुआ। इस खबर के एक हफ्ते के अंदर ही पिथौरागढ़ में 25000 लीटर का वाटर टैंक आ गया था।
ऐसे ही साल 1977 में हुए तवाघाट लैंडस्लाइड पर बद्रीदत्त ने एक्टिविस्ट शमशेर सिंह बिष्ट और सरकारी भूवैज्ञानिक के साथ मौके पर जाकर 'दिन प्रतिदिन' अखबार के लिए रिपोर्टिंग की थी, इससे बाहरी दुनिया का ध्यान पहली बार उत्तराखंड के लैंडस्लाइड पर गया और उस पूरे इलाके को संवेदनशील क्षेत्र भी घोषित किया गया। नैनीताल समाचार, लघु भारत के लिए भी वह लगातार लिख रहे थे।
लोगों के बीच जाकर ही होती है असली पत्रकारिता।
एडमंड हिलेरी के पुत्र पीटर हिलेरी भारत में आए तो बद्रीदत्त की उनसे मुलाकात हुई, 27-28 साल के पीटर उन दिनों अपने साथियों के साथ नेपाल से भारत तक हिमालय पैदल चल रहे थे। पीटर का साक्षात्कार करते बद्रीदत्त को महसूस हुआ कि पैदल चलकर हम भी उत्तराखंड के समाज के बारे में गहराई से जान सकते हैं। इसी दौरान 'उत्तर उजाला' की शुरुआत भी हुई और बद्रीदत्त इस अखबार से सात सौ रुपए तनख्वाह में जुड़ गए।
इसी दौरान वह साल 1980 में अमर उजाला से जुड़ गए, बद्रीदत्त कसनियाल छोटा सा बैग टांगकर चिपको आन्दोलन कर रहे सुंदर लाल बहुगुणा का पिथौरागढ़ आने पर साक्षात्कार लेते रहे, यह अमर उजाला में प्रकाशित होते थे।
एक ऐसा पत्रकार जिसने एक्टिविस्ट न होकर भी एक्टिविज़्म किया।
साल 1985 में बद्रीदत्त ने अपना अखबार 'आज का पहाड़' निकाला। वह कहते हैं अमर उजाला में मेरा तबादला मेरठ हुआ पर तब घर के हालात ऐसे बन गए कि मुझे अमर उजाला छोड़ना पड़ा। आज का पहाड़ नाम उन्होंने इंडिया टुडे से लिया।
बद्रीदत्त कहते हैं कि वह शमशेर सिंह बिष्ट, पी सी तिवारी, प्रदीप टम्टा की खबरें लगातार छापते रहे। वह कभी एक्टिविस्ट नही बने पर उन्होंने इन एक्टिविस्टों की खबरें प्रायिकता के साथ छापी। किसी आंदोलन को कवर करने पर गांव वाले बड़े खुश होते थे कि उनकी आवाज भी कोई उठा रहा है। उन दिनों पत्रकारिता वाकई जनता की आवाज होती थी।
उन्होंने बताया कि उन दिनों एक डीएम ने नगर पालिका की जमीन पर घर बनाने को लेकर एक व्यक्ति को नोटिस दिया, हमने इस विषय पर लिखा तो डीएम को वह नोटिस वापस लेना पड़ा और इसके बाद उस डीएम ने हमारे अखबार का रजिस्ट्रेशन कैंसल करवा दिया। अखबार सस्पेंड हो गया तो वह प्रेस काउंसिल गए तो उसके हस्तक्षेप से अखबार फिर शुरू हुआ।
पब्लिक की रीयल सेवा पत्रकारिता
साल 1998 में बद्रीदत्त पीटीआई से जुड़ गए और अमर उजाला के लिए स्वतंत्र पत्रकारिता करते रहे। 2006 से 2009 तक टाइम्स ऑफ इंडिया से जुड़े रहे, वहां उन्होंने सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अभियान चलाया। कबूतरी देवी जैसे कलाकारों को हम दुनिया के सामने लाए, इन कलाकारों की हमने पूरी सीरीज चलाई। पद्मश्री शेखर पाठक ने भी इसकी तारीफ करी।
साल 2006 में उन्होंने कम्प्यूटर सीखा और 2009 में ट्रिब्यून से जुड़ गए। 'ट्रिब्यून' से वह 'हिंदुस्तान टाइम्स' में आने से पहले साल 2017 तक जुड़े रहे। अभी वह पीटीआई, हिंदुस्तान टाइम्स, नॉर्थन गजेट में अंग्रेज़ी में लिखते हैं और 'आज का पहाड़' हिंदी में लिख रहे हैं।
वह कहते हैं पत्रकार ही जनता का प्रतिनिधि होता है, पब्लिक की रीयल सेवा पत्रकारिता से ही की जा सकती है और इसलिए ही वह अब तक लिख रहे हैं।
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