Wednesday, December 17, 2025

मेरे हिस्से की अस्कोट आराकोट यात्रा

शीर्षक

मेरे हिस्से की अस्कोट आराकोट यात्रा
(उत्तराखंड के बदलते गांव और कस्बे)

लेखक
हिमांशु जोशी

समर्पण
उन सभी को, जो पहाड़ को अपना घर मानते हैं
चाहे वे वहां रहते हों या उससे दूर....

प्रस्तावना

उत्तराखंड को अक्सर प्राकृतिक सुंदरता, पर्यटन और आध्यात्मिक यात्रा के रूप में देखा जाता है। पहाड़ को देखने की यह दृष्टि बाहर से आई हुई है जबकि यहां बसे गांवों और कस्बों की रोजमर्रा की सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल और कठोर है। तराई के सीमावर्ती कस्बों से लेकर ऊंचाई पर बसे दूरस्थ गांवों तक, हर जगह विकास, रोजगार, शिक्षा, पानी, खेती और सामाजिक बदलाव की अपनी अलग कहानी है।

टनकपुर जैसे खूबसूरत कस्बे जो पहाड़ का प्रवेश द्वार माने जाते हैं, आज भी अपनी पहचान और दिशा तलाशते दिखाई देते हैं। वहीं केदारनाथ के समीप बसा बड़ासू गांव, तीर्थ और पर्यटन के दबाव के बीच अपनी सामान्य जिंदगी को बचाए रखने का संघर्ष करता है। ये स्थान केवल भौगोलिक इकाइयां नहीं हैं, बल्कि लोगों के सपनों और जिजीविषा से बने जीवित समाज हैं।

यह किताब मेरे अस्कोट आराकोट अभियान से जुड़ने के बाद आकार लेती है। यात्रा भले ही आराकोट में समाप्त हो गई हो, लेकिन मेरे लिए यह आज भी जारी है। जहां भी जाता हूं, उस यात्रा के अनुभव और सीख चीजों को देखने का एक अलग नजरिया देते हैं। पहाड़ अब मेरे लिए केवल मनोरम दृश्य नहीं, सवाल बन गए हैं।

पद्मश्री शेखर पाठक के साथ कदमताल करते हुए पहाड़ों पर बने एक पारंपरिक पैदल पुल तक पहुंचना और फिर उन्हें एक बच्चे की तरह पुल के अंतिम छोर को छूकर लौटते देख पाना, उनके उनके अंदर बसे गहरे पहाड़ प्रेम को सामने लाता है। यह वही प्रेम है जिसने १९७४ में शुरू हुई अस्कोट आराकोट यात्रा को २०२४ तक पहुंचाया और वर्षों से पहाड़ के सवालों को समाज और सत्ता के सामने रखने का साहस पैदा किया। उनके साथ चलते हुए यह महसूस होता है कि यह यात्रा केवल पैदल चलने का उपक्रम नहीं थी, बल्कि पहाड़ को समझने, उसे सुनने और उसके साथ खड़े होने की एक सतत प्रक्रिया थी। यही दृष्टि मुझ जैसे युवाओं को आज भी सोचने, लिखने और पहाड़ से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है।

यह किताब यात्रा के दौरान और उसके बाद अलग अलग स्थानों पर देखी और सुनी गई जमीनी हकीकत पर आधारित है। यह केवल समस्याओं का विवरण नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है जो इन चुनौतियों के बीच जीवन जी रहे हैं, रोजमर्रा के संघर्षों से जूझ रहे हैं और अपने सीमित साधनों के भीतर समाधान खोजने की कोशिश कर रहे हैं। कहीं खेती छूट रही है, कहीं शिल्प खत्म हो रहा है, कहीं स्कूल तो हैं लेकिन बच्चे नहीं और कहीं बच्चे हैं लेकिन आगे का रास्ता नहीं।

किताब की शुरुआत मेरे अपने शहर टनकपुर से होती है। टनकपुर से मेरा जो लगाव है, वैसा शायद किसी और शहर से कभी नहीं हो सकता। अपनी मिट्टी से प्रेम के कारण ही टनकपुर से दिखने वाले पहाड़ और शारदा नदी मेरे लिए खास हैं। मेरे लिए यह दुनिया का सबसे खूबसूरत शहर है। लेकिन सुंदरता के इस आवरण के पीछे ठहराव, बेरोजगारी और पहचान का संकट भी है। इस शहर की वास्तविक तस्वीर सामने लाने के लिए मैंने उस व्यक्ति को चुना है, जो कभी हमारे बचपन में किराए पर लिए जाने वाले वीसीआर का मालिक रहा है और आज बदलते बाजार, समय के साथ अपने संघर्ष की कहानी खुद कहता है।

यह किताब किसी निष्कर्ष का दावा नहीं करती। यह एक संवाद है, यात्रा और प्रयास है कि उत्तराखंड के कस्बों को केवल भावुकता या पर्यटन की दृष्टि से नहीं, बल्कि उनके सामाजिक और आर्थिक यथार्थ के साथ देखा जाए।

खंड 1

तराई और कस्बे

टनकपुर
विकास की अधूरी कहानी

मालधन चौड़
शिल्पकार समुदाय की चुनौतियां

खंड 2

पहाड़ी गांव और आजीविका

बड़ासू
केदारनाथ की छांव में जीवन

पोखरी और नगरुघाट
खाली होते गांव

खंड 3

समुदाय और संस्कृति

मोरी
गुज्जर समुदाय की नई पहचान

त्यूणी
बदलती परंपराएं

रवाईं की लोककथाएं
सांस्कृतिक धरोहर

खंड 4

संकट और समाधान

खेती का संकट
तिल, चौलाई और कीवी की संभावनाएं

लोहार
विलुप्त होता पारंपरिक शिल्प

महिला समाख्या
एक जरूरी कार्यक्रम

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