Wednesday, March 25, 2026

*उमेश डोभाल स्मृति समारोह 2026: उत्तराखंड की पत्रकारिता, चुनौतियां और बदलता स्वरूप*

पत्रकारिता सिर्फ खबरों का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का आईना होती है. इसी आईने में झांकने की कोशिश उमेश डोभाल स्मृति समारोह 2026 में दिखाई दी, जहां उत्तराखंड की पत्रकारिता के वर्तमान और भविष्य पर गंभीर चर्चा हुई. ट्रस्ट द्वारा उमेश डोभाल स्मृति सम्मान 2025 कपिलेश भोज को दिया गया.

उमेश डोभाल स्मृति समारोह 2026 का मुख्य विषय इस बार उत्तराखंड की वर्तमान पत्रकारिता रहा. इस गरिमामय आयोजन में राज्य के वरिष्ठ पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने वर्तमान दौर के संकटों और डिजिटल युग की संभावनाओं पर विस्तार से मंथन किया. प्रदेश बनने के बाद यहां बड़ी संख्या में समाचार पोर्टल भी सामने आए हैं, जिन्होंने पत्रकारिता के दायरे को और व्यापक किया है. अब किसी दूरस्थ गांव में जल, जंगल और जमीन से जुड़ी समस्या भी सीधे दुनिया के सामने लाई जा सकती है, जिससे स्थानीय मुद्दों को नई दृश्यता मिली है.

*डिजिटल क्रांति: दूर दराज की आवाज़ के लिए नया आसमान*

डिजिटल पत्रकारिता ने सूचनाओं के प्रवाह का लोकतंत्रीकरण कर दिया है. अब पत्रकारिता किसी बड़े शहर या रसूखदार मीडिया हाउस की जागीर नहीं रही. एक स्मार्टफोन के जरिए पहाड़ के आखिरी गांव में बैठा व्यक्ति भी अपनी आवाज़ उठा सकता है. पहले खबरें दफ्तरों तक पहुँचने में हफ्तों लग जाते थे, लेकिन अब वे सेकंडों में दुनिया के सामने होती हैं. इसने उन स्थानीय मुद्दों को भी चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया अक्सर नजरअंदाज कर देता था.

*विज्ञापनों का संकट: छोटे अखबारों पर दोहरी मार*

पिथौरागढ़ के वरिष्ठ पत्रकार बद्रीदत्त कसनियाल ने विज्ञापनों की असमानता का मुद्दा उठाते हुए एक बार कहा था कि पहले के मुकाबले अब छोटी पत्रिकाओं को चलाना कठिन होता जा रहा है क्योंकि उन्हें पर्याप्त विज्ञापन नहीं मिलते.

उत्तराखंड में विज्ञापन वितरण की यह असमानता एक बड़ी समस्या बनती जा रही है. बड़े मीडिया घरानों को जहां करोड़ों के विज्ञापन मिलते हैं, वहीं छोटे अखबार और पत्रिकाएं लगातार आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. यह स्थिति केवल संस्थानों की नहीं, बल्कि जमीनी पत्रकारिता की निरंतरता के लिए भी गंभीर चुनौती है.

*बाजार का चश्मा बनाम पहाड़ की जमीनी हकीकत*

आज की मुख्यधारा की पत्रकारिता काफी हद तक बाजार केंद्रित हो गई है. दिल्ली और बड़े शहरों के मीडिया हाउस उत्तराखंड को अक्सर सिर्फ पर्यटन, चारधाम यात्रा या खूबसूरत वादियों के नजरिए से ही देखते हैं. इस चमक धमक के बीच पहाड़ की असली चुनौतियां जैसे जल संकट, बेतहाशा पलायन और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव अक्सर दब जाते हैं. असली पत्रकारिता वही है जो केवल टूरिज्म की फोटो न दिखाए, बल्कि उन लोगों के जीवन की बात करे जो इस कठिन भूगोल में संघर्ष कर रहे हैं.

*तकनीक के साथ तालमेल: भविष्य की नई राह*

आने वाला वक्त तकनीक का है और जो इसके साथ कदम मिलाएगा, वही टिक पाएगा. इसका एक जीवंत उदाहरण गंगा असनोड़ा की पत्रिका रीजनल रिपोर्टर है. जब प्रिंट का खर्च बढ़ा और संसाधन सीमित हुए, तो उन्होंने हार मानने के बजाय रास्ता बदला. पत्रिका को पीडीएफ फॉर्मेट में ढाला और सोशल मीडिया के जरिए पाठकों तक अपनी पहुंच बनाई. एआई और सोशल मीडिया जैसी तकनीकें उन निष्पक्ष पत्रकारों के लिए एक नई ताकत बनकर उभर सकती हैं, जो कम बजट में भी अपनी ईमानदारी को जिंदा रखना चाहते हैं.

*इतिहास की विरासत: आंदोलन, पत्रकारिता और सवाल पूछने की परंपरा*

इतिहासकार शेखर पाठक ने कहा कि एक शताब्दी पहले कुमाऊं परिषद ने दस साल तक उत्तराखंड में कुली बिहार जैसे आंदोलनों को चलाया.
बहुत से बुद्धिजीवी उसमें शामिल थे. 1915 में तारा गैरोला को नॉमिनेट किया गया कि वह ब्रिटिश शासन से सवाल पूछे. अल्मोड़ा उस दौर में आंदोलनों का केंद्र रहा, कुमाऊं परिषद के लोगों ने उस समय हुए चुनावों में 90% वोट हासिल करते विपक्षियों की जमानत जब्त की, यह पहली बार था कि आंदोलन के मुख्याओं ने चुनाव में जीत हासिल की थी और जनप्रतिनिधि बने.

वह कितने लोग बाघ ने खाए, स्कूल कितने बने जैसे कठिन सवाल पूछते थे, वह पत्रकारिता का स्वर्णिम दौर था. तब शुरू हुए 'शक्ति' अखबार के सौ साल पूरा करना हमारे लिए गर्व का विषय है, उसी दौर में गढ़वाली अखबार भी निकल रहे थे. उन अखबारों की धारदार संपादकीय पढ़ने लायक होते थे.

अब हम देखते हैं अब कॉरपोरेट पत्रकारिता हावी हो गई है, स्थानीय स्वर बनाए रखना मुश्किल हो गया है. उत्तराखंड की पत्रकारिता के पच्चीस साल विवशता के साल हैं क्योंकि इनमें संसाधनों की बात नहीं है. अंकिता का समाचार भी हमारे अखबारों की हेडलाइन नहीं बन सका.

हिमांशु जोशी

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