Tuesday, November 18, 2025

मालधन चौड़ में पहाड़ के शिल्पकार समुदाय की बसावट : ढेला नदी का डर और अधूरी बुनियादी ज़रूरतें

*मालधन चौर में पहाड़ के शिल्पकार समुदाय की बसावट : ढेला नदी का डर और अधूरी बुनियादी जरूरतें*

पद्मश्री डॉ शेखर पाठक के कहने पर मैं मालधन चौर पहुंचा, वह चाहते हैं कि लगभग छह दशक पहले जाति के आधार पर बसाए गए इस इलाके की वर्तमान स्थिति पर मैं कुछ लिखूं.

उत्तराखंड में काशीपुर और रामनगर से लगभग 20 किलोमीटर स्थित मालधन चौर साल 1966-67 में  पहाड़ के शिल्पकार समुदाय को बसाया गया था. आज भी यह इलाका ढेला नदी के कटाव, बाढ़ के इतिहास, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और वन ग्रामों की उपेक्षा से जूझ रहा है. यह रिपोर्ट स्थानीय निवासियों कमला, मोहनलाल आर्य, महेश चंद्र की बातचीत पर आधारित है.

*पुरानी बस्ती की कमला : लड़कियों की पढ़ाई, महिलाओं की सेहत,  बदले हुए सामाजिक तौर-तरीके*

कमला पुरानी बस्ती की रहने वाली हैं. उनकी शादी भी यहीं हुई. वह बताती हैं कि पहले यहां लड़कियों की शादी 14 और 15 साल में कर देते थे. अब शादी 18 साल के बाद होती है. उनकी उम्र करीब 40 से 45 वर्ष है.

कमला कहती हैं कि लड़कियों के लिए पढ़ाई का माहौल पूरी तरह बदला है. अब लड़कियां इंटर कॉलेज तक जाती हैं. कई ग्रेजुएशन कर रही हैं. पहले जंगल और स्कूल दूर के कारण पढ़ाई छूट जाती थी.

महिलाओं की सेहत पर वह बताती हैं कि गांव के अस्पताल में लेडी डॉक्टर तो है. लेकिन कई वर्षों तक एक्स रे और ब्लड टेस्ट जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं. कैंसर और महिलाओं से जुड़ी बीमारियों के बारे में जागरूकता पहले बहुत कम थी. अब धीरे-धीरे बढ़ रही है. कई बार इलाज के लिए काशीपुर जाना पड़ता था.

कमला कहती हैं कि गरीब परिवारों में महिला समूह ने कुछ मदद दी है. लेकिन कई सरकारी योजनाएं वन ग्रामों तक अब भी पहुंच नहीं सकीं हैं.

सामाजिक बदलावों का जिक्र करते हुए वह कहती हैं कि पहले पीरियड और प्रसूति के बाद महिलाओं को कुछ दिनों तक अलग रखा जाता था. अब यह प्रचलन लगभग खत्म है. पैड का इस्तेमाल बढ़ा है, कपड़े का प्रयोग कम हुआ है. मेंस्ट्रुअल कप की जानकारी यहां की महिलाओं को कम ही है. जाति को लेकर कमला बताती हैं कि पूरी बस्ती सिल्पकार समुदाय की है. इसलिए जातिगत तनाव नहीं है.

*मोहनलाल आर्य : कैसे बसा मालधन चौर और बदलती ढेला नदी*

मोहनलाल आर्य, ग्रामसभा आनन्द नगर  के निवासी हैं. रिटायर्ड पोस्टमास्टर मोहनलाल कहते हैं कि मालधन चौर साल 1966 और 1967 में बसाया गया. उस समय ढेला नदी केवल लगभग 50 फीट चौड़ी थी और आज यह कटाव बढ़कर लगभग एक किलोमीटर तक फैल गया है.

उन्होंने बताया शुरुआत में यहां सात गांव बसाए गए थे, जिनमे चंद्रनगर, मालधनचौड़ नंबर दो, गांधी नगर नंबर तीन शामिल थे और बाद में बाढ़ से विस्थापित लोगों के लिए नथावली और पटरानी जैसे वन ग्राम बने.

मोहनलाल बताते हैं कि स्वर्गीय खुशीराम शिल्पकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के निर्णय के बाद पहाड़ के शिल्पकार समुदाय को यहां बसने का अवसर मिला और हर परिवार को पांच एकड़ जमीन, दो बैल मिले और हल मिला. 

मोहनलाल कहते हैं आनन्द नगर और देवीपुरा में खेती की जमीन ढेला नदी से कटते गई और अब पूरी तरह रेत से भर गई है. उन्होंने कहा साल 1978 की बाढ़ में गांव के कई जानवर मर गए और कुछ बच्चे भी बहे. अफसरों ने तब गांव वालों को ऊंची जगहों पर जाने के लिए कहा. नथावली और पटरानी जैसे नए गांव जंगल के बीच बसाए गए और आज वहां ऐसे दस से बारह वन ग्राम हैं.

बाढ़ से प्रभावित परिवारों को तब जमीन देने का आश्वासन मिला था लेकिन आज तक वह जमीन नहीं मिली, वन ग्राम की जमीन पट्टे पर नहीं है 

ढेला नदी को लेकर मोहनलाल चिंतित हैं. उनका कहना है कि नदी लगातार रास्ता बदल रही है. बारिश में यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि कटाव अगली बार किस दिशा में जाएगा.

उनका मानना है कि अगर तुमरिया बांध नही होता तो मालधन चौर की अधिकांश जमीन बच जाती. बांध भर जाता है तो फाटक खोलने पर तेज धारा सीधे गांवों की ओर आती है और बड़ा नुकसान करती है.

*पर्यटन की संभावना पर वन ग्रामों की सबसे बड़ी मुश्किल सड़क*

महेश चंद्र देवीपुरा गांव के निवासी हैं. वह मालधन चौर में टू व्हीलर सर्विस और होंडा एजेंसी चलाते हैं. महेश कहते हैं कि मालधन चौर में सरकारी नौकरी वाले पांच प्रतिशत से भी कम लोग हैं.  तुमरिया बांध को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए तो यहां नैनीताल जैसा पर्यटन विकसित हो सकता है.

उन्होंने कहा यह क्षेत्र जिम कॉर्बेट पार्क से जुड़ा हुआ है और अत्यधिक सुंदर है लेकिन इसकी पब्लिसिटी नहीं की गई.

अपनी बात समाप्त करते महेश कहते हैं कि मुख्य गांव में तो सड़क और लाइट की स्थिति बेहतर है. लेकिन वन ग्रामों में हालत बेहद खराब है, नथावली, पटरानी जैसे गांवों में बच्चों का स्कूल जाना, चक्की तक पहुंचना और पानी लाना आज भी बड़ी चुनौती है. हाथियों और जंगली जानवरों का डर हमेशा रहता है. यहां स्थित मिलिट्री की लगभग तीन हजार एकड़ जमीन पर कोई उद्योग या फैक्ट्री लग जाए तो यहां रोजगार के लिए जूझ रहे बीए और बारहवीं पास युवाओं के लिए रोजगार की संभावना खुल जाएगी.

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