Wednesday, April 9, 2025

दगड्या ग्रुप और चामी टीनएजर्स क्लब, बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का अनोखा प्रयास.

हर साल उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित होने वाला 'उमेश डोभाल स्मृति समारोह' इस बार पौड़ी गढ़वाल में उमेश डोभाल के ही सिरोली गांव में संपन्न हुआ. समारोह में मीडिया की स्वतंत्रता पर चर्चा हुई और जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे पत्रकारों के साथ शिक्षा, संस्कृति से जुड़े लोगों को सम्मानित किया गया. इनमें दगड्या ग्रुप और चामी टीनएजर्स क्लब विशेष रूप से चर्चा के केंद्र में रहे, जो उत्तराखंड के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों के छात्रों को शिक्षा, कौशल और अवसरों के मामले में दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों के विद्यार्थियों के समकक्ष लाने की दिशा में अनूठा प्रयास कर रहे हैं. ये संस्थाएं न केवल शैक्षणिक बाधाओं को पाटने का काम कर रही हैं, बल्कि ग्रामीण युवाओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करके उनके सपनों को पंख दे रही हैं.

उमेश डोभाल के बारे में बताते उनके पुराने साथी

पत्रकार उमेश डोभाल साल 1988 में रहस्यमय ढंग से लापता हुए थे, उनकी याद में 1991 से भारतीय पत्रकारिता में विशेष महत्व रखने वाला यह सम्मान निरंतर दिया जा रहा है. उमेश डोभाल के बारे में बात करते उनके पुराने साथी अनूप मिश्र कहते हैं गढ़वाल कमिश्नरी के मुख्यालय पौड़ी स्थित एक होटल से 25 मार्च 1988 को हुई पत्रकार उमेश डोभाल की गुमशुदगी का मामला तब प्रकाश में आया था, जब अमर उजाला में नियमित रूप भेजे जाने वाले उनके ख़बरों के डिस्पैच कुछ दिनों तक मेरठ नहीं पहुंचे. उमेश जब पौड़ी में मौजूद होते थे, तो उनके ये डिस्पैच पौड़ी से कोटद्वार मुझ तक पहुंचते थे, जो अख़बार की टैक्सी से मेरठ भेज दिए जाते थे. उमेश अक्सर गढ़वाल के दूसरे हिस्सों में भी ख़बरों के सिलसिले में निकल जाया करते थे, इसीलिए शुरू में यही मान लिया गया था कि वो अन्यत्र कहीं चले गए होंगे. उनकी जब कहीं से भी कोई ख़बर नहीं मिली तो सभी की चिंता बढ़ गई. इस बाबत मेरठ से संपादक अतुल माहेश्वरी ने मुझसे संपर्क कर पौड़ी जाकर उनके बारे में पता लगाने को कहा. इसके बाद ही यह बात स्पष्ट हुई कि उमेश डोभाल 25 मार्च को सन-एन-स्नो होटल में रुके थे, तब से उनका कहीं कोई पता नहीं है. पूछताछ के बाद संदेह पुख़्ता होने पर उनकी होटल से गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज़ करा दी गई थी. इससे पहले रिपोर्ट दर्ज़ करने में पौड़ी पुलिस कई दिनों तक हीलाहवाली करती रही थी.

धीरे-धीरे जगह-जगह पत्रकार संगठन इस मामले में आंदोलित होने शुरू हो गए और फिर इसका दायरा बढ़ता चला गया. यह आंदोलन राजधानी दिल्ली के बोट क्लब तक जा पहुंचा, जहां आयोजित प्रदर्शन के ज़रिए देशभर से जुटे पत्रकारों ने उमेश डोभाल गुमशुदगी की सीबीआई जांच की मांग को जोरदार ढंग से उठाया. 

आख़िरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी जा पहुंचा, इसके बाद ही सीबीआई जांच के आदेश जारी हो पाए. सीबीआई जांच में उमेश डोभाल की गुमशुदगी का सच बदनाम शराब माफ़िया के हाथों हुई हत्या के रूप में सामने आया था. हत्या के षड्यंत्र में मुख्य अभियुक्त समेत कई लोगों की गिरफ्तारियां भी हुईं, सीबीआई कोर्ट में मुकदमा लंबे समय तक चला. पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में न्यायालय द्वारा सभी अभियुक्त दोषमुक्त घोषित कर दिए गए थे.

प्रेस की स्वतंत्रता पर क्या बोले अपने अपने क्षेत्रों के दिग्गज

 समारोह में 'भैरव दत्त धूलिया पत्रकारिता पुरस्कार' प्राप्त लोचन साह ने भारत मे प्रेस फ्रीडम के बारे में कहा कि साल 1988 में उमेश डोभाल की हत्या हुई थी और आज छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश में पत्रकारों की हत्या में काफी कुछ बदला नहीं है.

15-20 साल पहले देहरादून के टाउनहॉल में नरेंद्र सिंह नेगी का 'नौछमी नारायण' बज रहा था तो वहां की बिजली बंद कर दी गई थी.  कुणाल कामरा केस इसका सबसे नया उदाहरण है, उसके खिलाफ रोज़ नए मुकदमें दर्ज हो रहे हैं और तोड़फोड़ करने वालों को कुछ देर ही जेल में बन्द रख कर छोड़ दिया गया था.

मशहूर लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने प्रेस की आज़ादी पर चिंता जताई. इसके बाद उन्होंने अपने मधुर स्वरों से माहौल को संगीतमय बना दिया, उन्हें मोबाइल में रिकॉर्ड करने के लिए लोग मंच के सामने बेताब दिखे.

समारोह को मिला महिलाओं का ज़ोरदार समर्थन

एक छोटे से गांव में आयोजित सांस्कृतिक समारोह ने न केवल परंपराओं को जीवंत किया, बल्कि सामुदायिक सहयोग की नई मिसाल भी पेश की. इसकी चमक महिलाओं के जज़्बे से दोगुनी हो गई, जिन्होंने हर पल में अपनी सक्रियता से कार्यक्रम को यादगार बना दिया. कार्यक्रम के पहले दिन निकली रैली में महिलाओं की अच्छी खासी संख्या तो दूसरे दिन पुरस्कार वितरण और बी मोहन नेगी की आर्ट गैलरी में भी महिलाएं अधिक रहीं.

इस वर्ष इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पुरस्कार किशन चन्द्र जोशी और सोशल मीडिया पुरस्कार प्रेम पंचोली को प्रदान किया गया. साहित्यकार महावीर रवांल्टा, कवि हर्ष काफर, संस्कृति संरक्षक समीर शुक्ला के साथ ही पौड़ी के 'दगड्या ग्रुप' और चामी के 'टीनएजर्स क्लब' को भी इस मौके पर विशेष सम्मान दिया गया.

दगड्या ग्रुप: संस्कृति और शिक्षा की ज्योत जलाने का संकल्प

दगड्या ग्रुप के संस्थापक आशीष नेगी ने बताया कि सात सालों से वे एकेश्वर गाँव के बच्चों को शिक्षा और संस्कृति से जोड़ रहे हैं. "हमने 15 वर्कशॉप्स में बच्चों को थिएटर और आर्ट क्राफ्ट सिखाया. यहां तक कि इस दूरदराज़ के इलाके में ऑस्कर विजेता डॉक्यूमेंट्री 'द एलिफेंट व्हिसपर्स' के सिनेमेटोग्राफर करन थपलियाल को बुलाकर फ़िल्म फेस्टिवल आयोजित किया," उन्होंने गर्व से कहा कि ग्रुप न केवल बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठा रहा है, बल्कि पौड़ी में नए पुस्तकालय खोलकर ज्ञान की रोशनी फैला रहा है और हमारे यहां से कुछ बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में निकल. "यह कोई एनजीओ नहीं, बल्कि समाज के प्रति हमारी छोटी सी पहल है" आशीष ने जोर दिया.

चामी टीनएजर्स क्लब: सेवानिवृत्त शिक्षक का 'बच्चों को सशक्त बनाने' का सपना

सरकारी नौकरी से रिटायर अरुण कुकसाल ने चामी गांव में शैक्षणिक संसाधनों की कमी देखकर 'टीनएजर्स क्लब' की नींव रखी. उनके पूर्व सहकर्मियों की आर्थिक मदद से चलने वाले इस क्लब में आज 50 बच्चे कम्प्यूटर सीखते हैं, किताबें पढ़ते हैं और खेलते हैं.
संरक्षिका रिंकी बिष्ट, जो खुद जटिल परिस्थितियों में शादी के बाद पति की मदद से बीकॉम की पढ़ाई कर चुकी हैं, बच्चों को निःशुल्क ट्यूशन देती हैं. "होली पर हमने गाँव में सांस्कृतिक कार्यक्रम किया था. बच्चों के नृत्य और नाटक देखकर गांव में सभी की आँखें चमक उठीं," रिंकी ने मुस्कुराते हुए बताया. 

हिमांशु जोशी

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